दुख के राह हजार हैं

दुख के राह हजार हैं

दुख के राह हजार हैं

दुख के राह हजार हैं
सुख की कोई राह नहीं
क्यों अन्तर में पलता है
विकट वेदना चाह नहीं।

कुमुद निशा में लेटी है
चंचलता बस खेती है
सारे द्रुम विश्वास टिके हैं
मन में क्यों वैराग्य नहीं।

दूर दृष्टि में छोड़ गये हैं
बन्धन सारे तोड़ गये हैं
कितना कोई रजनी से पूछे
चंदा में दाग नहीं।

बैठी हुई शिथिलता को
फैलाते हैं दुख के दीप
वही दिखाई देता है क्यों
जो अपना संसार नही।

पलकों से छनते हैं आंसू
दुविधा के इस मसान में
घुमड़ रहे हैं बादल ज्यों
गिरते धरती पर धार नही।

सुधा चौधरी
बस्ती, उत्तर प्रदेश

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