बने कातिल झुका ली है हया से ये नज़र जब से
बने कातिल झुका ली है हया से ये नज़र जब से

बने कातिल झुका ली है हया से ये नज़र जब से

( Bane katil jhuka li hai haya se ye nazar jab se )

 

 

बने  कातिल  झुका ली  है हया से ये नज़र जब से।
नहीं कुछ होश बाकी है हुआ दिल पे असर तब से।।

 

 

नज़र हम से मिलाओ तो दवा दिल को मिले कुछ तो।
घङी-भर  देख  लेने  दो  पलक  झपकी  नहीं कब से।।

 

 

जुबां  होती  नहीं इनकी बयां करती है हाले-दिल।
बहुत कुछ बोलती आंखें शिकायत है तेरे लब से।।

 

 

दिलों  को  खींच  लेती  है तेरे रूखसार की रंगत।
अलग ज़ल्वा लगे तेरा कशिश तेरी जुदा सब से।।

 

 

खिला तेरा रहे चहरा कमल -सा ये सदा यूं ही।
ये दिल-भौंरा रहे तेरा सदा बनके दुआ रब से।।

 

 

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कवि व शायर: Ⓜ मुनीश कुमार “कुमार”
(M A. M.Phil. B.Ed.)
हिंदी लेक्चरर ,
GSS School ढाठरथ
जींद (हरियाणा)

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