कहां मुश्किल
कहां मुश्किल

कहां मुश्किल अगर वो साथ में करतार आ जाए

( Kahan Mushkil Agar Wo Sath Mein Kartar Aa Jaye )

 

कहां मुश्किल अगर वो साथ में करतार आ जाए।
लगे  कश्ती  किनारे  हाथ  ग़र पतवार आ जाए।।

 

निभाना होता है मुश्किल ये जीवन साथ में यारो।
दिलों के बीच में जब भी कोई दीवार आ जाए।।

 

नहीं  फिर दूरियां रहती समझते हो अगर अपना।
मिटा के नफ़रतों को ग़र निभाना प्यार आ जाए।।

 

मिले ग़र प्यार हमको भी कभी खुदग़र्ज दुनिया में।
रूकी-सी ज़िन्दगी में भी तनिक रफ्तार आ जाए।।

 

नयापन जोश से भरता भरे जज़्बा बुझे दिल में।
कहानी  में  ज़रूरी  है नया किरदार आ जाए।।

 

गुनाहों  से  बचोगे  तब  चलोगे  राह  नेकी  की।
ख़ुदा के सामने करना अगर इक़रार आ जाए।।

 

गुलों को मत भुला देना डगर के पार खिलते जो।
कभी  राहे-चमन  में  भूले  से ग़र ख़ार आ जाए।।

 

वज़न  आता  ग़ज़ल  में  शायरी  पे  नूर आता है।
जिग़र पे चोट करते चंद ग़र अशआर आ जाए।।

 

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कवि व शायर: Ⓜ मुनीश कुमार “कुमार”
(M A. M.Phil. B.Ed.)
हिंदी लेक्चरर ,
GSS School ढाठरथ
जींद (हरियाणा)

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