हम हैं | Ghazal Hum Hain

हम हैं

( Hum Hain )

नज़र शल है,जिगर ज़ख़्मी है फिर भी ख़ंदाज़न हम हैं।
न जाने किस लिए उनकी मुह़ब्बत में मगन हम हैं।

हमारे नाम से मनसूब है हर एक जंग-ए-ह़क़।
मिसालें जिनकी क़ायम हैं वही लख़्त-ए-ह़सन हम हैं।

तनाफ़ुर के अंधेरों को मिटाने की ख़ता क्या की।
फ़क़त इस जुर्म पर ही क़ाबिल-ए-दार-ओ-रसन हम हैं।

सबक़ उल्फ़त के लेता है ज़माना आज तक जिनसे।
उख़ुव्वत के वही दरिया,वही गंग-ओ-जमन हम हैं।

मुह़ब्बत के ह़सीं रिश्ते हों बाहम किस तरह़ क़ायम।
तुम्हारे ज़ह्न-ओ-दिल में आज तक जब बेवतन हम हैं।

अदब के फूल झड़ते हैं ज़मीं पर जिसके ग़ुन्चों से।
ज़मीं पर आज भी वो पैकर-ए-ह़ुस्न-ए-चमन हम हैं।

सितम ने अहले आ़लम के मिटा डाला हमें लेकिन।
महक ज़िन्दा है जिनकी अब भी वो ग़ुन्चा दहन हम हैं।

अदब की इससे बढ़कर और क्या ख़िदमत करें यारो।
गिरानी दौर में भी माइल-ए-मश्क़-ए-सुख़न हम हैं।

फ़राज़ उनको भुलाए एक मुद्दत हो गई हम को।
मगर उनके दिल-ए-मुज़्तर में अब भी मोजज़न हम हैं।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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