बातिलों से जो प्यार रखते हैं

बातिलों से जो प्यार रखते हैं

बातिलों से जो प्यार रखते हैं।
ख़ुद को वो सोगवार रखते हैं।

इ़शक़ बाज़ी में वो नहीं लुटते।
दिल पे जो इख़्तियार रखते हैं।

टाल जाते हैं मुस्कुरा कर वो।
बात हम बार – बार रखते हैं।

सब पे ख़ुशियां लुटाते हैं लेकिन।
हम को वो अश्कबार रखते हैं‌।

उनको दुनिया पसंद करती है।
दिल में जो इन्किसार रखते हैं।

फिर न खा जाएं उनसे हम धोखा।
ख़ुद को यूं होशियार रखते हैं।

ह़स्नो अख़लाक़ से जो हैं ग़ाफ़िल।
उनको हम दरकिनार रखते हैं।

कैसे आख़िर ‘फ़राज़’ ख़ुश हों हम।
रन्जो ग़म बेशुमार रखते हैं।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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