महेन्द्र सिंह प्रखर की ग़ज़लें | Ghazals of Mahendra Singh Prakhar
क्या-क्या सोचा था वो और क्या हो गये
क्या-क्या सोचा था वो और क्या हो गये
आज अपने ही मुझसे खफ़ा हो गये
प्राण तन से हमारे जुदा हो गये
डॉक्टर जी जहाँ के खुदा हो गये
देखकर रंग जिनका फिदा हम हुए
यार वो हमसे क्यों बेवफ़ा हो गये
आज पढ़कर ग़ज़ल हम भी गुरुदेव की
शेर दर शेर पर हम फिदा हो गये
बात गुरुवर की मानों तो होगा भला
इतने अच्छे मेरे रहनुमा हो गये
बाद उनके मुझे कौन समझायेगा
वह जो मुझसे अगरचे ख़फ़ा हो गये
अब बुला लो शरण में मुझे राम जी
फर्ज़ मेरे सभी अब अदा हो गये
बेवफ़ा बावफ़ा फर्क समझे नहीं
और उसपे प्रखर हम फ़िदा हो गये
ज़िन्दगी ऐसे गुज़ारी जा रही है
ज़िन्दगी ऐसे गुज़ारी जा रही है
जैसे के खस्ता सवारी जा रही है
आज के संस्कार की बातें न पूछो
कह के बुढ़िया माँ पुकारी जा रही है
आज बेटी पालना कितना कठिन है
सोचकर क्या फिर ये मारी जा रही है
जो कमा के ला रहे हैं चार आने
आरती उनकी उतारी जा रही है
क्यों अचानक आप का बदला है लहजा
दोस्त क्या सत्ता तुम्हारी जा रही है
पहले जो मन में भरा था कह दिया वो
बात बिगड़ी अब सुधारी जा रही है
बात सौ आने सही है यह प्रखर अब
जिस तरफ उँगली तुम्हारी जा रही है
मैं इक झलक प्रभु आपको देखूँ नयन तो दीजिए
मैं इक झलक प्रभु आपको देखूँ नयन तो दीजिए
सोये हुए ये भाग्य जागेंगे चरन तो दीजिए
बिन आपको देखे लिखूंगा कैसे मैं कोई ग़ज़ल
तिरछी नज़र के वार से दिल में चुभन तो दीजिए
लाखों खिला दूँ फूल मैं आकर वहाँ पे प्यार के
बस प्यार के दो बोल हमको ये कहन तो दीजिए
मैं भी परो को खोलकर छूने चलूँगा चाँद को
उसके लिए करने मुझे थोड़ा जतन तो दीजिए
होगा उजाला ही उजाला कल तुम्हारे भाग्य में
पाकर यही आशीष गुरुवर को सुमन तो दीजिए
जो नींद थी प्यारी मुझे आती नहीं वह आजकल
गर हो सके सुख चैन वाला वह भवन तो दीजिए
क्या है हमारे भाग्य में अब छोडिये इस बात को
तन ढक सके मेरा अभी जो वो वसन तो दीजिए
जो मर गया है आज सरहद पे सुरक्षा के लिए
उसकी खुशी के वास्ते इक ध्वज कफन तो दीजिए
गर चाहतें हो तृप्त हो आत्मा हमारी ये प्यासी
तो फिर नहीं होगे ज़ुदा फिर से वचन तो दीजिए
सब हीर राँझा भूल जायेंगे हमारे बाद में
होने हमें भी आप पहले इक बदन तो दीजिए
अब छोडिए क्या कह रहे हैं ये पिद्दी से देश हैं
अपने वतन में अब प्रखर सबको अमन तो दीजिए
हाल दिल का जिन्हें हम अपना सुना देते हैं
हाल दिल का जिन्हें हम अपना सुना देते हैं
क्यों वही लोग नया जख़्म लगा देते हैं
एक हम हैं की शिकायत नही करते उनकी
वो बिना बात ही इल्ज़ाम लगा देते हैं
भूल जाते हैं वो वादा ही किया अपना अब
उसकी तोहमत भी वो सब हम पे लगा देते हैं
चैन से आज जो सोने नहीं देते हमको
एक हम हैं कि उन्हें फिर भी दुआ देते हैं
जानतें हैं सभी उनके हैं ये झूठे वादे
दिल को फिर भी यकीं हम अपने दिला देते हैं
गुफ़्तगू क्या ही करेंगे वो मुहब्बत वाली
आग दुनिया में जो बातों से लगा देते हैं
कितने हालात से मजबूर हुए होंगे वो
बीच आँगन में जो दीवार उठा देते हैं
आँख औ कान प्रखर बंद वो रखते होंगे
बेगुनाहों को सज़ा जो कि सुना देते हैं
झूठ जीता झूठ खाता झूठ ही पहना हुआ
झूठ जीता झूठ खाता झूठ ही पहना हुआ
आदमी सारे जहां में झूठ का पुतला हुआ
सोच के इंसान क्या है आज तक बैठा हुआ
जो लड़ा तक़दीर से समझो उसे जीता हुआ
खून के रिश्ते भी यारो छल जहाँ करने लगे
गैर से भी इसलिए इंसाँ है कतराता हुआ
किसको इस दुनिया में यारो आज हम अपना कहें
जिसको भी अपना कहा उससे ही धोखा हुआ
माँगने से जग में कब इंसाफ है किसको मिला
छीन ले जो बढ़ के आगे फैसला उसका हुआ
उसके दिल का तो कभी तुम ध्यान रख पाये नहीं
आखिरी जो साँस तक तेरे लिए ठहरा रहा
जो प्रखर ये सामने अब पीठ करके बैठे है
पूछ लो रिश्ता हमारा भी बहुत गहरा हुआ
अनुभवों को आप से साझा किया है यह प्रखर
सब कृपा गुरुदेव की जो आज यह कहना हुआ
घर में ही पुन्य कमाने के लिए रहता हूँ
घर में ही पुन्य कमाने के लिए रहता हूँ
माँ के मैं पाँव दबाने के लिए रहता हूँ
दुश्मनी दिल से मिटाने के लिए रहता हूँ
धूल में फूल खिलाने के लिए रहता हूँ
शहर में मैं नही जाता हूँ कमाने पैसे
हाथ बापू का बटाने के लिए रहता हूँ
टूट जाते हैं ज़रा बात में रिश्ते नाते
मैं उन्हें सिर्फ़ बचाने के लिए रहता हूँ
आँधियां ज़ोर दिखाती हैं बुझाने को दिये
घी मैं उनमें ही बढ़ाने के लिए रहता हूँ
कितने कमजोर हुए आज हमारे रिश्ते
आइना उनको दिखाने के लिए रहता हूँ
कुछ नहीं देते प्रखर मुझको बस्ती वाले
फिर भी इनको मैं हँसाने के लिए रहता हूँ
हयात यादों में उनकी बितानी पड़ती है
हयात यादों में उनकी बितानी पड़ती है
निकल के गाँव से रोज़ी कमानी पड़ती है
कभी न दुख पड़े सहना उन्हें मेरी खातिर
लबों पे झूठी हँसी भी सजानी पड़ती है
अकेला मैं न चुकाता हूँ मोल रिश्तों का
सभी को रिश्तों की क़ीमत चुकानी पड़ती है
ख़बर ये घर का बशर कोई क्यों नहीं रखता
कि किस तरह इन्हें रोटी खिलानी पड़ती है
न ढंग से बोलता मुझ से जिगर का टुकड़ा भी
मैं उसका बाप हूँ लानत उठानी पड़ती है
कभी जो बज़्म में आ जायें आँसूँ आँखों में
कहानी फिर नई हमको सुनानी पड़ती है
प्रखर तो सब्जी भी हम मन की खा नहीं सकते
हमेशा बच्चों के मन की बनानी पड़ती है
बहार आज मुझे कर रही इशारा है
बहार आज मुझे कर रही इशारा है
जमीं पे देख भी लो क्या हसीं नज़ारा है
घटा उमड़ती हुई आज कह रही मुझसे
उदासियों का नज़ारा नहीं गवारा है
ये आ रही है बराबर सदा सी कानों में
मुझे किसी ने बड़ी आस से पुकारा है
कमाल चाँद की क़ुर्बत का देखिये साहिब
कि उसके होने से चमका हरिक सितारा है
करार ही न मिला हैं कहीं मुहब्बत में
ये बात और है की फिर उसे निहारा है
वही ग़ज़ल है वही गीत है मगर देखो
अधर से उनके जो गुज़रा तो क्या शरारा है
वो जो कहे थे कभी मीत भी मुझे अपना
प्रखर को गैर समझ अब किया किनारा है
टूट कर क्यों न वो बिखर जाए
टूट कर क्यों न वो बिखर जाए
हाथ खाली बशर जो घर जाए
जुल्फ़ उनकी बिखर बिखर जाए
मेरे आने की जो ख़बर जाए
थक गया भाग कर मैं जीवन से
चाह है अब यहीं ठहर जाए
राह कोई नही अगर सूझे
आदमी फिर भला किधर जाए
चैन आ जाए फिर मेरे दिल को
वो इधर से अगर गुज़र जाए
इस तरह अब सँवर के मत निकलो
जाने किसकी फिसल नज़र जाए
हाथ हाथों में जो रहे उनका
उम्र यूँ ही प्रखर गुजर जाए
राज़े- दिल हमसे बताते क्यूं भला
राज़े- दिल हमसे बताते क्यूं भला
प्यार करते तो छुपाते क्यूं भला
इल्म होता गर तुम्हें कोई है ग़म
दिल तुम्हारा हम दुखाते क्यूं भला
माँग में सिंदूर उनकी जँच रहा
आइने से मुँह चुराते क्यूं भला
देखकर वो दूसरो की थालियां
शोर अब इतना मचाते क्यूं भला
अब नही है काम का ये आदमी
बोलियां ऐसी उठाते क्यूं भला
तू उठा पर्दा सियासत से जरा
बीज नफ़रत का उगाते क्यूं भला
खा नही पाए जिसे दीमक कभी
सच यहाँ ऐसा छिपाते क्यूं भला
हैं अगर वो भी हमारे तो कहो
जाल फिर ऐसा बिछाते क्यूं भला
भूल जो तुमको गये बोलो प्रखर
तुम उन्हें फिर से बुलाते क्यूं भला
मुहब्बत हो गई तो क्या बुरा है
मुहब्बत हो गई तो क्या बुरा है
मुहब्बत ही ज़मानें में ख़ुदा है
कभी मिलकर नहीं होना जुदा है
मेरे मासूम दिल की यह दुआ है
तुम्हारे प्यार में पीछे पड़ा है
करो अब माफ़ भी जिद पर अड़ा है
ज़माना इस तरह दुश्मन हुआ यह
सभी को लग रही मेरी ख़ता है
जहाँ की आदतें बदली नहीं हैं
मेरा दिल इसलिए पीछे मुडा है
तुम्हीं बढ़कर हमारा हाथ थामों
ज़माना तो छुडाने पे तुला है
निभायेगी वही क़समें वफ़ा की
वही दिल की हमारे अब दवा है
न माँगूं प्यार की मैं भीख उनसे
हाँ मेरे साथ भी मेरा खुदा है
प्रखर की ज़िन्दगी का फैसला भी
उन्हीं की मर्ज़ी पर आकर रुका है
खोला भोले ने द्वार सावन में
खोला भोले ने द्वार सावन में
उमड़ा भक्तों का प्यार सावन में
देखी हमने न भीड़ ऐसी तो
जैसे लगती कतार सावन में
हो सफल काज सारे भक्तों के
भक्त करते जै कार सावन में
मेहरबानी है हम पे भोले की
कर रहे भव से पार सावन में
तुम उठाकर जिधर भी सर देखो
होती बम-बम पुकार सावन में
शिव करें काज सब के ही पूरे
हो चमत्कार यार सावन में
शिव की महिमा से ही प्रखर जागे
हो गये शिव निसार सावन में
क्यों प्रखर शांत हैं घटाएं यह
किसका है इन्तज़ार सावन में
हम जताऐंगे प्यार सावन में
हम जताऐंगे प्यार सावन में
बाँह भर लेंगे यार सावन में
वो तो मनुहार भी गजब करते
लाते पायल उधार सावन में
प्यारा प्यारा है हर तरफ़ मौसम
लूँ सजन को पुकार सावन में
प्यार के आज हम नशे में तो
हो गये कर्ज़दार सावन में
हम मिलेंगे उन्हें ये वादा है
जब पड़ेगी फुहार सावन में
एक तेरे न आज मिलने से
खोया दिल का करार सावन में
छू के तुझको चली हवाएं जो
मिल रहा है करार सावन में
तू किसी के लिए अब दुहाई न कर
तू किसी के लिए अब दुहाई न कर
वक्त के साथ चल औ भलाई न कर
आज कोई नही है यहाँ पर तेरा
चीज अपनी कभी तू पराई न कर
अपनी दौलत लुटाकर तू बेकार में
यार अपनी यहाँ ख़ुश नुमाई न कर
गुफ़्तगू चाहे जितनों से कर तू यहांँ
पर किसी की किसी से बुराई न कर
भूल जा तू उसे और भी हैं हँसी
एक उसके लिए जग हँसाई न कर
इक नज़र तो इधर देख ले बेहया
इन हसीनों की खातिर कमाई न कर
हाल इनके घरों के सही कुछ नहीं
इनकी बेकार में तू बढ़ाई न कर
लोग तरसे न पीने को पानी प्रखर
तू जमींनों की इतनी खुदाई न कर
सौगात सावन में
तुम्हारी चाहतें हमको मिली सौगात सावन में
जताकर प्यार को अब हम करें शुरुआत सावन में
बढ़ाना है नहीं तुझसे मुझे अब राबता कोई
सतायेगा मुझे फिर से तू हर इक रात सावन में
झुकाकर क्यों नयन बैठे हमें अब लूटने वाले
बड़ा बेताब था ये दिल करो कछ बात सावन में
अगर लौटे नहीं मेरे सनम परदेश से घर को
रुलायेंगे मुझे अक्सर यही सदमात सावन में
तुम्हें कैसे लिखू ख़त में मुझे मिलते नहीं अल्फ़ाज़
मचल उठते तुम्हारे बिन यहां जज़्बात सावन में
बताओ किस तरह से हम करें इजहार चाहत का
नहीं मिलने हमें देती है यह बरसात सावन में
करें किससे प्रखर शिकवा इनायत जो नहीं रब की
इधर को छोड़ कर सब में बँटी खैरात सावन में
वो मेरी बातों से लगता है ख़फ़ा हो जाएगा
वो मेरी बातों से लगता है ख़फ़ा हो जाएगा
एक तरफ़ा प्यार मेरा हादसा हो जाएगा
चाहते थे यार जिसके साथ जीना उम्र भर
हमने सोचा ही नहीं वो बेवफ़ा हो जाएगा
मैं भुला पाया नहीं उल्फ़त को तेरी आज तक
और क्या होगा सबब जो दूसरा हो जाएगा
ज़िन्दगी यूँ भी गुज़र सकती है मेरी बिन तेरे
साथ तू मेरे चले तो आसरा हो जाएगा
था यही मालूम सबको देखकर चाहत मेरी
मेरी नज़रों में वही मेरा ख़ुदा हो जाएगा
मान कर वह बात मेरी साथ चल दें दो कदम
ज़िन्दगी भर के लिए फिर वास्ता हो जाएगा
लोग गायेंगे प्रखर के ही वफ़ा के गीत कल
प्यार का मैयार हमसे कुछ बड़ा हो जाएगा
परीक्षा सिर पे वो सोया पड़ा है
परीक्षा सिर पे वो सोया पड़ा है
कि किस औलाद से पाला पड़ा है
वफ़ा की बात मत करना अभी तुम
हमारा दिल अभी टूटा पड़ा है
क़दम रखना ज़मीं पर सोच कर तू
गली में दिल तेरी मेरा पड़ा है
बिकी हर चीज़ है बाज़ार में अब
न बिकता दिल जो ये टूटा पड़ा है
उठा लो हर किसी गिरते हुए को
नहीं ये सोचना अंधा पड़ा है
हुकूमत आप तो करते सभी पर
वतन क्यों आज ये गंदा पड़ा है
वतन आजाद क्या ऐसे हुआ था
गले में कितनों के फंदा पड़ा है
प्रखर पहचान पाओगे न उनको
खनकते सिक्कों का पर्दा पड़ा है
एक दिन जीतेंगे चाहे कुछ भी हो
एक दिन जीतेंगे चाहे कुछ भी हो
दिल तुम्हें ही देंगे चाहे कुछ भी हो
प्यार के दीपक जलेंगे दिल में जब
प्रेम गुण गायेंगे चाहे कुछ भी हो
जब भजन होगा सिया के राम का
राम घर आयेंगे चाहे कुछ भी हो
झूठ का होगा यहाँ जब फैसला
मुँह तभी खोलेंगे चाहे कुछ भी हो
क्या कहूँ आदत यही अपनी रही
वक्त है कतरेंगे चाहे कुछ भी हो
अब वफ़ा का नाम मत लो सामने
जो हुआ सह लेंगे चाहे कुछ भी हो
दे दिया उसको वचन है यह प्रखर
अब नही बदलेंगे चाहे कुछ भी हो
इश्क़ की छाई अब खुमारी है
इश्क़ की छाई अब खुमारी है
रात करवट भरी गुजारी है
सबने बोला बड़ी बिमारी है
माँ ने फिर भी नज़र उतारी है
फूल आयेंगे एक दिन सुंदर
बागबाँ ने करी तैयारी है
चाँद कुछ भी न आसमां में अब
उससे प्यारी जमीं हमारी है
कैसे करता गिला रकीबों से
हाथ उनके दिखी कटारी है
जुल्म़ सहना समाज के हँसकर
आज इंसान की लाचारी है
लोग कहते हैं राहबर जिसको
वो हक़ीक़त में इक शिकारी है
लाज़ आती नहीं प्रखर उसको
ऐसा लगता बड़ा भिखारी है
हसीनों के कातिल इशारों ने मारा
हसीनों के कातिल इशारों ने मारा
हुआ प्यार तो बेवफ़ाओं ने मारा
थी हसरत बहुत डूब जाने की जिन में
मुझे उन नशीली निगाहों ने मारा
मुहब्बत में मुझपे चला जब मुकदमा
अदालत के झूठे गवाहों ने मारा
हुआ फिर अचम्भा पलट कर जो देखा
हमें तो हमारी वफ़ाओं ने मारा
मुक़द्दर पे अपने वो हैरान होगा
जो पत्थर उसे गुनहगारों ने मारा
बचेंगे कहाँ से ये आशिक जहाँ में
हमेशा इन्हें बेवफ़ाओं ने मारा
गरीबों में चाहत सिसकती रहेगी
हसीनों के ऊँचे ख़यालों ने मारा
कहाँ हीर रांझा जनम फिर से लेंगे
उन्हें जबसे जग के रिवाज़ों ने मारा
नसीहत सभी दे रहें हैं प्रखर को
पता भी है खंज़र हज़ारों ने मारा
देख तेरे बिन लगे कितनी विरानी हर तरफ
देख तेरे बिन लगे कितनी विरानी हर तरफ
दूर है तू फिर भी है तेरी निशानी हर तरफ
देखिये उनकी बहू कितनी बखानी हर तरफ
दूध को वो दूध कर दे और पानी हर तरफ
है खुशी की चाह तो अब बात इतनी याद रख
इस जहाँ में भी खुशी पड़ती जुटानी हर तरफ
कौन सच्चा कौन झूठा पूछ मत संसार में
आग को भी लिख रहे सब लोग पानी हर तरफ
सोच लो पैसे बिना जो काम चल जाता यहां
क्यों पड़े इंसान को दौलत कमानी हर तरफ
कर रहें हैं गलतियां ये लोग सारे सोचकर
पर नहीं ये जानते क्या है कहानी हर तरफ
दिल कहे अब साँस ले ले है हँसी ये वादिया
क्या पता आगे नही हो बागवानी हर तरफ
सात फेरे बाद भी देखा न हमने प्यार को
प्यार की झूठी लगे मुझको कहानी हर तरफ़
नींद कैसे आयेगी बोलो तुम्हारे बाप को
जब तुम्हें दिखती नहीं बहनें सयानी हर तरफ
गुल नहीं हो कम खिलाये तुम जवानी में प्रखर
आज भी घेरे खड़ी यादें पुरानी हर तरफ
बग़ावत न कर सका
अपने ही हक की मैं भी हिफ़ाज़त न कर सका
कतरा मेरे बदन का बग़ावत न कर सका
देते हैं लोग गालियां कुछ इस तरह मुझे
जिनकी किसी से अब मैं शिकायत न कर सका
चाहत ने उसकी उसके ख़यालों में गुम रहा
अपने ही राम जी की इबादत न कर सका
यूँ प्यार तो हमारा भी मजनूँ से कम नहीं
लेकिन कभी मैं उस से शरारत न कर सका
लड़ता रहा सभी से जो इंसान उम्र भर
रोएगा बाद में कि वो चाहत न कर सका
यारों के बीच बैठ के लाखों उड़ा दिए
बच्चे खुशी से चहकें वो दावत न कर सका
क़िस्मत से जिनकी होती है बरकत कमाई में
उनसे किसी भी हाल अदावत न कर सका
जिनके गरीब खाने में खाया है बैठकर
उनसे किसी भी लम्हा सियासत न कर सका
कुर्सी तो मैंने पा ली है हाथों को जोड़कर
लेकिन दिलों पे सबके हुकूमत न कर सका
कैसे कोई भरोसा भी तुझ पर करे प्रखर
आहें बता रही तू वकालत न कर सका
दूरियां जानकर बढ़ाने से
दूरियां जानकर बढ़ाने से
खास रिश्ते हुए अजाने से
हो गया घाटा कुछ ज़ियादा ही
दुश्मनी आपसे निभाने से
जल उठे हैं चराग़े – दिल सारे
आपके आज एक आने से
बात दिल की बता दे तू उसको
होगा क्या प्यार को छुपाने से
उससे नज़रें नहीं मिली बेशक
जानता हूँ उसे ज़माने से
इतना रूठा नहीं सनम तेरा
मान जायेगा वो मनाने से
बात बन जायेगी अभी तेरी
हाथ से हाथ ये मिलाने से
साथ वह और किस तरह देता
प्यार होता है क्या जताने से
प्यार करते हो तो करो ज़ाहिर
कुछ न दिल में इसे छुपाने से
जिनको मिलने को दौड़े तुम जाते
वो भी आते किसी बहाने से
कहते आये हैं यह प्रखर पुरखे
बात बनती है बस बनाने से
छोड़ दे यूँ प्रखर आना-जाना
कुछ न मिलता गरीब खाने से
नसीब जिनको यहाँ स्याह रात होती है
नसीब जिनको यहाँ स्याह रात होती है
सुना उन्हीं की न ज्यादा हयात होती है
जमाये अपने हुनर का सही से जो सिक्का
उसी के कदमों तले कायनात होती है
कभी करीब न आया वो भूलकर मेरे
उसी से चाह के देखो न बात होती है
जो अपने मुँह से करें है बढ़ाईं अपनी ही
उसी की बात बड़ी वाहियात होती है
चले न जाओ शरण में खुदा की अब तुम भी
उन्हीं के फ़ैज़ से ग़म से निजात होती है
प्रखर मनायेगा कैसे तू जश्ने आज़ादी
हरेक रोज़ यहां वारदात होती है
बढ़ी है प्यास धरती की बरसता ही नहीं सावन
बढ़ी है प्यास धरती की बरसता ही नहीं सावन
उगाने हैं उसे पौधे समझता ही नहीं सावन
जमीं की आग से बेसक झुलसता ही नहीं सावन
मगर ये मत कहो अब तुम गरज़ता ही नहीं सावन
उमस इतनी बढ़ी है की सभी इंसान व्याकुल हैं
बतायें आज किससे हम निरखता ही नहीं सावन
गिराने पे तुला है घर बनाया है जो मिट्टी का
बचायें अब उसे कैसे निकलता ही नहीं सावन
तपन जितना सहे धरती बरसता उतना सावन है
कभी ये तुम नहीं कहना तड़पता ही नहीं सावन
उतर आया उधर सावन जमीं से जिस तरह मिलने
सुना तो हमने था ये की बिलखता ही नहीं सावन
प्रकृति से जो करे नफ़रत यहाँ संसार में आकर
प्रखर उसकी गली देखो गुजरता ही नहीं सावन
मेरी परवरिश का असर देखते हैं
मेरी परवरिश का असर देखते हैं
वो घर को मेरे इस कदर देखते हैं
किताबों में जिनका असर देखते हैं
कभी भी नहीं उनका घर देखते हैं
पलट वार हमने किया ही कहाँ कब
अभी तक तो उनका हुनर देखते हैं
मिलेगी न हमको यहां मौत ऐसे
चलो साँस को बेचकर देखते हैं
करोगे कभी तो इशारा हमें तुम
तुम्हारी अभी तक नज़र देखते हैं
न भायी जहाँ में कोई चीज हमको
मगर फिर भी तेरा नगर देखते हैं
प्रखर भी तो गुरुबत का मारा हुआ है
उठा के नज़र सब ज़बर देखते हैं
भाई-भाई से रार मत करना
भाई-भाई से रार मत करना ।।
घर की इज़्ज़त पे वार मत करना
जान भी माँग ले अगर भाई ।
तो यक़ीं तार तार मत करना ।।
जो न समझे यहाँ वफ़ा तेरी ।
तू कभी उससे प्यार मत करना ।।
माफ़ इस बार हो ख़ता मेरी ।
बाद बेशक दुलार मत करना ।।
क़समों वादों को जो भुला डाले
उसका फिर इंतजार मत करना ।।
कितना कुछ है खाने को दुनिया में ।
देख अब तू शिकार मत करना ।।
खुद को खुद की नज़र न लग जाये ।
इस तरह से शृंगार मत करना ।।
सबका सम्मान हो बराबर से ।
मन में पैदा विकार मत करना ।।
प्रेम अनमोल है प्रखर गहना ।
इसका तू कारोबार मत करना ।।
गरीबों का यहाँ दाता नहीं है
गरीबों का यहाँ दाता नहीं है
किसी से प्यार वो पाता नहीं है
मिली जिसको यहाँ ये यार दौलत
किसी की आँख को भाता नहीं है
मसीहा उस जहाँ में थे कभी वो
जहाँ इंसान भी जाता नहीं है
नहीं मजदूर अब पोषित बता दो
बयाँ अख़बार कर पाता नहीं है
जताने चल दिया वो प्यार हमसे
जिसे यह लफ़्ज़ तक आता नहीं है
भुलाया ही उसे होगा मुनासिब
पलट कर वो अग़र आता नहीं है
प्रखर ने जाँच ली नब्ज़ -ए – ज़माना
न हो मतलब तो अपनाता नहीं है
वो रिश्ता और बढ़ाने की क्या ज़रूरत है
वो रिश्ता और बढ़ाने की क्या ज़रूरत है
न प्यार हो तो निभाने की क्या ज़रूरत है
जो कट रही हो तेरी ज़िन्दगी मज़े में फिर
तो और पैसे कमाने की क्या ज़रूरत है
हैं तेरे पास हरिक चीज़ जब ज़रूरत की
तो कोई चीज़ भी लाने की क्या ज़रूरत है
ख़ुशी से चल न सको साथ तुम अगर मेरे
तो बोझ दिल पे उठाने की क्या ज़रूरत है
करोगे योग तो होगे सुखी भी जीवन भर
ये बातें आज छुपाने की क्या ज़रूरत है
किसी से प्यार न तुमको, न दिल ही टूटा हो
तो नग़में प्यार के गाने की क्या ज़रूरत है
प्रखर है प्यार उसे गर तो दौड़ा आयेगा
किसी को आज मनाने की ज़रूरत क्या है
माँ की सेवा पूर्ण मन से हो
दाल रोटी खीर चावल संग तरकारी रखो
माँ की सेवा पूर्ण मन से हो न मक्कारी रखो
जब करे मन गोद में सर रख के सोने के लिए
ख़्वाब पूरा भी हो तेरा साथ महतारी रखो
काम कुछ आसान हो जायेंगे तेरे आज भी
बात मानों तो कहूँ मैं एक दरबारी रखो
मित्र तो सुग्रीव पाये राम जैसा पास में
आप भी तो मित्र वैसा इक सदाचारी रखो
चाहते हो दूर तंगी आप जो परिवार से
इक दो बेटा नौकरी पर आप सरकारी रखो
छोड़ता कब यार तेरा दाँव पाकर आज है
एक बस तुम ही यहाँ पर अब वफ़ादारी रखो
दोस्त पहले से नहीं अब दोस्त इस जग के रहे
दुश्मनों के साथ भी तुम आज कुछ यारी रखो
दोस्त का अहसान जब अब आपको लेना पड़े
यार फिर तो बोझ कोई और तुम भारी रखो
बख्श दे अब जान मेरी मैं न आऊँ बीच में
सिलसिला तुम प्यार का ये गैर से जारी रखो
हम तुम्हारे साथ हैं डरना नहीं बिल्कुल प्रखर
हार मत मानों अभी तुम जंग को जारी रखो
दूध की कीमत में पानी दे गया
दूध की कीमत में पानी दे गया
इक सबक वह आज ज्ञानी दे गया
ताश के पत्तों सा वह जीवन जिया
दाँव चलते चलते रानी दे गया
भर गया था मन उसी का प्यार से
जाते-जाते इक कहानी दे गया
भूल उसको मैं नहीं जाऊँ कभी ।
जाते-जाते वह निशानी दे गया
यह प्रखर उसको भुला सकता नहीं
राज़ वो इक आसमानी दे गया
मज़ा रह जायेगा
दूर जाएगा तो जीने का मज़ा रह जायेगा
बाद में ये दिल खुशी को खोजता रह जायेगा
जाम हाथों में थमाकर यूँ न जाओ छोड़कर
तेरे बिन सूना हमारा मयक़दा रह जायेगा
जाम हाथों में लिया तो पीना भी अब सीख ले
दर्द दिल का ये तेरे दिल में दबा रह जायेगा
जल गये जो दीप चाहत के हमारे दिल में अब
लाख अब तूफ़ाँ भी आये यह जला रह जायेगा
रोशनी उनको मिलेगी उनसे ये वादा रहा
प्यार में ये दिल हमारा अब जला रह जायेगा
फड़फड़ाने से तेरे अब कुछ न बदलेगा यहाँ
श्वास तेरी आखिरी है सब धरा रह जायेगा
जो वसन पर अब प्रखर ये देख लो मेडल लगा
वो जमीं पर बाद तेरे सब पड़ा रह जायेगा
प्यार करता है मगर फिर भी छुपाया होगा
प्यार करता है मगर फिर भी छुपाया होगा
दिल की बातों को कहीं और घुमाया होगा
उसकी हिम्मत से मैं वाक़िफ़ हूँ बहुत पहले से
हर सितम हँसते हुए उसने उठाया होगा
डूब जाए न कहीं मौजों में कश्ती दिल की
बस यही सोच के साहिल पे वो आया होगा
दे रहा आज दिलासा जो हमें बढ़ चढ़ कर
साथ खंज़र भी कहीं इसने छुपाया होगा
मान भी जा तू प्रखर आज की दुनिया का चलन
तेरे अपनों ने तुझे कुछ तो सिखाया होगा
आपके बिन जो ज़िन्दगी होगी
आपके बिन जो ज़िन्दगी होगी
रोशनी में भी तीरगी होगी
साथ तेरे जो आशिक़ी होगी
प्यार की फिर नही कमी होगी
डर न मुझको है इस ज़माने का
जब तलक साथ तू खड़ी होगी
बीत जायेगी रात भी काली
रात इतनी नही बड़ी होगी
कल्पना क्या करें खुशी की हम
वो भी तुम बिन न लाज़िमी होगी
डर ही जायेंगे लोग सब तुझसे
हाथ में जब तेरे छुरी होगी
याद कर लेंगे पाठ भी बच्चे
गुरु के हाथों में जब छड़ी होगी
छूटते घर गाँव सपनों के लिए
छूटते घर गाँव सपनों के लिए
कोशिशों में ही रहा सपने लिए
एक पल को भी सुकूं पाया नही
भागता जो भी रहा सुख के लिए
क्या मिलेगा कह नहीं सकता अभी
पर लडूँगा मैं सदा हक के लिए
ज़िन्दगी अब इम्तिहाँ मत ले मेरा
सच लिखूंगा आज मैं सबके लिए
जीत ही सब कुछ नही देती यहाँ
हार से है सीखा बढ़ने के लिए
साथ भी छोड़ा सजन का लोभ में
आज बैठी चंद वो गहने लिए
पूछते बच्चे भी मुझसे आज़ हैं
क्या बचाया है प्रखर अपने लिए
ज़िन्दगी एक सज़ा हो जैसे
ज़िन्दगी एक सज़ा हो जैसे
आपकी उसमें दुआ हो जैसे
उसकी मुस्कान ही मेरे यारो
मर्ज की मेरे दवा हो जैसे
दूर जिससे रहा मैं इतने दिन
पास वो आने लगा हो जैसे
फिर ग़ज़ल लिखने कोई बैठा है
इश्क़ नाकाम हुआ हो जैसे
देखकर दूरियाँ ये लगता है
रूठा अब अपना खुदा हो जैसे
तेरा मिलना हमें यूँ लगता है
ये दुआओं का सिला हो जैसे
पूछ मत आज खुशी इस दिल की
हम सफ़र आज मिला हो जैसे
साथ पाकर तेरा यूँ लगता है
पास में अपना खुदा हो जैसे
जो प्रखर देख के कट जाता था
वो ही अब पीछे लगा हो जैसे
मेरा उनका झूठा फ़साना नहीं है
मेरा उनका झूठा फ़साना नहीं है
कोई लब पे दूजा तराना नहीं है
मुझे अपने दर पे बुलाना नहीं है
मेरे रब तेरे बिन ठिकाना नहीं है
बुलायें उन्हें तो बुलायें भी कैसे
हमारा सा उनका घराना नहीं है
सभी स्वार्थ बस ही बने आज अंधे
क्या जग में कोई भी सयाना नहीं है
उठाते हैं उँगली सभी दूसरो पे
खुदी पर किसी का निशाना नहीं है
छुपाये खड़ा है जो हाथों में खंजर
गले उसको अब तो लगाना नहीं है
मुहब्बत के करता है क्यों झूठे दावे
जो तुझको ये रिश्ता निभाना नहीं है
लो आ ही गया तेरे घर यार दुश्मन
गले मत लगा पर भगाना नहीं है
बड़ी मुश्किलों से उसे नींद आई
वो हारा थका है जगाना नहीं है
दुवाएँ भी अपने बुजुर्गों की ले लो
यहाँ खर्च होता ख़ज़ाना नहीं है
चली जाए घर से खुशी रूठकर जो
प्रखर ऐसी दौलत कमाना नहीं है
ख़बर ये है झूठी शराफ़त नही है
ख़बर ये है झूठी शराफ़त नही है
मेरे मुल्क़ में अब बग़ावत नही है
नही ग़म मुझे है की दौलत नही है
मगर पास झूठी मुहब्बत नही है
वफ़ा से मेरी जिसको राहत नही है
ठहरने की उसको इज़ाज़त नही है
लहू से जो अपने वतन को हैं सीचें
कभी उनपे होती सियासत नही है
जवानों की खातिर दुवाएं करो सब
बिना उनके अपनी हिफ़ाज़त नही है
करूँ वार छुपकर भला क्यों किसी पर
मेरे दोस्त मुझमें वो आदत नही है
वफ़ा करके हमने ही ये भूल कर दी
कहा तुमसे कोई शिकायत नही हे
दिलों में छुपा है वफ़ा का समुंदर
प्रखर कोई खेले इज़ाज़त नही है
मेरे ही लिए तो माँ
हाँ मेरे ही लिए तो माँ जहाँ का ग़म उठाती थी
तभी तो हर ख़ता मेरी यहाँ वह भूल जाती थी
हमारी मुस्कराहट पे जो खुद को भूल जाती थी
वही तो थी मुझे जो कल को बेटा कह बुलाती थी
हमारी इक हँसी से वो तो अपने ग़म छुपाती थी
नहीं वो और है कोई , मेरी माँ मुस्कराती थी
सँवरना तुम क्या जानोगे सँवरना हम क्या जानेंगे
सँवरना तो मुझे बचपन में मेरी माँ सिखाती थी
कभी खाली नही भेजा मुझे परदेश को उसने
दुवाएँ साथ में देकर मुझे बस में बिठाती थी
बहुत कोमल हृदय देखा है मैनें अपनी माता का
ज़रा सा रो अगर दूँ मैं तो झट से दौड़ आती थी
प्रखर उलझे नहीं बिखरे हमारे बाल ये सिर के
हमारे बाल ये जब तक हमारी माँ बनाती थी
सादगी क्या चीज है
जो पढ़ाते पाठ थे की सादगी क्या चीज है
भूख ने उनको सिखाया बेबसी क्या चीज है
बढ़ गई है आदमी में किस कदर हैवानियत
खा गये हैं जानवर तो आदमी क्या चीज है
हौसलों ने पाल रख़्खा हो जिसे इस दौर में
पूछियेगा फिर न उससे कीमती क्या चीज है
गर्दिशो से उठ के ऊपर फैसले जिसने लिए
ज़िन्दगी उसको सिखाती लाज़मी क्या चीज है
ठोकरें खाकर सँभाला जिसने अपने आप को
जानता वो ही यहाँ पर ज़िन्दगी क्या चीज है
लूटकर इस देश को कुछ भर रहे हैं अपना घर
अब नहीं तुम कह सकोगे की कमी क्या चीज है
भूल जाता हूंँ प्रखर मैं उस वक़्त अपना दर्द भी
यार गर हँसकर मिले तो ये नमी क्या चीज है
वफ़ा में कभी बेइमानी न होती
जो अलमस्त इतनी जवानी न होती
वफ़ा में कभी बेइमानी न होती
न आती कभी तुहमतें यूँ हमीं पर
ग़रीबी की गर मेहरबानी न होती
वफ़ा ही वफ़ा उगती संसार में फिर
अगर बैर की बागबानी न होती
किया है फरिश्तों ने बदनाम जिसको
वही जो न हो ऋतु सुहानी न होती
बचा लो खिज़ा को शजर तुम लगाकर
न होते शजर ज़िन्दगानी न होती
अगर श्याम में यह न होती वफ़ा तो
जुड़ी राधिका से कहानी न होती
अगर दोष होता कोई आज हममें
तो चाहत हमारी पुरानी न होती
सुना दो हमें तुम सज़ा आज ऐसी
कि उसके बिना ज़िन्दगानी न होती
वफ़ा ही प्रखर को न देते अगर तुम
अमर इस कदर फिर कहानी न होती
अब साथ तुम्हारे
हमको भी मुहब्बत की हर रस्म निभानी है
अब साथ तुम्हारे ही यह उम्र बितानी है
कुछ और नही कहना ऐ यार हमें मिलकर
इन आँखों से चाहत का बहता हुआ पानी है
मैं भूल नही सकता ऐ जान तुम्हें इक पल
साँसों में मेरी जब तक ऐ यार रवानी है
तुम साथ अगर मेरे कुछ दूर सफ़र कर लो
तो लोग सभी समझें यह प्रीत पुरानी है
वादा न करो हमसे तुम आज यहाँ कोई
हर बात मुहब्बत की अब याद जुवानी है
हम आज तुम्हें अपना हर गीत बना लेंगे
बस एक दफ़ा कह दो यह प्रेम कहानी है
किसने तुम्हें रोका है तुम खूब खता कर लो
मैं यार खता तेरी समझूँगा निशानी है
आज भी हूँ मैं
किसी के प्यार का दीपक जलाता आज भी हूँ मैं
वफ़ा करके भी उससे क्यों जुदा सा आज भी हूँ मैं
बुझाना चाहता हूँ मैं वफ़ा का आज वह दीपक
मगर मजबूर हूँ उनका ठिकाना आज भी हूँ मैं
मिलेंगे वो गली में तो बदल मैं रास्ता दूँगा
ख़बर ही थी नही ये की निशाना आज भी हूँ मैं
न जाने क्यों कदम मेरे खिचें यूँ ही चले जाते
कोई बतला मुझे ये दे मिटा क्या आज भी हूँ मैं
जुदा होके भी उनसे क्या कहें दिल की तमन्ना को
दीया सा राह में ये दिल जलाता आज भी हूँ मैं
खिलौना वह समझकर जिस तरह मुझसे यहाँ खेलें
उन्हीं से यार अब रिश्ता निभाता आज भी हूँ मैं
सुना दो तुम प्रखर अब तो ख़बर उस बेवफ़ा की कुछ
यहाँ जिसके लिए आसूँ बहाता आज भी हूँ मैं
कब तक
तू संवरने से रही परी कब तक
लब पे झूठी ख़ुशी रही कब तक
नोच कर खा गये बदन कौव्वे
लाश पेड़ों पे झूलती कब तक
जाने वाले चले गये सारे
हम भला अब रहें दुखी कब तक
पूछो माचिस की तीलियों से तुम
आग की लपटों से जली कब तक
देख लें प्यार को तेरे हम भी
रहती जिंदा ये आशिकी कब तक
पास पैसा अगर नहीं होगा
लोग रख्खेंगे दोस्ती कब तक
कुछ तो अपने लिए प्रखर सोचो
ऐसे गुजरेगी ज़िन्दगी कब तक
उसके होंठो पे दुआ हो जैसे
उसके होंठो पे दुआ हो जैसे
फूल पत्थर पे खिला हो जैसे
दिल में इक दर्द उठा हो जैसे
तीर फिर दिल में चुभा हो जैसे
क्यों उसे देख के ये है लगता
खुलते होंठो को सिला हो जैसे
हाथ हाँथों में सनम ये लेकर
दूर कुछ साथ चला हो जैसे
उनकी बातों से यही लगता है
दिल में कुछ और छुपा हो जैसे
वो पुकारेगा यकीं है मुझको
फिर भी लगता वो खफ़ा हो जैसे
जिस तरह कर रहा दिलवर खिदमत
बाद बरसों के मिला हो जैसे
इस तरह हाँफता है वो उठकर
खुद से जंग लड़ा हो जैसे
इस तरह देखता है वो मुड़कर
नींद से आज जगा हो जैसे
इस बार होली में
निभायेंगे सभी रस्में सुनों इस बार होली में
उड़ा कर प्रीत का हम रँग मलेंगे यार होली में
खफ़ा जो है मना लेंगे उन्हें हम यार होली में
मज़ा तो यार ही तब है मिलें जन चार होली में
लगायेंगे गले सबको भुलाकर हम गिले शिकवे
मिटा कर दूरियाँ दिल की करेंगे प्यार होली में
खबर तो है मुझे लेकिन यकीं दिल को नही होता
न आयेगा कभी मिलने मेरा दिलदार होली में
भुला दूँ मैं जहाँ सारा मगर इक याद वो रहता
उसी के वास्ते छलका हृदय से प्यार होली में
कभी तुमने लगाया था मुझे भी रंग हाथों से
तभी से यार मैं अक्सर हुआ बीमार होली में
करे ऐसा प्रखर अब क्या कि तू इस बार आ जाये
सकूँ की नींद मिल जाये जो हो दीदार होली में
हर बार होली में
किया जख़्मी उसी ने है मुझे हर बार होली में
गुलो के रंग से मुझपर किया जो वार होली में
नही रूठों कभी हमसे भुला भी दो गिले सारे
तुम्हारे ही लिए लाएँ हैं हम यह हार होली में
रही अब आरजू इतनी कि तुमसे ही गले लगकर
बयां मैं दर्द सब कर दूँ सुनों इस बार होली में
वही वादा तुम्हारा अब दिलाते याद हम तुमको
कभी तुमने कहा था हम मिलेंगे यार होली में
ख़िज़ां की बात मत करना ये फ़ागुन का महीना है
गले लगकर दिखाए जो वही तो यार होली में
खुशामद कर रहा झूठा यकीं करना नही लोगो
चुभाकर पीठ में खंजर जताए प्यार होली में
दिला देगा यकीं तुमको अदा से आज वह अपनी
छुपाए घूमता जो है यहाँ हथियार होली में
भुला दी दुश्मनीं कहता जहाँ से आज वो खुलकर
रफ़ीकों ने उसे देखा लिए तलवार होली में
सुना था मैं यही अक्सर नही कोई सफ़र में है
खुशी इस बात की अब संग है हकदार होली में
कभी माँगें खुदा से आदमी तो बस यही माँगे
नहीं जो गैर से मिलता मिले अधिकार होली में
करेंगे आज सब मिलकर दुआएं उस खुदा से हम
मिलें अब प्यार से सब ही न हो तकरार होली में
गिला कितना करोगे तुम हमारी इन ज़फ़ाओ का
दिखा देंगे तुम्हें भी कर के हम दीदार होली में
चलो अच्छा हुआ ये भी प्रखर को मिल गई छुट्टी
यही तो चाहता है उसका भी परिवार होली में
बढ़ गईं हैं आजकल मजबूरियाँ
बढ़ गईं हैं आजकल मजबूरियाँ
रेत में भी तैरती है मछलियाँ
सब मनातें आज हैं नारी दिवस
पर सुरक्षित हैं कहाँ ये नारियाँ
दूर रहकर भी नहीं हम रह सके
इस तरह दिल में बढ़ी बेताबियाँ
है नहीं चाहत किसी को काम की
सब दिखाते हैं फ़क़त सरगर्मियाँ
दाग सूरत पे नहीं मेरे लगे
हर तरफ़ अब हो रही तैयारियाँ
दौड़ आयेंगे हमारे पास सब
मीठी जब तक है जुबाँ की बोलियाँ
पंक्षियों की याद में हर वृक्ष की
सूखती सब जा रही हैं डालियाँ
माँ पिता की आजकल औलाद भी
काम की लेती न जिम्मेदारियाँ
क्या करें उम्मीद वो माता पिता
है अगर औलाद में मक्कारियाँ
सुन रहा है इस नगर में अब प्रखर
उड रही आकाश में अब मछलियाँ
कोई नहीं
हैं वहीं मुजरिम सजा कोई नहीं
बख़्श दें कहकर खता कोई नहीं
अब ख़ुदा ही यह करेगा फ़ैसला
दुनिया में उस से जुदा कोई नहीं
चाहते थे जिस तरह सबको यहाँ
उस तरह हमको मिला कोई नहीं
जो हमारी ज़िन्दगी में थे अहम
अब उन्हीं का मैं रहा कोई नहीं
मैं कभी इतिहास तो पढ़ता नही
पर सुना इंसान का कोई नहीं
खुश रहे वो आज इतनी है दुआ
मिल न पाए हम तो क्या कोई नहीं
क्या बतायें आजकल वह है कहाँ
जानता उसका पता कोई नहीं
आज रिश्तें हैं यहाँ व्यापार है
इसलिए करता दुआ कोई नहीं
कह रहा हूँ मैं प्रखर सुन लो सभी
मैं बुरा हूँ तो भला कोई नहीं
दिखाओ वह घटा काली कहाँ है
दिखाओ वह घटा काली कहाँ है
यहाँ चंचल नयन वाली कहाँ है
जुबाँ उसकी सुनों काली कहाँ है
दरख्तों की झुकी डाली कहाँ है
गुजारा किस तरह हो आदमी का
जमीं पर अब जगह खाली कहाँ है
जिसे हम चाहते दिल जान से अब
हमारी वो हँसी साली कहाँ है
मिलन अब हो गया शायद सजन से
बची अब होठ पर लाली कहाँ है
वफ़ा पर कल तुम्हारी जो फ़ना थी
बताओ आज घरवाली कहाँ है
निभाने यार से वादा गई थी
गिराई कान की बाली कहाँ है
मसल कर फेक देते सब सुमन को
खबर आती बता माली कहाँ है
बहन ही मानकर उसको शरण दी
नज़र उसपे बुरी डाली कहाँ है
जुबा मेरी न खुलवाओ यहाँ पर ।
खबर सबको कि हरियाली कहाँ है
प्रखर ने तो फ़कत की बात हँसकर
बता इसमें कोई गाली कहाँ है
ख्वाब आँखों में क्या पला था तब
ख्वाब आँखों में क्या पला था तब
छोड़कर जब सनम गया था तब
खत वहीं पे जला दिया था तब
बेवफ़ा जब सनम हुआ था तब
वक्त पे मैं पहुँच नहीं पाया
प्यार नीलाम हो चुका था तब
फासला चाह के किया उसने
प्यार का सिलसिला रुका था तब
कैसे कर ले यकीं सितमगर पे
उसकी हर बात में दगा था तब
राह कोई नजर न थी आती
पास कुछ भी न तो बचा था तब
खेल हम जाते जान की बाजी
साथ कोई नही खड़ा था तब
अब तो आँखों से बस बहे पानी
जख्म़ ऐसा हमें मिला था तब
दिल का सौदा करे प्रखर कैसे
प्यार में ही ठगा गया था तब
हमसे शिक़ायत कैसी
जुर्म की जब हो हुकूमत तो वकालत कैसी
पूछते लोग हैं फिर हमसे शिक़ायत कैसी
दुनिया वाले जो करें प्रेम तो अच्छा लेकिन
जब करें हम तो कहे लोग मुहब्बत कैसी
दिल बदलते हैं यहां लोग लिबासों की तरह
हमने बदला है अगर दिल तो क़यामत कैसी
लोग यूं ही तो नहीं मरते हैं हम पर यारों
ये ख़बर सारे ज़माने को है उल्फ़त कैसी
झूठ से बच तो नहीं सकता कभी तू भी प्रखर
बोलता सच हैं अगर तू तो सियासत कैसी
मीत मन का मिला ज़िन्दगी में
मीत मन का मिला ज़िन्दगी में ।
आ रहा है मज़ा आशिक़ी में ।।
यार ऐसा मिले हर किसी को ।
कर रहा हूँ दुआ बन्दगी में ।।
है नशा अब सुहाने सफ़र का ।
क्या करूँ मैं बता मयकशी में ।।
चाँद भी देखता है गगन से ।
कौन बैठा वहाँ चाँदनी में ।।
करता इज़्ज़त हूंँ मैं हर किसी की
है खुदा यार जो आदमी में ।।
इस कदर चाहतों का असर है ।
खो न दूँ मैं उसे बेखुदी में ।।
यार जो था यहाँ बेवफ़ा था ।
प्यार मिलता नहीं हर किसी में ।।
भूल जाऊँ किया था ये वादा ।
याद फिर आ रहा बेबसी में ।।
प्यास इतनी बढ़ी है प्रखर की
लुत्फ़ आता नहीं मयकशी में ।।
आज होते खफ़ा उसे देखा
आज कितने गुलाब डाली में ,
देख किन पे शबाब आली में ।।
आज होते खफ़ा उसे देखा ।
जब न पायी शराब प्याली में ।।
पूछते अब नही दौलत वाले ।
खाना कितना खराब थाली में ।।
बैठकर अब लगा रहे कीमत
बह गई जो शराब नाली में ।।
ले गई आज वह रक़म ज्यादा ।
पड गये हम हिजाब वाली में ।।
जख़्म सब भर गये गुलाबो के ।
आया जबसे शबाब डाली में ।।
अब नही पूछना प्रखर से तुम ।
किस लिए है गुलाब थाली में ।।
ज्ञान का दीपक जलाया देर तक
ज्ञान का दीपक जलाया देर तक
पाठ गीता का पढ़ाया देर तक
कुछ समझ आया न उनको क्या करूँ
बस यूँ ही मैं बड़बड़ाया देर तक
बात मेरी मान तो लेता है वह
मन ही मन पर बुदबुदाया देर तक
हँस पड़ा हूँ आज सुनकर बात जो
ऐसी बातों ने रुलाया देर तक
याद में जिसके गुजारे रात दिन
आज मुझको वो सताया देर तक
जिसके आने से मची थी खलबली
वो गले लगकर रुलाया देर तक
जख़्म जो उनसे मिलें थे प्यार में
मैं रफ़ू उनको कराया देर तक
कह रहा था बात दिल की आज वह
कान में जो फुसफुसाया देर तक
अब प्रखर करता गिला क्या आपसे
जब मिलें तो गुदगुदाया देर तक
दर्द दिल में उठा नहीं करते
दर्द दिल में उठा नहीं करते
लोग जब तक दगा नहीं करते
जख़्म क्यों अब मिला नहीं करते
आप शायद दुआ नहीं करते
किस यकी से कहें तुम्हें दुश्मन
दुश्मनी तुम अदा नहीं करते
इश्क़ तो लोग सब करे लेकिन
आजकल बस वफ़ा नहीं करते
प्यार में जान जो भी वारे है
जख़्म उन के भरा नहीं करते
क्यों न बोले कि प्यार कम हो गया
आप हमसे लड़ा नहीं करते
हाले-दिल सब प्रखर समझता है
आजकल क्यों मिला नहीं करते
कोई समझा न मेरी मजबूरी
बस लगा दी हैं तोहमतें झूठी
कोई समझा न मेरी मजबूरी
बात उस राहबर की करते हो
जिसने दुनिया ही लूट ली मेरी
अपना कहकर गले लगा लोगे
बस यही सोचकर थी मैं दौड़ी
कुछ पलों की मुझे खुशी दे दो
रात ये आख़िरी बची मेरी
करती इज़हार तो नहीं दिल का
पर मेरी राह को तका करती
बात कोई बड़ी न की उसने
सुर्ख क्यों आँख फिर रही मेरी
वो नहीं लौटकर प्रखर आया
जीस्त जिसके लिए सदा रोई
मिला क्या जहाँ से बता आदमी को
मिला क्या जहाँ से बता आदमी को
कि लूटा सभी ने सुना आदमी को
न आई कभी फिर सहर वो सुहानी
नहीं आदमी फिर मिला आदमी को
सफर तो सभी कर रहे जिंंदगी का
मगर खा रही है दवा आदमी को
गिला हर किसी को रहा है खुदा से
बनाया क्यों तूने बता आदमी को
दया धर्म का पाठ करतें सभी हैं
मगर क्या भला भी हुआ आदमी को
चला धर्म के मार्ग जो भी तुम्हारे
मिलें खार क्यों फिर बता आदमी को
बनाएँ यहाँ क्यों भला वो हुनर तू
लगाए गले तो चुभे आदमी को
नज़र तो उठाकर प्रखर यार देखो
मिला कब सकूँ है यहाँ आदमी को
खुद को तुमसे जुदा नहीं करते
खुद को तुमसे जुदा नहीं करते
मत कहो अब वफ़ा नहीं करते
मान लो बात आज तो मेरी
यार अब हम खता नहीं करते
भूल जाओ पुरानी बातों को
पास बैठो गिला नहीं करते
बादशाही खूँ में शामिल जिनके
शीश उनके झुका नहीं करते
जख़्म जबसे मिला मुहब्बत में
दिल किसी को दिया नहीं करते
बात वाजिब लगे अगर कोई
तो कभी हम हँसा नहीं करते
दूर जबसे हुए सनम हमसे
दिन भी अपने कटा नहीं करते
होगी मजबूरियाँ वहाँ उसकी
बात से वो फिरा नहीं करते
दीवारें लाख हो प्रखर घर में
रिश्ते दिल के बटा नहीं करते
कभी तुमसे नहीं रूठा करेंगे
कभी तुमसे नहीं रूठा करेंगे
यही बस आज तो वादा करेंगे
वफ़ा की तेरी हम पूजा करेंगे
नहीं अब हम सफर दूजा करेंगे
जिसे दिल आज दे बैठे हो दिलवर
वही दिल एक दिन तोड़ा करेंगे
मिलेगी काम से फुर्सत हमें जब
गली में तेरी हम घूमा करेंगे
न बहला दिल किताबो से कभी तो
तेरी तस्वीर का बोसा करेंगे
ग़ज़ल जब भी कहेंगे हम नई तो
वफ़ा की तेरी ही चर्चा करेंगे
हमारी हस्ती ही क्या है यहाँ पर
वफ़ा का तेरी जो सौदा करेंगे
वफ़ा बिक जाये लाखों में तुम्हारी
प्रखर खुद को वहाँ झूठा करेंगे
सज रहे आज वह लुभाने को
सज रहे आज वह लुभाने को
साथ में ज़िन्दगी बिताने को
सात फेरों सें जब बना बंधन
चल पड़े साथ हम निभाने को
आप आये यही बहुत होगा
चाहिए क्या गरीब खाने को
रूठ जाओ अगर कभी दिलबर
जान हाजिर तुम्हें मनाने को
दो बदन एक रूह हम दोनों
चाहते एक अब हो जाने को
एक मासूक ही नही यारों
और भी लोग है भुलाने को
प्रेम से बात कर प्रखर सबसे
आज रिश्ते नये बनाने को
बुरे गर बने तो शिकायत मिलेगी
बुरे गर बने तो शिकायत मिलेगी
भली आदतों से ही इज्जत मिलेगी
गरीबों के घर में शराफ़त मिलेगी
यहीं तो तुम्हें हर लियाकत मिलेगी
यही सोचकर हम भले बन गये थे
खुदाया तेरे घर तो जन्नत मिलेगी
नहीं छोड़कर वो वतन जा सका फिर
सुना बेटियों को हिफ़ाज़त मिलेगी
बढ़ाओ नहीं शौख अपने यहाँ तुम
तुम्हें अब न इसकी इज़ाजत मिलेगी
नहीं जा सकूँगा इन्हें छोड़कर मैं
भले ही वहाँ मुझको दौलत मिलेगी
करो तुम सही तो चलन आज अपना
तुम्हें भी जहाँ में मुहब्बत मिलेगी
हमारी वफ़ा पे यकीं उसको होगा
तभी हुस्न की ये नज़ाकत मिलेगी
चला जा प्रखर तू गुरुदेव के दर
वहीं पर सही अब निज़ामत मिलेगी
पास यादों की अमानत ही सही
पास यादों की अमानत ही सही
यार की इतनी मुहब्बत ही सही
इक दफ़ा सूरत दिखा तो दीजिए
बाद चाहे ये कयामत ही सही
आज हँसकर मान लूँ मैं बात सब
कुछ कहे तो तू शिकायत ही सही
इक दफ़ा हसरत है उसको देखा लूँ
बाद कर ले वो तिजारत ही सही
लोग क्या कहतें हैं कहने दो उन्हें
प्यार में उसके इबादत ही सही
राब्ता कुछ तो बना रखना ही था
करता नफ़रत तो ये नफ़रत ही सही
दूर कर शिकवे गिले मिल कर कभी
कुछ हक़ीक़त हो शरारत ही सही

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