दीद-ए-तर | Dida-e-Tar

दीद-ए-तर

( Dida-e-Tar )

वो मेरे लिए दीद-ए-तर है के नहीं है।
उल्फ़त का मिरी उसपे असर है के नहीं है।

रस्मन तो उसे आना था फिर भी नहीं आया।
उसको मिरे मरने की ख़बर है के नहीं है।

तारीकियों इतना तो बता दो कभी मुझको।
शाम-ए-ग़मे-हिज्रां की सह़र है के नहीं है।

आजाऊंगा,आजाऊंगा इतनी तो ख़बर दो।
मेह़फ़िल में मिरा रश्के क़मर है के नहीं है।

बेलोस चला आऊंगा आवाज़ तो दे तू।
मत सोच सनम ज़ादे-सफ़र है के नहीं है।

कुछ देर को साय में ठहर जाऊं मैं जिसके।
रस्ते में कहीं ऐसा शजर है के नहीं है।

रखता है सदा औरों की ख़ामी पे निगाहें।
ख़ुद पर भी फ़राज़ उसकी नज़र है के नहीं है।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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