गिरे आंखों से आंसु तो क्या

गिरे आंखों से आंसु तो क्या

गिरे आंखों से आंसु तो क्या

गिरे आंखों से आंसु तो क्या ,
नहीं मिले गले उनके तो क्या ,
तराने लिखने मिले थे दो डगर,
नहीं लिख सके मिलन गीत तो क्या ,
गिरे आंख से आंसू तो क्या …..
सभी कदम तरंग की धुन में ,
कोई सुने कुछ कोई कुछ मन में ,
मिलाते रहे बिंदुओं को रेख में,
जिन्हें जोड़ा वे ही बिखरे श्वांशों में ,
गिरे आंख से आंसू तो क्या….
जीवन तो अदभुत पहेली है,
जिसको मिला सुख सहेली है ,
हिमालय से बही क्या गंगा अकेली है,
फिर क्यों सवालात धार से खेली है ,
गिरे आंख से आंसू तो क्या….
चार धातु की तरह मिले बिखर गए ,
आडम्बर के पदर में किधर गए ,
कभी दिल के कभी मन के हाथों रहे,
बारूदी सुरंग में जो आए वे घर रहे ,
गिरे आंख से आंसू तो क्या….

नरेंद्र परिहार

नागपुर महाराष्ट्र

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