ये गूंगी शाम

ये गूंगी शाम

ये गूंगी शाम

ये गुंगी शाम मेरे कानों में कुछ कहती है, तु है कहीं आसपास ये अहसास मुझे दिलाती है,
बेशक तू मुझे छोड़ गया, वादा अपना तोड़ गया,

किया था वादा तूने ता-उम्र साथ निभाने का, हर ग़म मेरा बांट कर मुझे खुशी के फूलों की लड़ियां दिखाने का,

दे गया तू ग़म उम्र-भर का, ले गया तू खुशियां सारी मेरी,
तुझको चाहा, तुझे पूजा, तेरी इबादत की बस यही ख़ता थी मेरी,

प्यार के बदले प्यार की ही तो चाहत की थी, एक सुहानी शाम की ही तो चाहत की थी,
दे गया तू मुझे तड़पती ये शाम, ये गुंगी और बहरी एक शाम,

जो ना तेरा संदेशा लाती है, ना मेरा पैग़ाम तुम तक पहुंचाती है,
मगर फिर भी ना जाने क्यों ये तेरे आसपास होने का अहसास दिलाती है।

प्रेम बजाज © ®
जगाधरी ( यमुनानगर )

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