Berozgar

बेरोजगार | Berozgar

बेरोजगार

( Berozgar )

 

रोजगार नहीं मिला जिसे वह बेरोजगार होता है ,
लेकिन लोगो की नजर में वह बेकार होता है ।
सारा दोष लोग उसके कर्म का ही मानते हैं ,
पर कुछ दोष भाग्य और सरकार का भी होता है।

प्रतिकूल मौसम में भी वह दर दर भटकता है,
नोकरी के लिए दिन रात हाथ पैर पटकता है।
मिल जाए तो समाज में बड़ी इज्जत होती है ,
नही मिले तो वह घरवालों को भी खटकता है।।

कितना पढ़ा लिखा हो पर सम्मान नही होता,
बना रहता है पागल सा मानो ज्ञान नहीं होता।
जरूरत क्या है उसकी परिवारवाले भी न जाने,
दर्द कितना लिए है किसी को ध्यान नहीं होता ।।

परिवार में बड़ा है या छोटा पर सिक्का खोटा है ,
विचार बहुत अच्छा है पर चुनाव का वह नोटा है ।
कोई ईधर ढकेले कोई ऊधर ढकेले घर में उसको,
इन्सान है पर लोग मानते बिना पेंदी का लोटा है ।।

शादी नहीं हुई है तो हाल चाल कुछ ठीक है,
शादी के बाद तो पत्नी की मिलती सीख है।
गुजर जाता है कुछ दिन बेकरी में भी अच्छा ,
जब शादी के बाद मिली पत्नी कुछ नीक है।।

आशा में वह जीता है और आशा में मरता है,
कभी खुश होता है कभी भविष्य से डरता है ।
सारा जीवन खपा देता एक नौकरी के लिए,
फिर भी लोग कहते हैं मेहनत नहीं करता है।।

 

कवि :  रुपेश कुमार यादव ” रूप ”
औराई, भदोही
( उत्तर प्रदेश।)

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