हमेशा ही रहे हम तो बुरे उनकी निगाहों में
हमेशा ही रहे हम तो बुरे उनकी निगाहों में

हमेशा ही रहे हम तो बुरे उनकी निगाहों में

( Hamesha hi Rahe Ham To Bure Unke Nigahon Mein )

 

 

हमेशा  ही  रहे  हम तो बुरे उनकी निगाहों में।
गुनहगारों में की गिनती रहे जब बेगुनाहों में।।

 

बिना सोचे बिना समझे कई इल्ज़ाम दे डाले।
जिगर का दर्द पढ़ पाए नहीं वो मेरी आहों में।।

 

मिली नफ़रत सदा हमको बिना ही बात पे उनकी।
कभी  सिमटे  नहीं आकर मेरी फैली- सी बाहों में।।

 

बहुत दिल को दुखाते है बहाने रोज करके वो।
कटी है जिंदगी अपनी सदा ग़म की पनाहों में।।

 

है  यूं  तो कीमती होते ज़माने में सभी रिश्ते ।
करे जज़्बात को आहत तो छोडो बीच राहों में।।

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कवि व शायर: Ⓜ मुनीश कुमार “कुमार”
(हिंदी लैक्चरर )
GSS School ढाठरथ
जींद (हरियाणा)

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