इश्क़ जुगनू-सा | Ishq Jugnu sa

इश्क़ जुगनू-सा

( Ishq Jugnu sa )

जीवन के अंधियारे तिमिर में
तुम जुगनू की तरह टिमटिमाये
पल भर-प्रेम का
दीवा जलाकर
फिर कुहासा छाये
जलते-बुझते
जुगनुओं-सा
नेह तुम्हारा पलता है
ना आता है
ना जाता है
बस हल्का-सा
स्पंदन देता है।
जुगनू जैसे–
जलता-बुझता
वैसा तुम्हारा प्रेम
दिखता है
और—
वैसे ही तुम भी हो गए हो
इस कुहासे कारा में
जुगनू से जलते-बुझते हो
जुगनू की क्षीण दीप्ति में
समस्नेह तुम्हारा भी है
प्रिय—-
इस नीम दीप्ति की
लीक पर ही
अब जीवन सारा है–
चलना है–
इस गहन अंधेरों में भी
आस का पंछी उड़ता है
जीवन की पथरीली राहों में—-
जब स्नेह तुम्हारा
जुगनू-सा जगमगाता है।।

डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मप्र

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