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जगरगुंडा कुण्डेर बेदरे | Jagargunda par Kavita

जगरगुंडा कुण्डेर बेदरे

( Jagragunda Kunder Bedre )

 

अच्छे-अच्छो के छूट जाते है केवल नाम से पसीने,
नक्सलियों का गढ़ है ये जगरगुंडा कुण्डेर व बेदरे।
घना यह जंगल एवं जंगली जानवर चीते शेर पेंथरे,
हर कदम‌ ख़तरा रहता है नक्सली रचते नये पेतरे।।

न सड़क है न बिजली ना स्कूल नेटवर्क अस्पताल,
रेंगते कीड़ों सी ज़िन्दगी ये जीते नक्सल की चाल।
झुग्गी झोपड़ी में रहते है यहां आदिवासी यह लोग,
कहते है जो उतार दे खड़े-खड़े जानवर की खाल।।

साउथ-बस्तर का हिंड़बा है इसी जगह का सरदार,
खाली न गया आजतक जिसका कोई भी ये वार।
मास्टरमाइंड कहलाता वह रखता अनेंक हथियार,
ढ़ेर बटालियनें बना रखी है जिनमें नक्सल हजार।।

कभी न आई इस जंगल में कोई फ़ौज एवं पुलिस,
लेकिन आज कैम्प बना दिया यहां केंद्रीय पुलिस।
कई झेले है परेशानी व जगह-जगह लगाएं अंबुश,
कोबरा डीआरजी ने साथ दिया हमेशा ही पुलिस।।

कर दिखाया एक सौ पैंसठ यूनिट ने ऐसा ये काम,
प्रवाह ना की अपनें तन की दिन-रात सुबह-शाम।
कुछ दिनों में बना दिया कैम्प जहां कोई ना जाता,
नक्सलियों का धीमे-धीमे अब करेंगे काम तमाम।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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