जरूरी काम

जरूरी काम

मेरी बेटी 12 वर्षीय चुनमुन कक्षा 6 में पढ़ती है। उसमें एक गंदी आदत है कि वह एक बार में किसी काम को नहीं सुनती। ऐसा भी नहीं है कि उसे कम सुनाई देता है, बल्कि ऐसा वह जानबूझकर करती है। गुस्सा करो, तो कहती है-

“मम्मी, आप इतना क्यों चिल्ला रही हो? मैं आ तो रही थी। मात्र 2 मिनट में आपने चार बार आवाज लगा दी है। आपको हर काम मे इतनी जल्दी क्यों रहती है?”

मैं उसको समझाने की कोशिश करती- “बेटा, मैं आपको अनावश्यक आवाज नहीं लगाती हूँ। जब-जब मुझे आपकी जरूरत होती है, तभी आवाज़ लगाती हूँ। आपके पढ़ते करते समय मैं आपको कभी आवाज नहीं लगाती।”

चुनमुन मेरी सलाह को नजरअंदाज, अनसुना कर देती और अपने काम में लगी रहती। मैं उसकी इस हरकत से बहुत परेशान थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह से उसे सुधारूं।

चुनमुन नहीं जानती थी कि उसकी इस लापरवाही से भविष्य में कोई बड़ी दुर्घटना/दिक्कत/परेशानी भी पैदा हो सकती है। एक-एक सेकंड, एक-एक मिनट का बहुत मोल होता है।

मैंने लोगों को अक्सर कहते सुना है कि मात्र 1 मिनट में क्या हो जाएगा? जबकि सच यही है कि 1 मिनट या कुछ सेकेंड की लापरवाही से बड़ी-बड़ी घटनाएं घट जाती हैं। अगर हम पीछे(भूतकाल में) नजर उठा कर देखें तो हमारे आस पास ऐसी ढ़ेरों घटनाएं मिल जाएंगीं, जो मात्र कुछ सेकण्ड्स की लापरवाही से घटी हैं और लोगों ने अपनी जान-माल दोनों का नुकसान कर लिया।

आखिरकार वह दिन आ गया जब मुझे चुनमुन को समझाने का मौका मिला और चुनमुन ने मेरी बातों की गंभीरता और गहराई को जाना और अपने जीवन मे आत्मसात किया। हुआ यूं कि चुनमुन अपने डेढ़ साल के छोटे भाई आयुष के साथ बेड पर खिलौनों से खेल रही थी।

कुछ ही देर में खेलते खेलते हुए खुद में इतनी मग्न हो गई कि उसे ध्यान ही ना रहा कि आयुष भी बेड पर है? जब मेरी नज़र आयुष पर पड़ी तो मैने पाया कि वह बेड से गिरने ही वाला है।

मैं किचन में थी, रोटी बना रही थी। बेड मुझसे काफी दूरी पर था। मैंने चुनमुन को तेज से आवाज़ लगाई और आयुष को पकड़ने के लिए कहा। चुनमुन ने सुनने में लापरवाही से खिलौनों के साथ खेलते हुए कहा- “बस एक मिनट मम्मी, मैं अभी आयुष को देख रही हूँ।”

1 मिनट बाद चुनमुन ने आयुष को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आयुष गिर गया था। उसे चोट आई थी। हालांकि चोट ज्यादा नहीं थी, फिर भी आयुष लगातार रो रहा था।

उधर चुनमुन भी डरी सहमी खड़ी थी। परिवार के सभी सदस्यों ने यहां तक कि मैंनें भी चुनमुन को खूब डांट लगाई। सब की डांट खाकर उसे रोना आ रहा था। कुछ समय बाद मैं चुनमुन को अलग एक रूम में लेकर गई और उसको समझाते हुए कहा-

“बेटा, तुम एक बार में क्यों नहीं सुनते हो? इस तरह का व्यवहार करना बहुत गलत है। कभी गम्भीर होकर सोचा है कि दूसरे इंसान को हमारी कितनी जरूरत है?

वह क्यों आवाज लगा रहा है? हो सकता है कि उसको आपकी मदद की बेहद आवश्यकता हो… इसलिए हमें भी बिना देरी किए उनकी बात सुननी चाहिए।

बेटा, आपने सुना होगा, टीवी में भी देखा होगा कि किस तरह मात्र 1 मिनट या कुछ सेकंड की लापरवाही से भयंकर विमान, ट्रेन, बाइक दुर्घटनाएं हो जाती है, पेड़ों से बच्चे गिर जाते हैं, लोगों की नदी में डूबकर मृत्यु हो जाती है, विस्फोट/बम फट जाते हैं, भूकंप और बाढ़ के दौरान भी हमारी चंद मिनटों की लापरवाही से सैंकड़ो लोगों को जान-माल का बड़ा नुकसान हो जाता है।

कई बार समय पर दवाई न मिलने से या कुछ देरी होने से, उपयुक्त उपचार ना मिल पाने पर लोगों की हृदयघात, अस्थमा, मिर्गी के दौरे इत्यादि ना जाने कितनी बीमारियां हैं.. जिनसे उनकी मृत्यु हो जाती है। बहुत बार हमने देखा है कि मात्र कुछ मिनट की देरी से हमारी ट्रेन/बस/इंटरव्यू/एग्जाम इत्यादि तक छूट जाते हैं, हम फेल हो जाते हैं।

इसलिए हमें समय का महत्व समझते हुए अपने मां-बाप की बातें अनसुनी नहीं करनी चाहिए। उनका कहना मानना चाहिए। हो सकता है कि उस समय उन्हें आपकी बहुत जरूरत हो।

ऐसा ना हो कि आपकी छोटी सी लापरवाही व देरी से उनकी जान पर बन आये और बाद में सिवा पछतावा करने के आपके पास और कुछ ना रहे। अब यही देख लो, अब आपने अपने भाई को बेड से गिरने से बचाने की भरकस कोशिश की लेकिन आपकी मात्र कुछ सेकण्ड्स की देरी से वह बेड से नीचे गिर गया।

सोचो, अगर तुम्हारा भाई छत पर होता… वहाँ से गिर जाता, तो तब क्या होता?इसलिए बेटा, जो भी व्यक्ति आपके आसपास है, वह व्यक्ति ही सबसे महत्वपूर्ण है। हमें उसके लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए और उसकी एक आवाज पर ही उसकी बात सुनकर मदद करनी चाहिए।”

“ठीक है मम्मी जी, मैं समझ गई कि मेरे अनसुना करने पर आपको कितनी तकलीफ होती होगी। मैं अगर आपकी पहली बार आवाज देने को गम्भीरता से लेती, तो भैया बेड से नीचे नहीं गिरता।

मैं खेल का सामान समेटने में ही लगी रही, इसलिए भैया गिर गया। मैं आगे से ध्यान रखूंगी कि इस तरह की गलती ना हो? जो ज्यादा जरूरी हो, उसी काम को करूँ। अगर भाई के साथ मैं खेल रही हूँ तो मेरा सारा ध्यान भाई पर ही होना चाहिए… बाकी काम मैं बाद में भी कर सकती हूँ।”

चुनमुन ने अपनी गलती मानते हुए मम्मी से वायदा किया। इसके बाद चुनमुन अच्छी बच्ची बन गई, उसने फिर कभी मम्मी को शिकायत का मौका नहीं दिया। अब चुनमुन एक आवाज में ही बड़ो का कहना मान लेती हैं और सबकी चहेती बन गई है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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