जीस्त में जिसकी यहां तो मुफलिसी है
जीस्त में जिसकी यहां तो मुफलिसी है

जीस्त में जिसकी यहां तो मुफलिसी है

( Jist Mein Jiski Yahan To Muphlasi Hai )

 

 

जीस्त में जिसकी यहां तो मुफ़लिसी है

जीस्त में उसके भला क्या फ़िर ख़ुशी है

 

मयकशी ही कौन करता है उल्फ़त की

रोज़  होती  नफ़रतों  की मयकशी है

 

अब  दिखाता  ग़ैर  होने की वो आंखें

हां मुहब्बत जिसनें ही मुझसे करी है

 

प्यार  की  बातें  नहीं करता कभी वो

इस क़दर जिससें मुझे ही आशिक़ी है

 

हाँ सभी है दोस्त उसको सिर्फ़ प्यारे

इक  मुझी  से रोज़ उसको बेरूख़ी है

 

गुल  मुहब्बत  के  उसे  भेजे बहुत ही

फ़िर भी उसको आज़म से नाराज़गी है

❣️

शायर: आज़म नैय्यर

(सहारनपुर )

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