इस भीड़ की सच्चाई ( व्यंग्य )
इस भीड़ की सच्चाई ( व्यंग्य )

इस भीड़ की सच्चाई ( व्यंग्य )

( Is bheed ki sachai : Vyang )

 

ये कोरोना फैला नहीं रहे हैं
भगा रहे हैं,
देश को गंभीर बीमारी से बचा रहे हैं।
देखते नहीं
सब कितना जयघोष कर रहे हैं?
समझो कोरोना को ही बेहोश कर रहे हैं?
अजी आप लोग समझते देर से हैं,
हम तो यही कब से कह रहे हैं?
उनकी बात कुछ और थी
जो छुपकर फैला रहे थे
अपने को निर्दोष बता रहे थे।
बाद में हाईकोर्ट ने भी बरी किया,
जाने उन पर क्या क्या इल्जाम लग रहे थे?
लेकिन ये तो इंतहा है
लाखों की भीड़ एक साथ इकट्ठी हुई है
कोरोना एस.ओ.पी के विरुद्ध
फिर भी इन्हें कोई कुछ नहीं कह रहा,
यहां सरकार भी है गई गूंगी बहरी,
अंधेरे में तीर कचृआ
कभी कुछ कभी कुछ कह रही।
यही हाल रहा तो
चपेट में सब आएंगे
कब तलक आंखें बंद कर
सच्चाई छुपाएंगे?
राजाजी आंखें खोलिए!
अब भी वक्त है
व्यवस्थाओं को तोलिए,
वरना सब पछताएंगे,
ढ़ूंढ़ने से भी नजर नहीं आएंगे।

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नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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