होनी, अनहोनी बन गई

होनी, अनहोनी बन गई

“भावना, मेरी माँ की तबियत बिगड़ गई है। अचानक मुझे अपने पति के साथ मायके जाना पड़ रहा है। मेरा बेटा आशीष (कक्षा 12 का विद्यार्थी) इस समय स्कूल में है। शाम को ट्यूशन पढ़कर वह घर वापिस आता है। इस वर्ष उसके बोर्ड एग्जाम है। इसलिए वह हमारे साथ नहीं जा रहा है।

क्या आज रात कुछ समय के लिए वह तुम्हारे पास रुक सकता है? अगर तुम्हें कोई दिक्कत न हो तो…? हम देर रात तक घर वापस आ जायेंगे।” मेरी पड़ोसन कनक ने मुझे फोन करके कहा।

“ठीक है। मुझे कोई दिक्कत नहीं। एक काम करना, आशीष को यहीं बैंक भेज देना। हो सकता है कि मुझे घर पहुंचने में देर हो जाये। आजकल बैंक में काम बहुत ज्यादा है।” मैंने जवाब दिया।

“ठीक है। वह ट्यूशन से सीधे बैंक पहुंच जायेगा। वह वहीं कहीं ट्यूशन पढ़ने जाता है। मैं उसको बोल दूंगी।” कनक ने जवाब दिया।

शाम को आशीष समय से बैंक पहुँच गया था। हम दोनों ने घर जाने से पहले, होटल में खाना खाया और उसके बाद घर आए। मैंने उसका बिस्तर अपने बेड के बराबर में, नीचे की तरफ गद्दे बिछाकर लगा दिया और खुद बेड पर लेट गई। मुश्किल से मुझे लेटे हुए 30 मिनट भी नहीं हुए थे, तभी आशीष बोल पड़ा-

“मुझे भूख लग रही है आंटी जी। मुझे खाना चाहिए।” आशीष बोला।

“अभी तो हम होटल से खाना खाकर निकले हैं। खाना खाये एक घंटा भी नहीं हुआ और तुम्हें भूख लगने लगी। बड़ी विचित्र बात है।” हैरानी से मैंने पूछा।

“आंटी जी, मुझे हर घंटे पर कुछ ना कुछ खाने के लिए चाहिए होता है। मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं होती है। शायद यह बात मम्मी ने आपको नहीं बताई। मेरी डॉक्टर बत्रा से दवा चल रही है।” आशीष ने जवाब दिया।

“अच्छा ऐसा है। यह बात तो तुम्हारी मम्मी ने मुझे नहीं बताई। इस समय रात के 9:00 बज रहे हैं। कुछ देर में तुम्हारे मम्मी-पापा आने वाले होंगे। तब अपने घर जाकर खाना खा लेना। इतने बड़े तो हो गए हो, भूख बर्दाश्त करना सीखो।” मैंने समझाने की कोशिश की।

“यह मुझसे नहीं होगा, आंटी जी। अगर मुझे तुरंत ही खाना खाने को ना मिला तो मेरी तबीयत बिगड़ जाएगी। मेरे लिए जल्दी से खाने का कुछ सामान लेकर आओ।” आशीष ने जोर देकर कहा।

“बेटा, घर में खाने का कुछ भी नहीं है। मैं घर में अकेली रहती हूँ। तुम्हें तो पता है कि तुम्हारे अंकल दूसरे शहर में नौकरी करते हैं। शनिवार को वे आते हैं और सोमवार सुबह नौकरी पर चले जाते हैं। मैं अक्सर सुबह-शाम का खाना घर से बाहर ही खाती हूँ। खाना बनाने के मामले में मैं आलसी बन गयी हूँ। थकान के कारण मैं शाम को खाना बनाने से परहेज करती हूँ।” मैंने स्थिति स्पष्ट की।

“मैं कुछ नहीं जानता आंटी जी। मुझे खाना चाहिए। अगर आपके घर में खाने की कोई चीज नहीं है तो मुझे बाहर से खाने का कुछ लाकर दो या फिर आप मुझे किसी मेडिकल स्टोर से दवा दिलवा दीजिए ताकि मेरी भूख मर जाए, मेरी तबियत ना बिगड़े। मेरी दवाई घर पर रह गई है। मैं रात को दवा खाकर सोता हूँ ताकि भूख के कारण सारी रात जगा न रहूँ।” आशीष ने अपनी बात पर जोर दिया।

“चैन से कुछ देर लेट भी नहीं सकती, आराम भी नहीं कर सकती। हद कर रखी है इस लड़के ने। खाना चाहिए, दवा चाहिए, बस यही रट लगा रखी है।” गुस्से से बडबडाते हुए मैं बोली और बेमन से उसको दवा दिलाने के इरादे से उठी… और उसको साथ लेकर जैसे ही मैं घर से बाहर निकली तो आशीष ने तुरंत तेजी के साथ घर का दरवाजा बंद कर दिया और मुझसे चाबी लेकर दरवाजा लॉक कर दिया। आशीष की इतनी फुर्ती देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गयी।

“आंटी जी, तुरंत पुलिस को फोन लगाओ।” आशीष ने कहा।

“क्या हुआ? इस तरह दरवाजा लॉक करने का क्या मतलब है? ऐसे क्यों बोल रहे हो?” मैंने हैरानी से पूछा।

“आपको अंदाजा नहीं है… आपके घर में एक व्यक्ति घुसा हुआ है। मैंने उसको आपके बेड के नीचे छुपा देखा है।” आशीष ने जवाब दिया।

“ऐसे कैसे हो सकता है? इस बात का एहसास मुझे क्यों नहीं हुआ? तुम्हें शायद गलतफहमी हुई होगी, आशीष?” मैंने संदेह से पूछा।

“नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरा यकीन मानिए, मुझसे गलती बिल्कुल नहीं हुई है। आंटी जी, आप तुरन्त फोन मिलाओ और पुलिस को बुलाओ। कहीं ऐसा न हो कि वह बदमाश भाग जाए।” आशीष के कहे अनुसार मैंने तुरन्त फोन करके पुलिस को बुलाया।

पुलिस द्वारा घर की तलाशी ली गई और वह बदमाश व्यक्ति पकड़ में आ गया। उसके पास से एक बड़ा चाकू मिला। पुलिस द्वारा सख्ती से पूछताछ करने पर उस व्यक्ति ने बताया कि वह काफी दिनों से मुझ पर नजर रखे हुए था और मौके की तलाश में था।

आज वह रेप करने और लूट-पाट करने के इरादे से पड़ोस की छत के सहारे-सहारे खिड़की के रास्ते घर में घुसकर बैठ गया था। वह मेरे गहरी नींद में सोने का इंतजार कर रहा था, ताकि मेरे सोने पर वह मुझे धमकाकर या बांधकर घटना को अंजाम दे सके।

आशीष की समझदारी और सूझबूझ ने मुझे एक बड़ी मुसीबत से बचा लिया था। बार-बार खाना मांगने और दवाई मांगने के पीछे का मकसद मुझे समझ आ गया था। यह एक तरीका था मुझे बचाने का… घर से मुझे और खुद को सकुशल बाहर निकलने का।

“आशीष ने सोचा कि अगर वह खाना और दवा मांगता रहेगा, तो आंटी जी उसे घर से बाहर जाने के लिए मजबूर हो जाएंगी। वह जानता था कि आंटी जी घर में अकेली रहती हैं और उसे लगता था कि घर में कोई अनहोनी घटना घट सकती है। इसलिए उसने खाना और दवा मांगने का नाटक किया, ताकि आंटी जी उसे घर से बाहर ले जाएं और वह बदमाश व्यक्ति को पकड़ने में सफल हो सके।”

“बदमाश व्यक्ति ने सोचा कि घर में कोई नहीं है, इसलिए वह आसानी से घर में घुसकर लूटपाट कर सकता है। वह आंटी जी को धमकाकर या बांधकर घटना को अंजाम देने की योजना बना रहा था। लेकिन आशीष की उपस्थिति ने उसके प्लान को बिगाड़ दिया।”

आशीष की बहादुरी और समझदारी को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई। मैंने उसकी बहादुरी की प्रशंसा की और कहा, “आशीष, तुमने मेरी जान बचाई है। तुम्हारी सूझबूझ और समझदारी ने मुझे एक बड़ी मुसीबत से बचा लिया।”

आशीष ने मुस्कराते हुए कहा, “आंटी जी, मैंने बस अपना फर्ज निभाया है। मैं नहीं चाहता था कि आपको कोई नुकसान पहुंचे।”

उस दिन के बाद से, मैं आशीष को और भी अधिक सम्मान और प्यार से देखने लगी। उसकी बहादुरी और समझदारी ने मुझे एक नया दृष्टिकोण दिया।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • राशनकार्ड ( लघुकथा ) | Ration Card

    एक दिन ईशा रसोई के सारे डिब्बे साफ करके बड़े खुश थी सोच रही थी के पहिले के जमाने में कितने बड़े कंटेनर होते थे परंतु आजकल आधुनिकता के चलते सुपरमार्केट या मॉल में से सिर्फ पैकेट ही प्राप्त किए जाते हैं । वजन ढोने के चलते लोग उतना ही पैकेट या समान ले लेते…

  • रॉंग नंबर (PART-3 )

     रॉंग नंबर (PART-3 )    बम-बम भोले और हर हर महादेव के जयकारे लगाते हुए हम मेला परिसर में दाखिल हुए। यहां लाई, खील बेचने वाले दुकानदार अपनी दुकानों के पीछे भोले भक्तों के ठहरने हेतु तिरपाल बिछा देते हैं। यह यहां का अघोषित नियम ही है कि जो जिस तिरपाल के नीचे ठहरेगा वह…

  • एक ही रास्ता

    शाम को छत पर अकेली घूम रही नई नवेली दुल्हन पूनम को देखकर पड़ोस में रहने वाली शीला बोली- “बेटा छत पर अकेले-अकेले कैसे घूम रही हो? सब ठीक तो है? तुम्हारा पति सचिन कहाँ है?” “नमस्ते आंटी जी। वे बाजार से कुछ सामान लेने गए हुए हैं। घर में पड़े-पड़े काफी दिन हो गए…

  • रॉंग नंबर | Hindi kahani

     रॉंग नंबर  ( Wrong number : Hindi short story )   जीवन मे कभी कभी ऐसा होता है जब कोई अनजान हमारे करीब आता है और हमारी जरूरत और बाद में कमजोरी बन जाता है । यकीनन उनमें से कुछ ज्यादा दूर तक हमारे साथ नही चल पाते लेकिन कई खट्टी मीठी यादें दे जाते…

  • कर्ण | Karn

    कर्ण एक ऐसा महायोद्धा महादानी जो उसकी स्वयं की गलती नहीं होने पर भी जीवन भर अपमानित होता रहा। आखिर उसकी गलती ही क्या थी? जो जन्म के साथ ही उसकी मां ने उसे त्याग दिया ।शिक्षा प्राप्त करने गया तो वास्तविकता जानने पर गुरु ने समय पर सीखी हुई विद्या न याद होने का…

  • समदर्शी

    राम और श्याम दो ऐसे व्यक्ति थे जो एक ही सरकारी कंपनी में समान पद पर कार्यरत थे। लेकिन उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में बहुत बड़ा अंतर था। राम एक ऐसा व्यक्ति था जो अपने से नीचे पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ अभद्र व्यवहार करता था। वह उन्हें निम्न दृष्टि से देखता था और…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *