Katha Sur Asur

सुर असुर | Katha Sur Asur

प्राचीन काल में सुर और असुर दो भाई थे । दोनों सहोदर थे।। जो भाई काम से जी चुराते थे। किसी प्रकार काम निकाल लेते थे । वह सभी सुर कहलाए। सुर वह लोग थे जो मुख्य रूप से सुरा और सुंदरी में हर समय मस्त रहकर अपनी शक्ति को क्षीण कर देते थे।

सुरों का राजा इंद्र हर समय सुरा सुंदरी में मस्त रहता था। उसे राष्ट्र की सुरक्षा की कोई चिंता नहीं रहती थी। वह केवल अपनी मस्ती में मस्त रहता था । राष्ट्र में क्या चल रहा है जनता का जीवन कैसे हैं उसे इसकी कुछ खबर नहीं रहती थी।

उन्हें अप्सराओं के साथ नाच गाने से ही फुर्सत नहीं मिलती थी। जब देवताओं का राजा ऐसी हरकतें करता हो तो राज्यों की स्थिति की कल्पना करना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में कोई शक्तिशाली राजा जब उन पर आक्रमण कर देता था तो वह शक्तिहीन होने के कारण परास्त नहीं कर सकते थे।

उसे अपने सैनिकों की भी खबर नहीं रहती थी कि सैनिक राष्ट्र की सुरक्षा में तत्पर है या नहीं। ऐसी स्थिति में वह राजाओं को तो परास्त कर नहीं सकते थे। इसलिए यह सभी देवता गढ़ ऐसे शक्तिशाली राजाओं को परास्त करने के लिए विभिन्न प्रकार की चालबाजियां चलते थे।

असुर लोग निश्चल हृदय के थे। वह इनकी चाल बाजियां समझ नहीं पाते थे । यही कारण था कि देवता लोग इन्हें परास्त करने के लिए स्त्रियों का प्रयोग करने से बाज नहीं आते थे।

हमने प्राचीन साहित्य में पढ़ा होगा की शुंभ निशुंभ , महिषासुर आदि शक्तिशाली राजाओं को जब देवता लोग परास्त करने में असमर्थ हो गए तो उन्होंने दुर्गा नामक स्त्री का उपयोग करके उन्हें परास्त किया।। यदि देवता लोग इतने शक्तिशाली राजा थे तो असुरो को मारने के लिए अपनी स्त्रियों का क्यों उपयोग करते थे।

ऐसे ही यह सुर लोग ऋषि मुनियों की तपस्या को भंग करने के लिए भी अप्सराओं का प्रयोग करते रहे हैं। प्राचीन साहित्य को पढ़ने से ही ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय स्त्रियों का प्रयोग एक हथियार की तरह किया जाता रहा है । और देवता लोग इस हथियार को उपयोग करने में माहिर थे।

इसी प्रकार का एक कथानक समुद्र मंथन का मिलता है ।जिसमें सुर असुर दोनों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया। लेकिन जब उसमें से अमृत नामक रस निकला तो उसे देवता लोग चालाकी से स्वयं पीने लगे। स्वयं विष्णु ने स्त्री का रूप धारण करके देवताओं को पिलाने लगे।

इस चालबाजी को जब राक्षसों को पता चला तो वह देवताओं की पंक्ति में आ बैठें और उसने अमृत के कुछ बूंदें पी लिया। जिसको कहा जाता है विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनका गला काट दिया।

हमें अधिकांश कथानकों में दिखाया जाता है कि असुर लोग गलत थे। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो यदि किसी कार्य को दो लोग मिलकर किया है तो तो उसे समान रूप से बंटवारा होना चाहिए था।

लेकिन यहां भी देवताओं की धोखाधड़ी दिखाई देती हैं। लेकिन हम हैं कि देवताओं को महान मानने में लगे हुए हैं।
असुर वे लोग थे जो सुरा और सुंदरी से दूर रहते थे । मेहनतकश थे। जिनके राज्य का संचालन व्यवस्थित था । जिनके राज की जनता सुखी थी। धन-धान्य से भरपूर थे।

जिसके राज्य में सुख शांति थी। किसी असुर राज्य की जनता ने कभी बगावत किया हो ऐसा कोई प्राचीन इतिहास नहीं मिलता है। लेकिन व्यावहारिक जीवन हमें यह बताया जाता है असुर लोग बहुत खराब होते थे। एक दूसरे को सताते थे लेकिन असुरों को उत्पात करते हुए कहीं नहीं देखा गया है।

कुछ जगह यज्ञ का विरोध करते देखा गया है। इसका कारण यह था कि असुर यह चाहते थे कि लोग हराम की कमाई की जगह मेहनतकश बने। यही कारण था कि हमारे समाज के ठेकेदार स्मृतिकारों ने हराम की कमाई खाने वालों को सर्वश्रेष्ठ और मेहनत करने वाले समाज की उन्नति में सहायक जातियों को निम्न श्रेणी में रखा।

भारतीय समाज इसलिए भी पिछड़ा रहा है कि उसने सदैव से श्रम का तिरस्कार किया है। अधिकांश स्मृति कारों ने श्रम कारों को निम्न श्रेणी का सिद्ध किया है। जिसका छूना भी पाप माना जाता है। यह परंपरा हजारों वर्षों से चलती रही है और आज भी चलती आ रही है।

जिस समाज में सुरा और सुंदरी में मस्त रहने वाले को देवताओं का राजा बना दिया हो उस समाज को गुलाम होना निश्चित है। डॉ भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों का मानना रहा है कि इन्हीं कर्म से भारत हजारों वर्षों से परतंत्रता की जंजीरों में जकड़ा रहा।

यदि देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाना है तो श्रम का सम्मान करना होगा। श्रमजीवी लोगों को जब तक सम्मान नहीं मिलेगा देश का विकास करना असंभव है। लेकिन इस समाज में होता उल्टा है। श्रमजीवी समाज को खाने की रोटी नहीं मिलती और मुफ्त खोर लोग खा खा कर मर रहे हैं।

समाज में सुर और असुर की वास्तविक स्थिति को बतलाना पड़ेगा । जिससे यह समझा जा सके की असुर लोग इस समाज की उन्नति में कितने बड़े सहायक रहे हैं।

कहां जाता है कि राम रावण युद्ध के पश्चात जनता ने विभीषण को राजा कभी स्वीकार नहीं किया और बगावत कर दिया था। रावण के राज्य में जनता की बगावत का कोई उदाहरण नहीं मिलता है।

रामायण में भी राम के द्वारा शक्तिशाली राजा बाली और रावण को उनके भाइयों के सहयोग से उनको नष्ट भ्रष्ट करने का उदाहरण मिलता है। यहां भी शक्ति की अपेक्षा छल का प्रयोग करके बाली और रावण को राम ने मारा हैं।

राम रावण और बाली का युद्ध सामान्य युद्ध नहीं बल्कि तीन संस्कृतियों का युद्ध था। राम आर्य संस्कृति के पक्षधर थे तो रावण बाली अनार्य संस्कृति के। यही कारण रहा है कि हनुमान, सुग्रीव, जामवंत ,नल नील आदि आदि को बंदर भालू के रूप में दिखाकर उनको अपमानित आज भी किया जा रहा है।

आज आवश्यकता है कि इतिहास को हम सही मायने में समझें।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

यह भी पढ़ें :-

एक आस अब भी | Kahani Ek Aas Ab Bhi

Similar Posts

  • संगति का असर

    मेरा बेटा वंश कक्षा पांच में पढ़ता है। उसकी उम्र लगभग 10 वर्ष होगी। उसका हाल फिलहाल में एक दोस्त बना है। उसका नाम मनीष है। उसकी उम्र लगभग 11 वर्ष होगी। वह तीन-चार बार वंश के साथ घर आ चुका था। हर बार मुझे उसका व्यवहार बड़ा अजीब लगा। वह मात्र 11 वर्ष का…

  • बभ्रुवाहन-एक योद्धा

     # कहानी_से_पहले_की_कहानी                           ★★  महाभारत के बाद मुनि वेदव्यास और श्री कृष्णजी ने धर्मराज युधिष्ठिर से राज्य के उत्थान हेतु अश्वमेध यज्ञ करने का आह्वान किया। अश्वमेध यज्ञ अर्थात विजय-  पर्व,सुख समृद्धि की कामना और खुद को विजेता घोषित करने का उपक्रम। युधिष्ठिर…

  • अभिमन्यु | Kahani Abhimanyu

    अभिमन्यु को हम अक्सर इसलिए याद किया करते हैं कि उसने मां के गर्भ से ही चक्रव्यूह भेदने की कला सीख ली थी। कहां जाता है कि अभिमन्यु जब मां के गर्भ में ही था तो अर्जुन उसकी मां सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदने कि कला का वर्णन कर रहे थे । जब वह चक्रव्यूह में…

  • तुमसे ही हिम्मत | Tumse hi Himmat

    तुमसे ही हिम्मत ( Tumse hi himmat )  तुम से हौसला हमारा है तुमसे ही हिम्मत हमारी है तुम इस दिल का करार हो। मेरे मन के मीत तुम दिल को लगती हो कितनी प्यारी। मेरे जीवन के इस सफर में हमसफ़र हो तुम रेखा। तुमने पग पग पे मेरा साथ दिया है मेरे घर…

  • श्री कृष्ण जन्म-अष्टमी | Shri Krishna Janm Asthami Kavita

     श्री कृष्ण जन्म-अष्टमी  ( Shri Krishna Janm Asthami )    जन्मअष्टमी उत्सव है, जय कृष्ण कन्हैया लाल की |   1. नन्हा कान्हां कृष्णा कन्हैया, माँ यसोदा का दुलारा है | प्यारी सूरत माखन की चोरी, सारे गोकुल को प्यारा है | पूतना,अजगर को तार दिया, कई दैत्यों को भी मारा है | किए बड़े-बड़े…

  • निर्मला | Nirmala

    योग की कक्षा में एक महिला लगातार मुस्कुराए जा रही थी ।बीच-बीच में वह ऐसे तर्कपूर्ण बात करती की लगता संसार की सबसे खुशनसीब वही हो। कभी-कभी वह सारे शरीर को तोड़ मरोड़ देती । मैं कई दिनों से देख रहा था कि क्यों वह ऐसे उल्टी सीधी हरकतें करती रहती है। कौन सा ऐसा…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *