सफलता का राज

कपिल एक फल विक्रेता था, जो अपने ठेले पर तरह-तरह के सुंदर और मीठे फल बेचता था। वह अपने ग्राहकों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करता था और हमेशा मुस्कुराते हुए फल बेचता था। कपिल के ठेले पर सिर्फ ताजा फल होते थे, और वह सड़े-गले फलों को अलग रख देता था।

एक दिन, पड़ोसी फल विक्रेता ने कपिल को देखा और कहा, “कपिल, तेरा तो नुकसान हो गया। मंडी से जो फल खरीद कर लाया था, उसमें इतने सारे फल बेकार निकल गए। अब क्या करेगा? इसकी भरपाई कैसे करेगा?”

कपिल ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे लगता है कि ईश्वर सब देखता है। मैं अपने ग्राहकों के साथ बेईमानी नहीं कर सकता। मेरे गुरु ने मुझे यही शिक्षा दी है कि कभी किसी के साथ धोखा मत करो, बेईमानी मत करो।”

पड़ोसी फल विक्रेता ने पूछा, “लेकिन कपिल, तुम्हें तो नुकसान हो रहा है। तुम्हारे फलों की कीमत तो बढ़ जाएगी।”

कपिल ने कहा, “मुझे नुकसान नहीं हो रहा, फायदा ही हो रहा है। मेरे ग्राहक नियमित बढ़ते जा रहे हैं, और मुझे क्या चाहिए? मेरी कोशिश तो हमेशा मंडी से अच्छे फल लाने की होती है, लेकिन कभी-कभी किसी टोकरी में दो-चार पीस गलत तो आ जाते हैं।”

पड़ोसी फल विक्रेता ने कहा, “मैं देखता हूँ कि तुम्हारे मंडी से लाए हुए फल एक दो दिन में बिक जाते हैं, जबकि मेरे फल चार दिन में नहीं बिकते।”

कपिल ने कहा, “लाभ भले ही ज्यादा न हो, लेकिन थोड़ा-थोड़ा करके काफी हो जाता है। मेरे फलों की गुणवत्ता अच्छी होती है, और ग्राहक मुझे पसंद करते हैं। इस वजह से फल जल्दी बिक जाते हैं।”

कपिल के बराबर में एक केले का ठेला लगाने वाले मनीष ने दोनों की बातें सुनकर कहा, “फलों के मामले में कपिल का जवाब नहीं है। यह मैं भी नोटिस करता हूँ कि जब कपिल के सारे फल बिक जाते हैं, तब जाकर मेरे केलों का नंबर आता है।

मैं कपिल को पूरे दिन फल बेचते देखता रहता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि भगवान जी, जल्दी-जल्दी इस कपिल के ठेले के सारे केले खत्म कर दो, तो केले वाले ग्राहक मेरे पास आ जाएं। दोपहर तक कपिल के केले बिक जाते हैं, तब मेरी बिक्री होती है।

ये तो गनीमत है कि कपिल केले कम लाता है और हर तरह के फल रखता है। अगर ये केले ज्यादा मात्रा में रखेगा तो मेरे तो बिक ही न पाएंगे। यह भी कपिल की अच्छी आदत है कि जब उसके केले खत्म हो जाते हैं तो वह ग्राहकों को केले मुझसे लेने को बोलता है या खुद ही मेरे ठेले से केले लेकर उनको देता है ताकि ग्राहक बना रहे और उसको सारे फल एक ही जगह मिल जाएं।”

तभी एक ग्राहक वहाँ आया और उसने कपिल से पूछा- “कपिल, कल तुम्हारे पास से खरबूजे लेकर गया था, सब बहुत स्वादिष्ट थे। आज भी मुझे खरबूजे ही चाहियें। वैसे मैं जान सकता हूँ कि तुम्हारे फलों की गुणवत्ता इतनी अच्छी कैसे है, इसका क्या राज है?”

तो कपिल ने जवाब दिया, “मैं अपने ग्राहकों के साथ बेईमानी नहीं करता। मैं ताजे फल बेचता हूँ, और सड़े-गले फलों को अलग रख देता हूं। मैं ग्राहकों की संतुष्टि के लिए उनको फल काटकर खिलाता हूँ और फलों में अंतर नहीं करता। ग्राहकों को घर जाकर भी वही स्वाद मिलता है और फल बेकार नहीं निकलते।

यहीं मेरी जीत है। अगले दिन ग्राहक फिर मेरे ठेले पर खड़ा नज़र आता है। मेरी ईमानदारी और फलों के उचित मूल्य ही मेरी सफलता का राज है। मेरी ईमानदारी और अच्छा व्यवहार देखकर ही मेरे ग्राहक बढ़ते जा रहे हैं… जैसे कि आप अब मेरे ग्राहक बन गए हो।”

पड़ोसी फल विक्रेता यह सब सुन रहे थे। कपिल के मुँह से उसकी सफलता का राज जानने के बाद, पड़ोसी फल विक्रेता और केले का ठेला लगाने वाले को एहसास हुआ कि उन्होंने कपिल जैसा व्यवहार, ईमानदारी नहीं अपनाई, फलों के मूल्य उचित नहीं रखे, अतः उनके फल नहीं बिके और उनके ग्राहक नियमित नहीं बन सके। वे जान गए कि कपिल की, सच्चाई, ईमानदारी और अच्छा व्यवहार ही उसकी सफलता का राज है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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