कवि हूँ कविता में जिन्दा रहता हूँ | Kavi Hoon

कवि हूँ, कविता में जिन्दा रहता हूँ

( Kavi Hoon Kavita me Jinda Rahta Hoon ) 

 

तुम समझ सको, शब्दों की भाषा,
तुम जान सको, सपनों की आशा।

बादलों का उड़ना, तुम देख सको,
बहती हवा को, तुम महसूस करो।

तुम डूब के जानो, सागर की गहराई,
तुम उड़ के नापो, अम्बर की ऊँचाई।

सुनो कभी तुम, पंछी का मीठा गाना,
पढ़ो कभी तुम, सांझ का ढल जाना।

पढ़ पाओ तुम, मन की अभिलाषा,
जान सको तुम, छंदो की परिभाषा।

तुम डूब सको, कविता के सागर में,
तुम रस पाओ, शब्दों की गागर में।

लक्ष्य यही मेरा, तुम तक पहुँच सकूँ,
तुम समझ सको, कुछ ऐसा लिखूँ।

हाथ कलम ले, कागज पर लिखता हूँ,
साहित्य कर्म मेरा, भाषा में दिखता हूँ।

सबके, मन को आनंदित करता हूँ,
कवि हूँ, कविता में जिन्दा रहता हूँ…।

अनिल कुमार केसरी,
भारतीय राजस्थानी

यह भी पढ़ें :-

अनुभूति | Anubhooti

Similar Posts

  • लिखेंगे हम लेखनी की धार | lekhni ki Dhaar

    लिखेंगे हम लेखनी की धार ( Likhenge hum lekhni ki dhaar )   हम पैसे देकर रचना सुनो कभी नहीं छपवाएंगे। दम होगा लेखनी में प्रकाशक खुद चले आएंगे। लिखेंगे हम भी लेखनी की धार लोहा मनवाएंगे। सृजन में शक्ति बड़ी अपार वो रस धार बहाएंगे। सजाकर पुष्प भावों के हम गुलशन महकाएंगे। दिलों तक…

  • देखो, आई सांझ सुहानी

    देखो,आई सांझ सुहानी गगन अंतर सिंदूरी वर्ण, हरितिमा क्षितिज बिंदु । रवि मेघ क्रीडा मंचन, धरा आंचल विश्रांत सिंधु । निशि दुल्हन श्रृंगार आतुर , श्रम मुख दिवस कहानी । देखो,आई सांझ सुहानी ।। मंदिर पट संध्या आरती, मधुर स्वर घंटी घड़ियाल । हार्दिक आभार परम सत्ता, परिवेश उत्संग शुभता ढाल । परिवार संग हास्य…

  • भारत माँ के लाल उठो | Patriotic poem Hindi

    भारत माँ के लाल उठो ( Bharat maa ke laal utho )     केसरिया बाना ले निकलो राम नाम हुंकार भरो हर हर महादेव स्वर गूंजे ऐसी तुम जयकार करो   धीरे वीर पराक्रमी सब विवेकानंद कहते जागो भारत मां के लाल उठो आगे बढ़ आलस त्यागो   स्वाभिमान राणा की भूमि तलवारों का…

  • सुनो/देखो | Suno

    सुनो/देखो ( Suno/ Dekho)    तुम्हारी याद नहीं ! लगता है ,खंजर आ रही है और मुझे कत्ल कर रहो है कत्ल कर मुझे जिन्दा और व्याकुल लाश बना रही है ये हमारे बीच की दूरी मेरे मौत की वजह बन रही है वो व्याकुलता और वो तड़प, बताओ तुम्हे ये कैसे दिखाएं करीब आओ…

  • इंसान और पेड़ में अंतर

    इंसान और पेड़ में अंतर ****** वो कहीं से भी शुरूआत कर सकता है, सदैव पाज़िटिव ही रहता है। उसे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता मौत के मुंह में जाकर भी त्यागता नहीं जीजिविषा सदैव जीवन की है उसे लालसा कभी हिम्मत न हारता बना लेता हूं कहीं से भी कैसे भी जतन कर…

  • मैं हूं मोबाइल | Kavita Main Hoon Mobile

    मैं हूं मोबाइल ( Main hoon mobile )   मैं हूं एक प्लास्टिक का बॉक्स, आ जाता एक पॉकिट में बस। कोई रखता मुझे शर्ट पाॅकिट, कोई रखता है पेंट की पाॅकिट।। मेरे बिन कोई काम ना चलता, हाथ में नही दिमाग़ ना चलता। सुबह से लेकर शाम हो जाएं, उंगलियाँ मानव लगाता रहता।। मुझको…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *