हादसे | Kavita Hadse

हादसे

( Hadse )

आस्था या अंधविश्वास
भक्ति या भीड़ बदहवास
भगदड़ में छूटते अपनों के हाथ
कदमों से कुचलता हर सांस
माथा टेकने का तृष्ण
कौन भगवान कौन भक्त
मेहरानगढ़ यां हाथरस
भयभीत बच्चों के शव
असीमित चीखें अस्त व्यस्त
ह्रदय विदारक दृश्य
अनेकों दीपक हुए अस्त
कैसी विडम्बना है ये वत्स
रुकता नहीं अज्ञानता का तमस
फिर कोई भगवान बनकर
मासूम दिलों को करेगा ज़ब्त
फिर आंख मूंद कर देखेंगे
अंधेरों में डूबती मृत्यु का सत्य

शिखा खुराना

शिखा खुराना

यह भी पढ़ें :-

हबीब | Nazm Habib

Similar Posts

  • डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ की कविताएं | Dr. Pallavi Singh ‘Anumeha’ Poetry

    सच्चा प्रतिवाद तुम्हारे बेतरतीब बरताव सेमैं अभिप्रहत हुई…किन्तु रोई नहीन ही मैं चिल्लाईऔर न ही मैंने तुम्हें पुकारान कोई आरोप लगाया ….बस शनै:-शनै: तुम्हारी जिंदगी सेपृथक कर लियानिर्वाक रुखसत हो ली।तुमने कदाचित,सोचा कि फतहहासिल कर ली मुझसे…..लेकिन कालांतर मेंये मौनतुम्हारी अंतरात्मा के ड्योढ़ी परआहट देगातुम बचना भी चाहो इससेलेकिन यह मौन रुकेगा नही…क्योंकि सच्चा प्रतिवादकभी…

  • कहने को नया साल है

    कहने को नया साल है   कहने को नया साल है, मेरा तो वही हाल है। वही दिन महीने वही खाने-पीने वही मरना जीना जिंदगी का जहर पीना वही जी का जंजाल है .. कहने को नया साल है.. वही मन में सपने जो पूरे नहीं अपने जिसके लिए मन प्यासा हर साल नयी आशा…

  • दिल तोड़कर | Geet dil tod kar

    दिल तोड़कर ( Dil tod kar )   दिल तोड़कर ग़म से ही प्यार कर दिया! दिल इस क़दर  मेरा आजार कर दिया ये क्या हाये  तूने ये यार कर दिया क्यूं बेसहारा यूं  बेदर्द कर दिया   ये जिंदगी अकेली ऐसी हो गयी के भीड़ में तन्हाई का अहसास हो ऐसा मिला मुहब्बत में…

  • राग रंग अनुपमा | Kavita Rag Rang Anupama

    राग रंग अनुपमा ( Rag Rang Anupama )   राग रंग अनुपमा, होली के पावन पर्व पर लोक आभा मोहक सोहक, सर्वत्र आनंद अठखेलियां । प्रेम बसंती चरम बिंदु, सुलझन गुत्थी पहेलियां । जननी जन्म धरा आह्लाद, लौटते कदमों पर गर्व कर । राग रंग अनुपमा, होली के पावन पर्व पर ।। अंतर्संबंध नेह अभिव्यंजना…

  • वर्षा ऋतु | Varsha Ritu

    वर्षा ऋतु ( Varsha ritu )    रिमझिम फुहारों से दिल फिर खिलेंगे, मेघों के काँधे नभ हम उड़ेंगे। बात करेंगे उड़ती तितलियों से, भौंरों के होंठों से नगमें चुनेंगे। चिलचिलाती धूप से कितना जले थे, मिलकर बरखा से शिकायत करेंगे। पाकर उसे खेत -खलिहान सजते, आखिर उदर भी तो उससे भरेंगे। धरती का सारा…

  • ऐ जिंदगी तुझे | Aye zindagi

    ऐ जिंदगी तुझे ( Aye zindagi tujhe )   ऐ!जिंदगी ,बचपन से ही तुझे उलझते हुए देखा है पसीने से लथपथ पिता का शरीर देखा है मां की आंखों मे ममता का प्यार देखा है अमीरी और गरीबी में फरक देखा है जमीन से खड़े होकर फलक देखा है खुद को हमेशा आंसुओं से तरबतर…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *