विचार-धारा
सच्चाई
कौन दोस्त कौन दुश्मन फ़र्क़ नहीं पड़ता,
कौन अपना कौन पराया फ़र्क़ नहीं पड़ता।
हम चले मंज़िल की ओर एकदम अकेले,
कौन रहबर कौन रहज़न फ़र्क़ नहीं पड़ता।
सोच में सपने संजोये भावी भविष्य के,
कौन नाकाम कौन कामयाब फ़र्क़ नहीं पड़ता।
नक्कमे करते नुक्ताचीनी हर किसी काम में,
कौन नेक कौन नादान फ़र्क नहीं पड़ता।
करते जो कारनामा ख़त़ा तो ज़रूर होगी,
कौन ग़ाफ़िल कौन अहल फ़र्क़ नहीं पड़ता।
ख़ुद करते नहीं करने भी नहीं देते,
कौन कमीन कौन अमीन फ़र्क़ नहीं पड़ता।
दुनिया में दो त़रह़ के लोग कागा,
कौन बुरा कौन अच्छा फ़र्क़ नहीं पड़ता।
राजस्थानी
हम हो गये रंग रंगीले राजस्थानी,
हम ढाटी ढाट के अब राजस्थानी।
तीन पीढ़ियों तब्दील हुई सांगो-पांग,
आदान प्रदान रिश्ता नाता अब राजस्थानी।
खान पान वेष भूषा भाषा चरित्र,
मेल जोल बोल अनमोल हम राजस्थानी।
इक्हत्तर वाले इक्के-दुक्के बुढ़े बुज़ुर्ग,
बांकुड़ी फर्र दाढ़ी-मूंछ हम राजस्थानी।
थारी म्हारी माटी की मान मर्यादा,
दूध में मिश्रण मिश्री हम राजस्थानी।
राजनीति रंग मंच पर पंच सरपंच,
प्रधान विधायक बन गये हम राजस्थानी।
पुत्र पोता दोहिता भाई भतीजा कागा,
सीमा पर प्रहरी पेहलवान हम राजस्थानी।
इश्तहार
इश्तहार चिपके मिलते हैं दीवारों पर,
इश्तहार लिखे मिलते हैं दीवारों पर।
किसी के ह़क़ में कभी ख़िलाफ़,
इश्तहार लगे मिलते दीवारों पर।
तह़रीर लिखता कोई तल्ख़ अंदाज़ में,
इश्तहार तह़रीर ख़ूब मिलते दीवारों पर।
सबक़ आमोज़ होते मज़मून देख कर,
इश्तहार से मिलती नसीह़त दीवारों पर।
बंद किताबों में बाब मालूम नहीं,
इश्तहार बेबाक बोल जाता दीवारों पर।
क़लम कहती सब कुछ ज़ाहिर कागा,
इश्तहार ख़ामोश लिखावट कहती दीवारों पर।
मदद
ग़रीब की मदद कर वो दुआ देगा,
मिस्कीन की मदद कर वो दुआ देगा।
सिर पर छप्पर नहीं आसमान नीचे बसेरा,
बेघर की मदद कर वो दुआ देगा।
चीख़ चिल्ला रहा पीड़ा में हर पल,
रोगी की मदद कर वो दुआ देगा।
फ़ाका-कशी से बिलबिला उठा रोटी को,
भूखे की मदद कर वो दुआ देगा।
ह़ल्क़ तर को चुल्लू भर पानी नहीं,
प्यासे की मदद कर वो दुआ देगा।
बदन पर पहरन नहीं फटे टूटे चीत्थड़े,
नंगे की मदद कर वो दुआ देगा।
पैरों में पैजार नहीं छाले फफोले कागा,
पीड़ित की मदद कर वो दुआ देगा।
चतुर्थ वर्ण
ब्रह्मा मुख उत्पन्न ब्रह्मण भुजा क्षत्रिय जान,
जंघा जाया वैश्य चरण उत्पत्ति शूद्र पेहचान।
चार वर्ण की सृष्टि रचना रंग रूप,
ब्राह्मण विधा वाचन पठन पाठन सुंदर स्वरूप।
क्षत्रिय करे रक्षा जीव जंतु प्राणी की,
आंच नहीं आये सांच को प्राणी की।
वैश्य करे वाणिज्य पालन भरण पोषण आहार,
शूद्र करे सेवा सुश्रा सबकी मधुरिम व्यवहार।
शीश आंख कान नाक मुख जीभ उत्तम,
बुद्धि दृष्टि श्रवण सूंघना खान पान उत्तम।
मन चित्त चिंतन मनन मोह माया मंथन,
सबका स्वामी गुरू ऊंच कुल बड़ा ब्रह्मण।
क्षत्रिय बाहु बली दायां बांया दोनों हाथ,
शक्ति युक्ति मुक्ति दाता विपत्ति में साथ।
तलवार ढाल थाम करे ब्रह्मा की सुक्षा,
यदा कदा ग्रहण गुरु कुल शिक्षा दीक्षा।
सतयुग त्रेतायुग द्वापुरयुग कलयुग रीति नीति परम्परा,
परिवर्तन नहीं कर पाये चौबीस अवतार परम्परा।
कागा वैश्य शूद्र का परम धर्म-कर्म,
सेवा चाकरी में चूक नहीं सनातन धर्म।
भलूमल कागा
(फ़र्स्ट एडिटर)
भलूमल कागा गांव भाडासंधा वाला,
प्रभाणी कागा परिवार भाडासंधा वाला।
बुनाई का करते धंधा आलीशान,
हाथ कर्घा पर हुनर आलीशान।
पिता प्रभा माता सभ्भी सुलक्षणी,
पांच भाई पत्नी जमली सुलक्षणी।
जेष्ठ बांधव सोना मूला सुरजन,
रामचन्द्र अनुज कुल कागा अर्जुन।
बहिनें केसू राजी रामी तीन,
पुत्र नारायण कृपाल दोनों हंसींन।
तरूण राय कागा को पढाया,
क़दम दर क़दम आगे बढ़ाया।
गांव का गोर्व था गम्भीर,
पंच पटेल बड़ा धीर गंभीर।
पोते तीन विजय पृथ्वी महावीर,
ठोर ठिकाना बाड़मेर कागा कुटीर।
बेदर्द बनाम हमदर्द
जिसके पैर नहीं फटी बिवाई,
वो क्या जाने पीड़ पराई।
बेदर्द हमदर्द नहीं बन सकता,
ग़ैर अपना नहीं बन सकता।
मुल्क छोड़ा गांव गवाड़ी गलियां,
झुग्गी झोपड़ी तालाब तला तलियां।
ठोर ठिकाना मह़ल मीनार माड़ियां,
ऊंठ घोड़ा अपनी सवारी गाड़ियां।
सीमाड़ा सेढ़ा जागीर ज़मीन जायदाद,
खेत खलिहान छोड़ीं फ़स़ल इमदाद।
संगी साथी रिश्ता नाता निवाण,
बेरिया पार परिवार रंग रिहाण।
कुढ़ कोटड़ी ओतारा औत़ाक़ गुडाल,
हल हाली नाली कुल्हाड़ी कुदाल।
गायें भैंसें भैंड़ें बकरियां ग्वाले,
कच्चा पक्का घर बिना ताले।
रोते बिलखते अड़ोस-पड़ोस पवित्र,
उदास खड़ी नींबड़ी खेजड़ी क्षेत्र।
सब छोड़ स्वाभिमान लाये साथ,
बपोती छोड़ ईमान लाये साथ।
क़ैद किया कैंपों में मजबूर,
झुके बिके नहीं बन मजबूर।
ज़मीर ज़िंदा रखा किया मुक़ाबला,
मुश्किल को मात रहा बोलबाला।
आंधी त़ूफ़ान बारिश सर्दी गर्मी,
सहन की चाहे सख़्ती नर्मी।
रोड़ों को रोंदा कांटों को कुचला,
पगों छाला हाथों में फफोला।
चले अपनी चाल गड़बड़ी नहीं,
बोल नहीं कड़वा हड़बड़ी नहीं।
ताना तुनका सुन घबराये नहीं,
वाद-विवाद कर टकराये नहीं।
शरणार्थी पद मिला स्वीकार किया,
बेघर बोला गया अंगीकार किया।
इक्हत्तर जंग किया इधर उधर,
बिना सोचे हुए दर बदर।
इज़्ज़त आबरू वास्ते बने बेगाने,
ह़ाल चाल पूछो मत सियाने।
कागा विस्थापित बन स्थापित हुए,
राजनीति सतर पर स्थापित हुए।
नेक मानव
दानव दोगला नहीं बंदा नेक मानव बन,
मानव दोगला नहीं बंदा नेक मानव बन।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध जैन नहीं,
चोर चुग़ल नहीं बंदा नेक मानव बन।
चौला चौग़ा उतार फैंक दे रंग बिरंगी,
ढौंगी पाखंडी नहीं बंदा नेक मानव बन।
मानव आया जग में बन गया दानव,
चापलूस चाटुकार नहीं बंदा नेक मानव बन।
मानव धर्म जाति भाषा विभिन्न रंग रूप,
धर्म मज़हब नहीं बंदा नेक मानव बन।
दीन धर्म का सिद्धांत नहीं आपसी बेर,
ऊंच नीच नहीं बंदा नेक मानव बन।
मां कोख से होते उत्पन्न राजा रंक,
भेद-भाव नहीं बंदा नेक मानव बन।
मल मूत्र से लथपथ बदन जन्मे अनजान,
छूआ-छूत नहीं बंदा नेक मानव बन।
रोता आया नंगा तन रुला जायेगा कागा,
बेर भाव नहीं बंदा नेक मानव बन।
समाज सेवा
समाज की सेवा कर दिलो जान से,
समाज की सेवा कर दिलो दिमाग से।
जिस समुदाय में जन्म लिया कुल तेरा,
क़ौम की क़द्र कर दिलो जान से।
टांग खिंचाई हाथा पाई नहीं कर बेक़द्र,
ख़ानदान की ख़िदमत कर दिलो जान से।
लाख लानत है उन लोफ़र लफंगों को,
कुटुम्ब की पैरवी कर दिलो जान से।
बुराई नहीं बराबरी कर दमखम लगा दमदार,
कुनबे की हिफ़ाज़त कर दिलो जान से।
किरदार तारीफ़े क़ाबिल क़द्दावर कामिल का कागा,
नस्ल की शिनाख्त कर दिलो जान से।
नेक मानव
दोगला नहीं बंदा नेक मानव बन,
मानव दोगला नहीं बंदा नेक मानव बन।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध जैन नहीं,
चोर चुग़ल नहीं बंदा नेक मानव बन।
चौला चौग़ा उतार फैंक दे रंग बिरंगी,
ढौंगी पाखंडी नहीं बंदा नेक मानव बन।
मानव आया जग में बन गया दानव,
चापलूस चाटुकार नहीं बंदा नेक मानव बन।
मानव धर्म जाति भाषा विभिन्न रंग रूप,
धर्म मज़हब नहीं बंदा नेक मानव बन।
दीन धर्म का सिद्धांत नहीं आपसी बेर,
ऊंच नीच नहीं बंदा नेक मानव बन।
मां कोख से होते उत्पन्न राजा रंक,
भेद-भाव नहीं बंदा नेक मानव बन।
मल मूत्र से लथपथ बदन जन्मे अनजान,
छूआ-छूत नहीं बंदा नेक मानव बन।
रोता आया नंगा तन रुला जायेगा कागा,
बेर भाव नहीं बंदा नेक मानव बन।
भलूमल कागा
(फ़र्स्ट एडिटर)
भलूमल कागा गांव भाडासंधा वाला,
प्रभाणी कागा परिवार भाडासंधा वाला।
बुनाई का करते धंधा आलीशान,
हाथ कर्घा पर हुनर आलीशान।
पिता प्रभा माता सभ्भी सुलक्षणी,
पांच भाई पत्नी जमली सुलक्षणी।
जेष्ठ बांधव सोना मूला सुरजन,
रामचन्द्र अनुज कुल कागा अर्जुन।
बहिनें केसू राजी रामी तीन,
पुत्र नारायण कृपाल दोनों हंसींन।
तरूण राय कागा को पढाया,
क़दम दर क़दम आगे बढ़ाया।
गांव का गोर्व था गम्भीर,
पंच पटेल बड़ा धीर गंभीर।
पोते तीन विजय पृथ्वी महावीर,
ठोर ठिकाना बाड़मेर कागा कुटीर।
अछूत
स़दियां गुज़र गई अछूत दबाते रहे,
दया नहीं आई अछूत दबाते रहे।
कीड़ी निचोड़े पानी आता ख़ू़न नहीं,
लाज नहीं आई अछूत दबाते रहे।
डिच आये आमना सामना नहीं किया,
ह़य्या नहीं आई अछूत दबाते रहे।
हूण आये पनाह दी प्रेम से,
शर्म नहीं आई अछूत दबाते रहे।
मुग़ल ग़ज़नवी शेर शाह सूरी आये,
क्रांति नहीं आई अछूत दबाते रहे।
गोरी गैरे आए ग़ुलाम बन गये,
जागृति नहीं आई अछूत दबाते रहे।
भीम राव अम्बेडकर ने करवट बदली,
समझ नहीं आई अछूत दबाते रहे।
गांधी ने दिया गगन चुम्बी नारा,
अंग्रज़ भारत छोड़ो अछूत दबाते रहे।
बोस बोले ख़ून दो आज़ादी दूंगा,
सुभाष चंद्र नारा अछूत दबाते रहे।
भगत सिंह चन्द्र शेखर आजाद राजगुरू,
सुखदेव अशफ़ाक़ बिस्मिल अछूत दबाते रहे।
आज़ादी के आन्दोलन में अछूत अग्रणी,
क़दम दर क़दम अछूत दबाते रहे।
इतिहास गवाह नमक सत्याग्रह में अछूत,
नियम को थोड़ा अछूत दबाते रहे।
आज़ादी मिली अंग्रेजों से मुकमल कागा,
संविधान की शक्ति अछूत दबाते रहे।
धर्म-पत्नि
पत्नी परछाई पति की पुष्प में सुगंध,
लक्ष्मी लुगाई पति की पुष्प में सुगंध।
आज्ञा का करती पालन मन बुद्धि से,
पति व्रत धर्म निभाये चित्त शुद्धि से।
पति परमत्मा आत्मा विस्वास अडिग नियत निर्मल,
करे स्मरण पति नित्त नियम काया कोमल।
पति पत्नि की पावन जोड़ी जग में,
पति प्रेम रस धारा दोड़ी रग में।
पुत्र होता अधीन कामनी के बेबस बिचारा,
माता-पिता को भूल जाता बेबस बिचारा।
शिव पार्वती राम सीता राधा कृष्ण सार,
बिना संगनी नहीं होता भव सागर पार।
कागा पुत्री पराई सम्पति धन दोलत कुटम्ब,
पत्नि सच्चा जीवन साथी ख़ुश रखती कुटम्ब।
झुनझुना
झुनझुना थमा दिया ऊंच नीच का,
ब्रह्मण क्षत्रिय से ऊंच नीच का।
क्षत्रिय वेश्य से ऊंचा होता यहान,
वैश्य शूद्र से होता ऊंचा महान।
वर्ण व्यवस्था ने उलझाया ताना-बाना,
घरों पर दरवाज़ा बंद आना जाना।
धर्म मज़हब की खड़ी विशाल दीवार,
फांद नहीं सके कोई ऊंची दीवार।
जात पात की जकड़ी कड़ियां ज़ंजीर,
टूट नहीं सकी आज तक ज़ंजीर।
हाथों पैरों में बंधी हथकड़ी बेड़ियां,
कैसे चढ़ें ऊंचाई पर लांघ सीढ़ियां।
छूआ-छूत भेद-भाव गैर-बराबरी,
कर नहीं सके कोई आपसी बराबरी।
जात में जात की भावना भरी,
काला गोरा सांवला की भावना भरी।
शुद्ध अशुद्ध पाप पुण्य अंध-विश्वास,
स्वर्ग नर्क का ख़ोफ़ उन्नति विनाश।
आस्था का प्रतीक मंदिर मस्जिद चर्च,
क्षमता ममता समता अनुरूप करते ख़र्च।
आस्तिक नास्तिक तराज़ू के दो पलड़े,
वास्तविक अडिग कांटा ऊंचे नीचे पलड़े।
जीवन एक झूला चलता आगे पीछे,
सीढ़ी के पायदान रहते ऊंचे-नीचे।
कागा सुख दुख की जुगल-बंदी,
होती रहती कभी तेज़ कभी मंदी।
ताजन दास
ताजन दास जोगू सहपाठी बच्चपन के साथी,
पिता चेलोमल माता मेबी बच्चपन के साथी।
स्कूल में पढ़े एक साथ कक्षा में,
मिठ्ठी में फ़ाईनल पास दोनों परीक्षा में।
जैमसाबाद मीरपुर ख़ास घूमने गये एक साथ,
खेलना तफ़रीह़ करना खाना पीना एक साथ।
रड़ियालो रोह़ल कागिया घूमते फिरते संग सदा,
छाछरो की छ्लांग मारते सोखरू यदा कदा।
शादी ग़मी में शरीक होना बड़े शोक़ीन,
ज़रूरत मंद की ख़िदमत करना बड़े शोक़ीन।
मेरी शादी में बाराती बना सीमा पार,
अपना ऊंट लाया अकेला अभे का पार।
बारात लेकर गये इब्राहीम का तला मेरी,
अपना फ़र्ज़ अदा किया इच्छा पूर्ण मेरी।
दो हज़ार चौदह में मेरी ओपन सर्जरी,
मिलने आये मिंयां बीवी दोनों मेरी सर्जरी।
कागा पर एह़सान उम्र भर का भारी,
फ़र्ज़ का क़र्ज़ उतरना मुश्किल उम्र सारी।
राणा राय कागा
मेरा सगा छोटा भाई राणा राय कागा,
मैं उनका बड़ा भाई तरूण राय कागा।
गांव भाडासंधा तालुका छाछरो ज़िला थारपारकर सिंध,
पिता रामचंद्र माता सांझी देवी आत्मिक संबंध।
बिछुड़ गये दोनों वक़्त के हालातों से,
झूझ रहे ज़िंदगी ज़लील मुहाल मुश्क़लातों से।
मुलाक़ात नहीं हो सकी ज़िंदा होते हुए,
अस्सी में गया था मिलने रोते हुए।
पासपोर्ट वीज़ा से पाकिस्तान गया देरी दूरी,
अन्तिम सांसें इंतज़ार में मगर मेरी मजबूरी।
बहिनों को साथ लाया दो महिनों बाद,
वो कठिन पल आते आज तक याद।
दोनों बहिनें नाम ह़रमी ढेली सुघड़ सुशील,
सगाई शादी कराई पन्नू खोखर जात सुशील।
ससुराल गांव गडरा रोड बिजरराड़ दोनों अलग,
मेरा निवास चौहटन दिल नहीं रहे अलग।
दोनों बहिन चली गई मुझे अकेला छोड़,
मां जाये स्वर्गवास हुए अपना मुंह मोड़।
मेघू बाई की शिदी की मिठड़ियो भट्टी,
राणा भाई ने कहते आम सामरोटी पट्टी।
जीजा टाभोजी खोखर मिठ्ठे के आस पास,
खेती पशुपालन काम करते गांव में ख़ास़
तरूण राय कागा तरस रही उदास आंखें,
पलकें भीगी रहती मायूस आंसूओं भरी आंखें।
सुखोमल गंढेर
गाम सोखरू नाम सुखोमल गंढ़ेर बबर शेर,
चुना गया बीडी मेम्बर गंढेर बबर शेर।
छाछरो शहर के अगल बगल ऊंचा टीबा,
गांव सोखरू का गंढेर शेर सुखोमल अजूबा।
सू़रत मूर्त में सुंदर सलोना मधुर वाणी,
नीची तलहटी में पीते पार का पाणी।
गांव सोखरू के अड़ोस-पड़ोस से निर्वाचित,
यूनियन कांऊसिल छाछरो मथारों से हुए निर्वाचित।
सुखोमल बस्तों मल घमूमल रायधन की टोली,
यूनियन में होती हमेशा बुलंद आवाज़ बोली।
आरक्षण की बेसाखी पर नहीं यह नेता,
आम जनता के सहारे दमदार यह नेता।
तरूण राय कागा कहता अपनी आंखों देखी,
लोग कहते कानों सुनी नहीं कभी देखी।
रायधन मल कागा
रामधन मल कागा गांव कागिया सत्ताणी सरताज,
कुल में क़द ऊंचा बड़ा भागिया सत्ताणी सरताज।
घमूमल रायधन मल की जुगल जोड़ी ज़ोर,
आत्मा एक जिस्म दो गांव गली शोर।
समाज सेवा में मन चित्त बुद्धि सदेव,
छाछरो में मिलते-जुलते एक संग सदेव।
आता अगर कोई ग़रीब ग़ुर्बा गांवों से,
पूछते ह़ाल चाल सुख समाचार गांवों के।
होती कोई फ़रियाद सुन करते तुरंत समाधान,
मोहताज नहीं होने देते करते तुरंत समाधान।
पराई पीड़ा अपनी पीड़ा जान करते मदद,
दोनों बीडी मेम्बर चुनाव जीते करते मदद।
रायधन लक्षमण सि़ह सोढा का बांया हाथ,
ईमानदार साबित बावफ़ा हरदम देता रहता साथ।
तरूण राय कागा के दोनों थे चाचा,
हमेशा देते रहते आशीष दुआ दोनों चाचा।
बस्तोमल जोगू
बस्तो मल जोगू भाडासंधा पुश्तेनी पंच पटेल,
बाप दादा परदादा भाडासंधा का प्रमुख पटेल।
उन्नीस सौ चौंसठ में आया दौर चुनावी,
बीडी मेम्बर बना डंके की चोट चुनावी।
यूनियन काउंसिल छाछरो तालुका त़य्य हुआ ह़लका,
गांव भाडासंधा मिल्काम छछी पनपालियो लपलो हल्का।
उम्मीदवार मजनो ख़ान संग्रासी जोगू बस्तो मल,
सरदार सिंह माल्हे जो पार भलू मल।
सीट यूनियन की सामान्य बनी टक्कर बड़ी,
जीते जोगू बस्तो मल नहीं कोई गड़बड़ी।
मेघवाल समाज में जशन मनाया जोश से,
ढोल ढमाका बजे गीत गूंजे होश से।
नोजवान बस्तों मल बड़े बुलंद बहादुर अगवान,
जनता ने सौंपी मज़बूत हाथों में कमान।
उन्नीस साल उम्र का तरूण राय कााग,
अल्हड़ जवानी में चुनाव का जोश जागा
नाख़ुश लोग
वालदीन औलाद को बराबर ख़ुश नहीं रख सकते,
मालिक मख़लूक़ को बराबर ख़ुश नहीं रख सकते।
ख़्वाहिशें मुकमल नामुमकिन कर सकते मां बाप क़त़ई,
पसंद नापसंद सबकी अलह़दा ख़ुश नहीं रख सकते।
किसी को बनाता अमीर किसी को ग़रीब गु़र्बा,
कोई दाता कोई मंगत ख़ुश नहीं रख सकते।
बारिश से बाढ़ आती सेलाब सनसनी ख़ेज़ बन,
कहीं क़ह़त़ का क़हर ख़ुश नहीं रख सकते।
गर्मी का मौसम आंधी त़ूफ़ान सुनामी का ख़ोफ़,
तपती दुपहरी पसीना तरबतर ख़ुश नहीं रख सकते।
जाड़े में जान जंजाल हाड कांपते हरदम कागा,
दुबक जाते घरों में खुश नहीं रख सकते।
ईर्ष्यालू
हाथी के पीछे सैंकड़ों कुत्ते भूंकते परवाह नहीं,
फ़की़र के पीछे सैंकड़ों कुत्ते भूंकते परवाह नहीं।
हाथी ने बिगाड़ा नहीं कभी कुत्तों का कुछ,
फ़क़ीर ने बिगाड़ा नहीं कभी कुत्तों का कुछ।
हाथी क़द में क़द्दावर बड़ा कान मिलाता रहता,
कुत्ते ख़ूब भोंकते देख कर कुछ नहीं कहता।
भिखारी मांगता भीख दर दर जाता हर रोज़,
कुत्ता बिना झोले का फ़क़ीर जाता हर रोज़।
इंसान करता हस़द बुराई ईर्ष्या ज़कात ख़ेरात वास्ते,
फ़ित़रत फ़ितनत फ़क़ीर ह़क़ीर कुत्ता जेसी ख़ेरात वास्ते।
कागा ख़ूबी नहीं ख़ानदान की करते गिला शिकवा,
ना-जायज़ करते साज़िश बिना वजह गिला शिकवा।
ज़िंदगी
ज़िंदगी में हर लम्ह़ा इमित्याहान होते है,
बंदगी में हर लम्ह़ा इमित्याहान होते है।
बिना इंसानियत केसा इंसान ह़ेवान के बराबर ,
गंदगी में हर लम्ह़ा ईमान होते है।
अशरफ़ अल मख़लूक़ात में मुख़त्लफ़ कुछ नहीं,
पसमांदगी में हर लम्ह़ा हुकमरान होते है।
क़द्र कर क़द्दावर की क़द्रदान बन कर,
शर्मंदगी में हर लम्ह़ा फ़रमान होते है।
ज़ालिम का ज़ुल्म सित्म ज़ख़्म मज़लूम पर,
दरिंदगी में हर लम्ह़ा घमासान होते है।
सफ़र जारी रख मुसलसल मंज़िल मुश्किल कागा,
आमांदगी में हर लम्ह़ा आसान होते है।
सच्चाई
दूध का जला छाछ फूंक कर पीता है,
ख़ोफ़ में पला घुट-घुट कर जीता है।
स़दियों से ग़ुलामी झेली दरिंदों की दरिंदगी देख,
दर-दर की ठोकरें खाई मुश्किल मांदगी देख।
कमर में बंधा झाड़ू गर्दन में लटकी हांडी,
रास्ता बदल चलना पड़ता किसी कंटीली पग-डांडी।
हाथों में हथकढ़ी पैरों में जकड़ी मज़बूत बेड़ियां,
बदन पसीने से तरबतर लहु से लथपथ एड़ियां।
औरतों का अंग ढकना इजाज़त नहीं नंगा जिस्म,
होती ह़वस का शिकार ह़ेवानों का नंगा जिस्म।
देव दासी बन रहना पड़ता मंदीरों में मौजूद,
करते एशो अ़शरत बालाओं से नहीं कोई वजूद।
सुहाग रात मनाई जाती दबंगों की ह़वेली पर,
लुटती अ़स्मत आती आफ़्त दुल्हन नई नवेली पर।
नवरोज़ का नाज़ुक का़यदा क़ानून लागू ग़रींब पर,
ज़ोरी ज़ना होता मनमर्ज़ी के ख़िलाफ़ ग़रीब पर।
कागा होता जंगल में पहाड़ों पर बेबस बसेरा,
घुमकड़ बन घूमते घाट घाटी देते रात डेरा।
लूट खसोट
बुद्ध-हीन करते मतदान बिना सोच विचार,
बुद्धि-मान करते मतदान मति सोच विचार।
अंध-भक्त करते मतदान लकीर के फ़क़ीर,
मंद-बुद्धि करते मतदान कहते जेसा अमीर।
आज कल करते जाति धर्म पर मतदान,
विरला करते राष्ट्र हित में अपना मतदान।
अपने मत का मोल तोल नहीं जानते,
मूर्ख गंवा देते बेकार मोल नहीं जानते।
लोभ लालच में देते मत अपना मुफ़्त,
दारू की दो घूंट पर अपना मुफ़्त।
पांच बरस सिर पीटते अपना विकास नहीं,
आता नया नवेला जिस पर विश्वास नहीं।
कागा बहला फुसला करते बर्बाद हर बार,
लूट लेते लुटेरे हर ठोर बार-बार।
खोटे सिक्के
खोटे सिक्के काम नहीं आते ख़रीद-फ़रोख़्त में,
खन-खन करते ख़ूब बेकार ख़रीद-फ़रोख़्त में।
भारी भरकम बोझ बनते चलते नहीं बज़ार में,
कम्मी खोजते रहते हरदम हमेशा पराये किरदार में।
रंग-दारी खरीददारी में कोई मोल तोल नहीं,
भीख में नहीं लेता भिखारी मोल तोल नहीं।
त़ोत़ा बोलता बक-बक बकवास बंद पिंजरे में,
बाज़ करता परवाज़ बुलंद नहीं होता पिंजरे में।
ग़ुलाम को ग़ैरत हैरत नहीं आ़दत से मजबूर,
जी-ह़ुजूरी करता हरदम मोह़ताज मायूस उदास माज़ूर।
आज़ाद को आज़ादी पसंद ग़ुलाम को पसंद गुलामी,
झुक रुक झिझक करता अपने आका की सलामी।
टांग दिया ज़मीर ऊंचा खूंटी में बेज़मीर ने
नाम रोशन किया क़ौम का बाख़ुलूस़ बाज़मीर ने।
बेच देते बेईमान अपना ईमान चंद कोड़ियों में,
हाथों में लगी हथकड़ियां पैर जकड़े बेड़ियों में।
कागा ज़ात पात गै़र-बराबरी का मर्ज़ मूज़ी,
लुक़मान ह़कीम के हाथ खड़े लाइलाज मर्ज़ मूज़ी।
हलचल
साथी साथ चल हाथ पकड़ कर चल,
क़दम दर क़दम हाथ पकड़ कर चल।
हलचल जारी रख हर वक़्त हर घड़ी,
रुक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
सीना तान अकड़ चल नेक राह़ पर,
झुक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
चलती का नाम गाड़ी खड़ी नाम खटारा,
थक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
टांग खिंचाई करने वाले खड़े पीछे तेरे,
झिझक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
बद-चलन को होती जलन उन्नति पर,
हिचक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
कौन सगा कौन दग़ा बाज़ पेहचान कर,
शक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
किस्मत पर नहीं मेहनत पर कर भरोसा,
ह़क़ नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
राह़ में रोड़े कांटे बिछाने वाले अनेक,
भटक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
प्रलोभन की परवाह नहीं ईमानदार इंसान बन,
अटक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
नाम रोशन कर अपने कुल का कागा,
लटक नहीं चल हाथ पकड़ कर चल।
उगता सूरज
उगते सूरज को सलाम डूबते को नहीं,
जलते चिराग़ को सलाम बुझते को नहीं।
सूरज की किरन कायनात पर होती रोशनी,
डूबने पर होता अंधेरा ग़ायब होती रोशनी।
रात की तारीकी में उजाला करती शम्मा,
खुद ग़र्ज़ स़ुबह़ होते बुझा देते शम्मा।
अपनी आक़ा को करते सलाम दिमाग़ी ग़ुलाम,
तलवे चाटते क़दम दर क़दम दिमाग़ी ग़ुलामम।
बेदर्द की बजाय हमदर्द बन मर्द मुजाह़िद,
कर मदद माज़ूर मजबूर की मर्द मुजाह़िद।
इंसान की औलाद तुम इंसान बन आलीशान,
इंसानियत मज़हब तेरा तुम इंसान बन आलीशान।
कागा फ़िरक़ा प्रस्ती ह़ेरान करती ह़रकत हलचल,
ह़रकत में बरकत जारी रख हरदम हलचल।
तानाशाह
शाह बन बादशाह बन तानाशाह नहीं,
शाह बन शहंशाह बन तानाशाह नहीं।
हुज़ूर ग़ुरूर नहीं कर मग़रूर बनकर,
शाह बन हमराह बन तानाशाह नहीं।
सिकंदर चला गया दुनिया फ़ानी से,
शाह बन परवाह बन तानाशाह नहीं।
हिटलर की ह़ुकूमत का ह़शर हुआ,
शाह बन राह बन तानाशाह नहीं।
ह़ातम त़ाई ने नाम रोशन किया,
शाह बन स़लाह़ बन तानाशाह नहीं।
डूबते को तिनके का सहारा कागा,
शाह बन मलाह़ बन तानाशाह नहीं।
अमीर-ग़रीब
लूट चोरी की दोलत ख़ानदान का खात्मा,
ह़राम ख़ोरी की दोलत ख़ानदान का खात्मा।
पसीने से तरबतर कमाई का तोड़ नहीं,
घूस ख़ोरी की दोलत ख़ानदान का खात्मा।
ईमानदारी की मेह़नत मज़दूरी बरकत का भंडार,
चुग़ल खोरी की दोलत ख़ानदान का खात्मा।
छीना झपटी कर डाका डाल करते बर्बाद,
जबर ज़ोरी की दोलत ख़ानदान का खात्मा।
ब्याज बटोरते बेबसी देख मजबूर मिस्कीन की,
सूद ख़ोरी की दोलत ख़ानदान का ख़ात्मा।
तोल मोल में करते बेईमानी उतार चढ़ाव,
हेरा-फेरी की दोलत ख़ानदान का ख़ात्मा।
अस़ली चीज़ बदले देते नक़ली झोल लगाये,
धोखा-धड़ी की दोलत ख़ानदान का ख़ात्मा।
नुमाइंदा बन धन एंठते भोले भालों से,
चंदा फोड़ी की दोलत ख़ानदान का ख़ात्मा।
दबंग करते दादगिरी दरिंदगी की ह़दें पार,
सीना-ज़ोरी की दोलत ख़ानदान का ख़ात्मा।
गुमराह करते ग़रीबों को देते लालच कागा,
बेगार बटोरी की दोलत ख़ानदान का ख़ात्मा।
बोझ
अंतिम समय काया बोझ बन काम नहीं देती,
अंतिम समय माया बोझ बन काम नहीं देती।
अर्थी पर सोया निढाल पार्थिव शरीर हिलता नहीं,
रोते बिलखते परिजन उदास मायूस मिलता जुलता नहीं।
रूह़ को ढोया जीवन में छोड़ गया साथ,
माता-पिता पुत्र-पुत्री पति-पत्नी नहीं साथ।
स्नान तक अपने हाथों से कर नहीं पाया,
अंधेरे में छोड़ देती है साथ अपनी छाया।
कुल कुटुम्ब वास्त़े ख़ून पसीना बहाया जीवन भर,
मत़लब की मीत प्रीत निभाई मोहनी जीवन भर।
अर्थी उठी आंगन से चार जनों का कंधा,
अपनों ने जलाया दफनाया मुखाग्नि देकर अपना कंधा।
कागा दुनिया में दग़ा बाज़ नहीं कोई सगा,
संगी साथी कोई नहीं सगा जो दिल लगा।
घमूमल चेलाणी
घमूमल गांव कागिया चुने गए बीडी मेम्बर,
सीट सामान्य कागिया जीत गए बीडी मेम्बर।
छाछरो शहर में छाप छोड़ी मेघवाल होकर,
मेघवाल समाज की बेगार बंदिश मार ठोकर।
तालुके में तह़लका मचाया सरे बज़ार में,
पुलिस थाना में पेठ बढ़ी स़ूबेदार में।
मुख़्तारकार इज़्ज़त देता इजलास में आने पर,
सिपाही जमादार करते सलाम थाना आने पर।
खावड़ कंठो के करते अदब सैयद खोसा,
क़ाबिल शाह लछमण सिंह राजो खा़न खोसा
दाहली के बिजेरा सोढ़ा रहुमा नोहड़ी समेजा,
छापर खींसर जेसे का पार केलहण जाड़ेजा।
अमराणे के अड़ोस-पड़ोस जागीर गांव बाहड़ाई,
हवेली भड़ेली तक जान पहचान खारोड़ो खलड़ाई।
कहता तरूण कागा मेघवाल जात के मुखी,
करते सेवा सबकी रखते मन को सुखी।
भव -सागर
भव सागर में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्राणी,
हंस चुगता मोती बगुला भिन्न आकार के प्राणी।
उल्लू उजाड़ देता बाग़ बगीचा नील गाय खेत,
मोर नाचे मोज मस्ती में मोरनी मन हेत।
गिद्ध नोचे मृत पशू कंकाल कूकर कुत्ते सियार,
शेर सूंघे नहीं पराया शिकार भूख मरे अपार।
सांप नेवले का युद्ध परम्परा आपसी बेर जान,
सांप छछूंदर नहीं निगल सके नहीं उगल जान।
सीप पड़ी समुंदर तट संग शंख सुरीली नाद,
मगर-मच्छ बहाता आंसू आंखों में भाव स्वाद।
संत महंत पीर फ़कीर का उद्देश्य मार्ग-दर्शन,
भोले भाले जन को गुमराह करें भौंडा प्रदर्शन।
कागा चोर लुटेरे भृष्ट आचरण चापलूस चुग़ल चाटुकार ,
करते ज़ोर ज़ुल्म सित्म व्यभिचार मकार ठग बलात्कार।
रिश्ता-नाता
मां-बाप का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ,
बहिन भाई का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ।
प्रेम जैसा कोई नाता नहीं जग में,
पति पत्नी का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ,
रक्त के रिश्ते से भावना भाव सुंदर,
जीजा जीजी का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ।
दो परिवारों का होता मिलन आपस में,
सास ससुर का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ।
सगा संबंधी मिल जुल करते मेल जोल,
बेटा-बेटी का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ।
अनजान दिल करते रिश्ते आंखों से अपना,
दिलो जान का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ।
वंश वृद्धि होती दुनिया का दस्तूर कागा,
पावन पीढ़ी का रिश्ता दुनिया में दुर्लभ।
बाप की पगड़ी
बाप की पगड़ी उछलने मत देना,
बाप की पगड़ी कुचलने मत देना।
बेटा हो चाहे बेटी ख़्याल रखना,
बाप की दिल जलने मत देना।
अगर सिर पर सजायें कोई ताज,
बाप की लाज मिटने मत देना।
जवानी के जोश में फिसल कर,
बाप के राज़ हटने मत देना।
परिवार की परम पूंजी हो पुनीत,
बाप की बपोती घटने मत देना।
दामन पर दाग़ लगे करेंगे कोशिश,
बाप की साख टूटने मत देना।
बेटा-बेटी बाप की दाढ़ी मूंछ,
बाप की नाक कटने मत देना।
मां-बाप ने पाला नाज़ से,
बाप के अरमान बंटने मत देना।
औलाद की बेरूखी करती बर्बाद कागा,
बाप के ख़्वाब सिमटने मत देना।
विजय राजस्थान
जय जय राजस्थान जय विजय राजस्थान,
जय मरू राजस्थान जय विजय राजस्थान।
धोरा धरती धूल भरी चलती आंधियां,
सीमा ढाट सिंध की विजय राजस्थान।
मारवाड़ मरूधर मेवाड़ बागड़ नैयड़ नर्मदा,
सरह़द गुजरात कच्छ भुज विजय राजस्थान।
भैरोंसिंह जैसा बबर शेर जसवंतिंह जसोल,
मालाणी शेखावाटी का मेल विजय राजस्थान।
मेवात ढूंढाड़ मध्य-प्रदेश उत्तर-प्रदेश,
पंजाब हरियाणा अड़ोस-पड़ोस विजय राजस्थान।
ग्वालियर की राजकुमारी धोलपुर की महारानी,
वसुन्धरा राजे सिंधिया मुख्यमंत्री विजय राजस्थान।
राजस्थान बना राजपूताना के रजवाड़े कागा,
भारत में नाम रोशन विजय राजस्थान।
नज़ाकत
सांप निकल गया मूर्ख लकीर पीट रहे हैं,
वक़्त गुज़र गया मूर्ख लकीर पीट रहे हैं।
गुज़रा ज़माना आता नहीं दोबारा कितना करो जतन,
झूठे बेबुनियाद आरोप लगाने से होता नैतिक पतन।
कुकुरमुत्ते की त़रह़ उगते क़ौम में बेनस्ल व्यक्ति,
करते टांग खिंचाई आगे बढने नहीं देते व्यक्ति।
विश्वास घात कर आघात देते क़दम दर क़दम,
दग़ा बाज़ दलाल दोगले दब्बू क़दम दर क़दम।
आदत फ़ित़रत फ़ितनत की पीढ़ी-दर-पीढ़ी,
करते कोशिश नीचा गिराने की सीढ़ी-दर-सीढ़ी।
कम्मी खोजते हर काम में अच्छा चाहे बुरा,
कर देते छलनी घौंप पीठ पीछे ख़ंजर छुरा।
कागा करेला चढ़े नीम आम के दरख़्त पर,
ज़ायका रहे कट्टू कड़वा इमली के दरख़्त पर।
जात पात
ज़ात पात का जंजाल जीने नहीं देता,
ज़ात पात का जाल जीने नहीं देता।
गूंथ रखा ताना-बाना बुना सोच विचार,
दीन मज़हब का जाल जीने नहीं देता।
फ़िरक़ा प्रस्ती की गहरी खोद दी खाई,
छूआ-छूत का जाल जीने नहीं देता।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध जैन धर्म,
ऊंच-नीच का जाल जीने नहीं देता।
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे में बांट दिया,
भेद-भाव का जाल जीने नहीं देता।
ओछी सोच पैर में नोच बड़ी रुकावट,
उतार-चढ़ाव का जाल जीने नहीं देता।
अमीर ग़रीब शाह गद्दा क़लंदर सिकंदर कागा,
दीवार-दरार का जाल जीने नहीं देता।
बुरी नज़र
मेरे मुल्क को बुरी नज़र नहीं लगे,
मेरे वत़न को बुरी नज़र नहीं लगे।
ओ बुरी नज़र वाला तेरा मुंह काला,
मेरे देश को बुरी नज़र नहीं लगे।
सालों से ग़ुलाम रहे ग़ैरों गोरों के,
मेरे स़ूबे को बुरी नज़र नहीं लगे।
डिच हूण चंगेज़ मुग़लों ने की हुकूमत,
मेरे भारत को बुरी नज़र नहीं लगे।
हिमाचल हरियाणा-पंजाब बंगाल बिहार आसाम अपना,
मेरे हिंदुस्तान को बुरी नज़र नहीं लगे।
गुजरात मराठा एमपी यूपी उत्तरांचल उत्तराखंड तमिलनाडु,
मेरे राजस्थान को बुरी नज़र नहीं लगे
गंग यमुनी संस्कृति वेश भूषा भाषा विभिन्न,
मेरी एकता को बुरी नज़र नहीं लगे।
काश्मीर से कन्या-कुमारी तक हम एक,
मेरे सिंध को बुरी नज़र नहीं लगे।
राष्ट्र गान में वचन हमारा सुरक्षा का,
मेरे राष्ट्र को बुरी नज़र नहीं लगे।
अब पराधीन नहीं स्वाधीन है गणतंत्र स्वतंत्र,
मेरे संविधान को बुरी नज़र नहीं लगे।
हिमालय पर्वत सिर-मोर सुरक्षा कवच कागा,
मेरे संकल्प को बुरी नज़र नहीं लगे।
आज़ाद वत़न
कौन वफ़ादार वत़न का सबको पता है,
कौन ईमानदार मुल्क का सबको पता है।
आज़ादी के वास्ते़ हर मोर्चे पर लड़े,
कौन ग़द्दार वत़न का सबको पता है।
तिरंगा थाम हाथ में देते बुलंद नारा,
कौन जानदार वत़न का सबको पता है।
अंग्रेज़ भारत छोड़ो अब जनता जाग चुकी,
कौन दमदार वत़न का सबको पता है।
भगतसिंह चन्द्रशेखर राजगुरू चढ़े सूली पर बेहिचक,
कौन किरदार वत़न का सबको पता है।
अंबेडकर जैसा कोई वीर नहीं वत़न बावफ़ा,
कौन सरदार वत़न का सबको पता है।
महात्मा गांधी सुभाष चन्द्र बोस अशफ़ाक़ बिस्मिल,
कौन शानदार वत़न का सबको पता है।
तुम मुझे खून दो मैं आज़ादी दूंगा,
कौन क़द्दावर वत़न का सबको पता है।
सरदार पटेल ने रियास्तों को जोड़ा कागा,
कौन आधार वत़न का सबको पता है।
ग़ैर-बराबरी
छूआ-छूत भावना आज भी होती है,
ऊंच-नीच कामना आज भी होती है।
जात-पात का झंझट जारी ज़ोर है,
भेद-भाव छल कपट भारी शोर है।
दीन मज़हब की जड़ें गहरी पाताल में,
भक्ति शक्ति ठहरी चाल मकड़ जाल में।
राम रहीम वाहे-गुरू निज एक नाम,
भ्रम-क्रम भ्रमाया भिन्न भिन्न दिय नाम।
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे बनाये अनेक स्थल,
इबादत पूजा पाठ की रस्मो रिवाज स्थल।
कागा कर्म कांड रोज़ा नमाज़ व्रत उपवास,
खोपड़ी की मति न्यारी सबका अपना विश्वास।
गुमराह
पैसा पाने पर पिघल मत जाना,
पद पाने पर पिघल मत जाना।
जीवन में आते क्षण लालच के,
घूस पाने पर पिघल मत जाना।
मूर्ख बनाने वस्ते़ अपनाते लोग हथकंड़े,
प्रशंसा पाने पर पिघल मत जाना।
अपने मत़लब ख़ात़िर थूक चाट लेते,
चाट पाने पर पिघल मत जाना।
मयखाने में मिल जुल मनाते महफ़िल,
प्याला पाने पर पिघल मत जाना।
रंग रूप सुंदरी की चमक देख,
झलक पाने पर पिघल मत जाना।
सत्ता संगठन के सपने लुभाये कागा,
नज़ारा पाने पर पिघल मत जाना।
मेघवाल
मेघवाल मुआशरे ने करवट बदली तरक़्क़ी की जानिब,
तालीम तहज़ीब ने तक़दीर बदली तरक़्क़ी की जानिब।
अपनी औलाद को फ़ोलाद बनाया तालीम की ताक़त,
सलूक में सादगी पसंद बनाया तहज़ीब की ताक़त।
वक़्त की नज़ाकत को परखा पहचाना नज़दीक से,
इल्म आमाल को सीने से लगाया नज़दीक से।
सितारे गर्दिश में गुम थे ह़ाशिये पर ख़ुद,
सुर्ख़ियों में सुख़ुरू शरीक शामिल बुलंद खु़द बख़ुद।
सियासत के हर मरह़ले सिर मोर बने असरदार,
आला औह़दा अफ़सर रोब रुतबा हासिल दलेर दमदार।
मरकज़ स़ूबे में वज़ीर हर महकमे में मोतबर,
फ़र्श से अ़र्श तक शानो-शौकत मोज़िज़ मोतबर।
अपने दमखम बल-बूते पर जद्दो-जहद कर
मुकमल मुक़म ह़ास़ल किया जान रख हथेली पर।
रुके नहीं झुके नहीं थके नहीं बिके नहीं,
ज़मीर ज़िंदा रखा अपना ईमान बुलंद बिके नहीं।
कागा ज़िंदगी का मय्यार क़ाबिले तारीफ़ उम्दा अजूबा,
फ़लक पर फ़हमीदा संजीदा अजीबो-गरीब उम्दा अजूबा।
नया दौर
ज़माना बदल गया झमूरियत का दौर है,
ज़माना बदल गया अकस़रियत का दौर है।
राज-शाही ताना-शाही त़ौर त़रीक़ा तब्दील,
निज़ाम बदल गया झमूरियत का दौर है।
अकलियत का क़द्र क़ीमत नहीं होती बेकद्री,
भाईचारा बदल गया झमूरियत का दौर है।
बग़ावत के बीज बोये जाते खेतों में,
किसान बदल गया झमूरियत का दौर है।
किसान को नहीं मिलता फ़स़ल का मोल,
रवेईया बदल गया झमूरियत का दौर है।
ग़रीब का कोई धणी धोरी नहीं अकेला,
मनस़ूबा बदल गया झमूरियत का दौर है।
कुत्तों को पालते घरों में प्यार से,
नज़ारा बदल गया झमूरियत का दौर है।
अछूत का आदर होता चुनाव होने तक,
वक़्त बदल गया झमूरियत का दौर है।
चंदा फ़ोडी़ से चुनाव होते अमीरों से,
ढांचा बदल गया झमूरियत का दौर है।
गायें घूमती गलियों में बेसहारा बन कर,
सहारा बदल गया झमूरियत का दौर है।
इंसान की इज़्ज़त आबरू नहीं रहज़न रहबर,
रुख़ बदल गया झमूरियत का दौर है।
सिर गिने जाते सरे आम नाकाम के,
सितारा बदल गया झमूरियत का दौर है।
रोब रुतबा रसूख शान शौकत क़ायदा कागा,
ताज बदल गया झमूरियत का दौर है।
अम्बेडकर
अम्बेडकर का अपमान किसने किया मालूम करो,
अम्बेडकर को सम्मान किसने दिया मालूम करो।
नन्हा बालिक स्कूल के बाहर बेठ पढ़ा,
भूखा प्यासा उपेक्षा का शिकार आगे बढ़ा।
रामजी की संतान भीमा बाई का लाल,
चौदहवां चमकता रतन महार जाति का नौनिहाल।
लिखने पढ़ने में महान चालाक चतुर सुजान,
अपमान का घूंट पिया चाल गया जान।
विदेश की भूमि पर अपना परचम फेहराया,
बन क़ाबिल कामिल दुश्मन का मनस़ूबा हराया।
बत्तीस डिग्रियां हासिल की बनाया दर्जा अवल,
सोये समाज को जगाया नींद से अवल।
राजनीति में सक्रिय समाज सेवा मे लग्न,
बीड़ा उठाया भैद भाव मिटाने की लग्न।
भारत का संविधान बनाया आरक्षण का प्रावधान,
सर्व धर्म समान हर समस्या का समाधान।
कागा शिक्षा संगठन संघर्ष का किया नारा बुलंद,
बराबरी का पाठ पढ़ाया किया नारा बुलंद।
अहंकार
ज़मीनी हकीकत मालूम नहीं करते आसमान में बातें,
ह़ालात बड़े संगीन है गुज़ार रहे रंगीन रातें।
पर लग गये परवाज़ वास्त़े च्योंटियों को अचानिक,
पड़ी बारिश की चंद बूंदे जिस्म पर अचानिक।
आया हवा का झौंका झड़ गये सारे पंख,
समुंद्र किनारे लहरों से निकले सीपों संग शंख।
हंस चुगता मोती बगुला गटके मछलियां आंखें मूंद,
चातक चखता आसमान से गिरती असोज की बूंद।
बाहूबली धनबल सत्ता के ख़ुमार में मद मस्त,
जो होता उदय सूरज उनको होना पड़ता अस्त।
रावण स्वर्ण लंका हो गई खंडहर में तब्दील,
कंस का वंश हो गया ध्वंश तबाह तब्दील।
कौरव पांडों का आपसी विवाद महाभारत कुरुक्षेत्र युद्ध,
कृष्ण की अहम भूमिका निभाई न्याय अन्याय युद्ध।
कागा अहंकार डुबो देगा मंझधार में डगमगाई नाव,
चोट मिट जाती नहीं मिटते कड़वा बोल घाव।
मानवता
जो कुल का नहीं वो किसी का नहीं,
जो कुटुम्ब का नहीं वो किसी का नहीं।
नो माह मां की कोख में रहे काबू,
जो मां का नहीं वो किसी का नहीं।
वालदीन ने परिवर्श की दोनों ने मिल जुल,
जो वालदीन का नहीं वो किसी का नहीं।
बहिन भाई के संग खेला खाया पिया साथ,
जो सहोदर का नहीं वो किसी का नहीं।
दाद दादी ताऊ ताई चाचा चाची ने दुलारा,
जो परिजन का नहीं वो किसी का नहीं।
अड़ोस-पड़ोस संगी साथी गांव ग्वाड़ी में जिया,
जो अपनों का नहीं वो किसी का नहीं।
जवानी में कदम रख किया ग्रहण दाम्पत्य जीवन,
जो कामनी का नहीं वो किसी का नहीं।
वो इंसान नहीं ह़ैवान शेत़ान शातिर जीव जानवर,
जो इंसान का नहीं वो किसी का नहीं।
गौतम महावीर भृतरी ने राज पाठ छोड़ा अपना,
जो आध्यात्म का नहीं वो किसी का नहीं।
मानवता ममता क्षमता समता नहीं सत्ता से प्रेम,
जो जनता का नहीं वो किसी का नहीं।
नफ़रत का बीज बोता खेत बाग़ बगीचों में,
जो एकता का नहीं वो किसी का नहीं।
आचार विचार व्यवहार में दग़ा बाज़ रूखा कागा,
जो किसी का नहीं वो किसी का नहीं।
मानसिक ग़ुलाम
मेरा सुन संदेश जवान मत बन मानसिक ग़ुलाम,
मुकदर होगा बद-गुमान मत बन मानसिक ग़ुलाम।
चापलूसी चुग़ली के सहारे आगे बढ़ना अच्छा नहीं,
नहीं कर बर्दाशत अपमान मत बन मानसिक ग़ुलाम।
अनपढ़ जाहल नस्ल पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ रहे,
जागृत कर अंदर अभिमान मत बन मानसिक ग़ुलाम।
शिक्षा संगठन संघर्ष का कर नारा बेह़द बुलंद,
मिलेगा ज़रूर आत्म-सम्मान मत बन मानसिक ग़ुलाम।
गुमराह करने की मिलेगी लालच लाली पोप लोभ,
नहीं बेचना अपना स्वाभिमान मत बन मानसिक ग़ुलाम।
पैसा पद घूस से घेरा बंदी होगी कागा,
फिर करेंगे बेईमान बदनाम मत बन मानसिक ग़ुलाम।
दीवार
दीन मज़हब की दीवार किसने खड़ी की,
जात पात की दीवार किसने खड़ी की।
सैंईयां ने इंसान बनाया एक मिट्टी से,
ऊंच नीच की दीवार किसने खड़ी की।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई बौध जैन पारसी,
भेद भाव की दीवार किसने खड़ी की।
मठ मंदिर मस्जिद चर्च गुरू द्वारा स्तुप,
बंदर बांट की दीवार किसने खड़ी की।
काला गोरा सांवला रंगों में बांटा किसने,
प्यार नफ़रत की दीवार किसने खड़ी की।
रोटी का धर्म नहीं पानी की जात,
छूआ-छूत की दीवार किसने खड़ी की।
अल्लाह ईश्वर को अलग कर पुकारा गया,
पूजा बंदगी की दीवार किसने खड़ी की
हवा पानी आग अर्श ज़मीन की तक़सीम,
सूरज चांद की दीवार किसने खड़ी की।
हरा गैरुआ सफेद नीला काला रंग कागा,
सीमा सरह़द की दीवार किसने खड़ी की।
कोशिश
कोशिश कामयाबी की कुंजी खोले किस्मत का ताला,
बिना कोशिश खुलता नहीं बंद क़िस्मत का ताला।
करते रहो कोशिश जब तक जिस्म में जान,
कोशिश से खुलते बंद किंवाड़ अपना घर मकान।
कोशिश से पत्थर तोड़ निकले पाताल से पानी,
किसान पैदा करे खेतों में अनाज सिंचित पानी।
कल कारख़ाना मिल मशीन कुदाल कैंची सुई धागा,
छेनी हथोड़ा हंसिया पावड़ा हाथ में मज़दूर जागा।
ख़ून पसीने की मेह़नत से करता कमाई भरपूर,
करता परिजन का भरण पोषण जीवन भर भरपूर।
कागा शिक्षा शेरनी का दूध पिये वो दहाड़े,
गुरू कुल में ज्ञान प्राप्त करो पढ़ो पहाड़े।
आ़दत
चोरी सीना ज़ोरी आ़दत पुरानी,
चोरी ह़राम ख़ोरी आ़दत पुरानी।
ह़लाल की कमाई नहीं खाई,
दलाल बन खाई आ़दत पुरानी।
रहज़न रहबर बन किया गुनाह,
हेरा-फेरी की आ़दत पुरानी।
मुख़बर बन की ग़द्दारी हमेशा,
वत़न दुश्मन की आ़दत पुरानी।
पराई पेहलू में बेठ बेक़रार,
मोह़ताज माज़ूर की आ़दत पुरानी।
ग़ुलाम बने ग़ैरत नहीं ज़रा,
तलवे चाटने की आ़दत पुरानी।
जूठन खुरचन रूखा सूखा बासी,
ख़ोराक खाने की आ़दत पुरानी।
पैवंद लगी पौशाक पहनी उतरन,
बेशर्म होने की आ़दत पुरानी।
ताना तुनका सुन रहे ख़ामोश,
स़ब्र करने की आ़दत पुरानी।
जूतों की जगह बेठना मुक़र्र,
लाज ह़य्या नहीं आ़दत पुरानी।
जु़ल्म सित्म बर्दाशत किया कागा,
आ़दत से मजबूर आ़दत पुरानी।
लालच
ख़ुद मत़लबी ख़राब पीते शराब एक प्याली में,
खुद मत़लबी नवाब खाते कबाब एक थाली में।
ग़र्ज़ मूज़ी मर्ज़ कहता गधे को अपना बाप,
झुक कर क़दम चूमता चुप-चाप अपने आप।
इशक़ की भूख बुरी नहीं देखे जात पात,
मुर्दा नोच लेता मांस कुत्ते का लगाये घात।
मंदिर में दाख़िला नहीं पैसों से नहीं परहेज़,
देख खन-खन टकसाल की नहीं करते गुरेज़।
ह़वस की आग जब भभक जाती जवानी में,
होते हम-बिस्तर ऊंच-नीच छोड़ नादानी में।
वोट का वास्ता करते नाश्ता मिल जुल साथ,
भेद-भाव भूल जाते मिलाते हाथ में हाथ।
मौक़ा प्रस्त देते धोखा दग़ा बाज़ दोगले दबंग,
उस़ूल को रख ताक पर बनाते ग़रीब अपंग।
रोब रुतब्बा रसूख़ शानो वास्ते करते ग़ैरों से रिश्ते,
मज़हब की रोक नहीं जेसे फ़लक के फ़िरश्ते।
कागा शाह गद्दा का ख़ून एक रंग लाल,
मोत के मुंह से बचाने को चढ़ता कमाल।
कोतवाल
चेहरा नहीं चाल बन कौ़म का,
मोहरा नहीं ढाल बन कौम का।
पद मिला है तो क़द बढ़ाना,
दोहरा नहीं ह़ाल बन क़ौम का।
सामान बिकता है स्वाभिमान ईमान नहीं,
स़िहरा नहीं कमाल बन क़ौम का।
ग़ुलामी गै़र की जायज़ नहीं ज़लालत,
पेहरा नहीं जमाल बन क़ौम का।
चापलूसी चाटुकारी कर घूम चरण चूम,
गेहरा नहीं धमाल बन क़ौम का।
ख़ुद ग़र्ज़ नहीं ख़ुदार बन ख़ास़,
अंधेरा नहीं मशाल बन क़ौम का।
जोश जुनून जज़्बा बरकरार रख कागा,
छिछोरा नहीं कोतवाल बन क़ौम का।
दोहरे लोग
दुनिया को ढौंगी लोगों ने बर्बाद कर दिया,
दुनिया को पाखंडी लोगों ने बर्बाद कर दिया।
प्रचन देते मोह माया से दूर रहने का,
दक्षिणा लेते लालची लोगों ने बर्बाद कर दिय
ख़ुद खाते बैंगन लहसन प्याज़ ओरों को मना,
अंध-भक्त झूठे लोगों ने बर्बाद कर दिया।
प्रेम भाई-चारा की देते सीख नियत बद,
घूस ख़ोर घमंडी लोगों ने बर्बाद कर दिया।
साम दाम दंड भेद राजनीति के रंग रूप,
नक़ली बनावटी शिखंडी लोगों ने बर्बाद कर दिया।
मुंह में मीठा नियत नीति में खोट ख़राबी,
ज़ालिम ज़हरीले फ़ुर्तीले लोगों ने बर्बाद कर दिया,
स्वेदेशी अपनाने का नारा देते खोखला ख़ूब कागा,
विदेशी वास्त़ा हठीले लोगों ने बर्बाद कर दिया।
बदनियत
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे,
सांईया बना कोतवाल कौन डांटे।
फ़िज़ा बदली माहोल बिगड़ा बदह़ाल,
बंदर बांट अपनों को बांटे।
नालायक चालाक चाल बाज़ नादान,
रहज़न बिखेरे राह में कांटे।
रहबर बन रुठा मनाते अपना,
टूटे फटे को सिले गांठे।
फूट डाल उल्लू सीधा करो,
जागा मारता सोये जैसे खर्रांटे।
पराई खुशी सहन नहीं कागा,
छेड़ छाड़ कर बुराई छांटे।
निज़ाम
लगता है यह तानाशाही दौर है,
लगता है यह शहनशाही दौर है।
झमूरियत के नाम पर होता झंझट,
क़दम दर क़दम लुटेरे चोर है।
चंदा वस़ूली का धंधा चल रहा,
मास़ूम चेहरा ह़सींन रिश्वत ख़ोर है।
दलाल की दलाली त़य्य शुद्धा मुकमल,
हर बंदा चापलूस चुग़ल ख़ोर है।
मुखोटा बदल जाता हर रोज़ मुख़त्लफ़,
पहचान ख़त्म गली-गली शोर है।
बेख़ोफ़ कोई नहीं ख़ोफ़ ज़दा कागा,
रहबर रह़म दिल नहीं ज़ुल्म ज़ोर है
मानसिकता
मंदी बुद्धि गंदी सोच आगे बढ़ने नहीं देती,
पैरों में पड़ी मोच आगे बढ़ने नहीं देती।
द्वीष ईर्ष्या होती उन्नति देख ओर की निरंतर,
ओछी मन स्थिति वृति आगे बढ़ने नहीं देती।
जलन होती बदचलन बेईमान को नियत में नित,
बनियत नीच नीति रीति आगे बढ़ने नहीं देती।
आदत से मजबूर करते अपने पराये की बुराई,
ज्वाला भभकती दिल में आगे बढ़ने नहीं देती।
करते नोटंकी घड़ियाली आंसू बहाते अपने बार बार,
बदले की बुरी भावना आगे बढ़ने नहीं देती।
शरारत का झूठा शिगूफ़ा छेड़ करते गुमराह कागा,
दांव पेच की दग़ा आगे बढ़ने नहीं देती।
जलन
पराई उन्नति देख जलते हैं लोग,
पराई प्रगति देख जलते हैं लोग।
निक्कमे ख़ुद कुछ करते नहीं काम,
पराई तरक़्क़ी देख जलते हैं लोग।
बराबरी की बजाय करते बुराई बराबर,
पराई हस्ती देख जलते है लोग।
चेहरा मुरझा मायूस उदास काला कलूटा,
पराई मस्ती देख जलते हैं लोग।
अपने घर में कलह क्लेश लड़ाई,
पराई चहकती देख जलते हैं लोग।
नादान की डगमग जाती नाव कागा,
पराई कश्ती देख जलते हैं लोग।
ग़ुलाम
जहां करेंं निगाह वहां नज़र आते गुलाम,
आज़ाद कोई नहीं वहां नज़र आते गुलाम।
कठपुतली की त़रह़ नाचते इशारों पर बेवफ़ा
डोरी पराये हाथ ख़ुद ख़ामोश नफ़सी ग़ुलाम।
बाज़ीगर का बंदर बन करते उछल कूद,
मर्ज़ी नहीं चलती अपनी मायूस मोहताज ग़ुलाम।
ग़म ग़ुस्सा ग़ैरत नहीं लाज शर्म ह़य्या,
पराये टुकड़ों पर पलते बेशऊर बेगैरत ग़ुलाम।
तलवे चाट जल्वे दिखाते कर बल्वा बवाल,
जी-ह़ुज़ूरी जोखा नहीं ख़ुद ग़र्ज़ ग़ुलाम।
मुफ़ाद प्रस्त मवाली शराब कबाब के शोक़ीन,
क़ौम के जानी दुश्मन गुर्रा गर्ज़ते ग़ुलाम।
चुगली चापलूसी चाटुकारी काना-फूसी करते हरदम,
शरारत गिला शिक़ायत करते ग़ैरों से ग़ुलाम।
जूठन खुरचन पर करते गुज़ारा बेक़द्र कागा,
उतरन पहन पौशाक गिरेबान नहीं झांकते गुलाम।
नफ़रत
नफ़रत का ज़हर नहीं घोल मेरे यार,
अ़दावत का ज़हर नहीं घोल मेरे यार।
उलफ़त मोहब्बत की राह पर चल दोस्त,
बग़ावत का ज़हर नहीं घोल मेरे यार।
अमनो अमान का नारा बुलंद कर बंदा,
शरारत का ज़हर नहीं घोल मेरे यार।
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुवारे इबादत के घर,
किराहत का ज़हर नहीं घोल मेरे यार।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध जैन इंसान,
तफ़ावत का ज़हर नहीं घोल मेरे यार।
राम रहीम वाहेगुरू गाड़ बुद्ध महावीर एक,
ह़िकारत का ज़हर नहीं घोल मेरे यार।
ऊंच नीच छूआ छूत भेद-भाव कागा,
ख़िलाफ़त का ज़हर नहीं घोल मेरे यार।
पंजूमल गंढेर
ढाटी मेघवाल समाज में एक अकेला शेर,
गंव दूंबाला में अमरा घर पंजूमल गंढेर।
बीडी मेम्बर निर्वाचित हुआ सामान्य सीट पर,
मुखी मेंहतर महान अगूआ दबंग दाना दलेर।
इक्हत्तर की लड़ाई में पलायन कर आया,
शरणार्थी बन आलमसर में रहा ज़िला बाड़मेर।
लक्ष्मण सिंह सोढा के साथ सच्चा सिपाही,
नेतृत्व किया नियत से नहीं हेर फेर।
भारतीय नागरिकता पुनर्वास की पेहल की ज़ोरदार,
जयपुर दिल्ली का दौरा हरदम बसाया बीकानेर।
स्वंय निरक्षर था मगर ह़ोस़ला बड़ा चमत्कारी,
तरूण को बनाया सहयोगी नहीं लगाई देर।
बसने वास्ते़ जालोर जाकर जूंझारानी जोड़ देखा
नागोर देखा भटक लटक कर रामगढ़ जैसलमेर।
गंगानगर छतरगढ़ घड़साना अनूपगढ सूरतगढ़ विजयनगर देखा,
पूगल कोलायत बज्जू छान मारा इंदिरा नेहर।
दोंनों दोड़े किया ख़ून पसीन एक कागा,
मिली सफलता श्रेय लेने वाला पंजूमल गंढेर।
तिरंगा
हर घर तिरंगा लहराये आन हमारी,
हर घर तिरंगा लहराये बान हमारी।
पंद्रह अगस्त आज़ादी का जशन महान,
हर घर तिरंगा लहराये शान हमारी।
हर लब्ब पर गुनगुना रहा तराना,
हर घर तिरंगा लहराये गान हमारी।
आज़ादी के परवानों को करें याद,
हर घर तिरंगा लहराये जान हमारी।
गोरों की ग़ुलामी से मिली निजात,
हर घर तिरंगा लहराये कमान हमारी।
शहीदों को करें सलाम झुक कागा,
हर घर तिरंगा लहराये तान हमारी।
पश्चाताप
पश्चाताप कर आत्मा से पाप धुल जायेंगे,
आत्मसात कर आत्मा से पाप धुल जायेंगे।
पग पग पर पाप किये अनगिनत अपार,
पश्चाताप कर क़िस्मत के कपाट खुल जायेंगे।
तन मन वचन से किये तीन पाप,
पश्चाताप कर मन से घात घुल जायेंगे।
जीवन में किया कुकर्म कलह क्लेश कागा,
पश्चाताप कर चित्त से श्राप भूल जायेंगे।
गुनहगार
गुनहगार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना,
त़लबगार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
ज़िंदगी में क़दम दर क़दम ग़ाफ़िल,
अ़र्ज़दार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
बाग़ी बन बग़ावत की बार-बार,
क़र्ज़दार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
दाग़ी बन दग़ा की हर रोज़,
दाग़दार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
भलाई के बदले बुराई की हमेशा,
एबदार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
पछता रहा हूं अपनी ग़ल्त़ी पर,
ह़क़दार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
अनाड़ी बन बच्चपन में बचकानी की,
मज़ेदार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
जवानी में जोश जुनून में ज़लील,
ईमानदार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
जाने अंजाने में दर्द दिया होगा,
जानदार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
इंसान ख़त़ा का ख़ज़ाना मस्त दीवाना,
शानदार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
ज़िंदगी झूठ का पुलंदा मौत सच्चाई,
वफ़ादार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना
गिनती नहीं गुनाहों की बेह़द बेशुमार,
ज़िम्मेदार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
अपने पराये का तफ़ावत रखा कागा,
किरदार हूं मेरा गुनाह माफ़ करना।
ह़क़दार
जल जंगल जमीन पर ह़क़ हमारा,
खेत खलिहान ज़मीन पर ह़क़ हमारा।
हम किसान कामगार करते कड़ी मेहनत,
जीना बड़ा मुश्किल पर ह़क़ हमारा।
तपती दुपहरी पसीने में तर-बतर
हल चलाते हरदम पर ह़क़ हमारा।
अनाज पैदा करते खेतों में फ़स़ल,
बाग़ बग़ीचों चमन पर ह़क़ हमारा।
फल फ़ूल मेवा गुल गुलज़ार गनीमत,
मुल्क की तरक़्क़ी पर ह़क़ हमारा।
सीमा की सुरक्षा पर तेयनात जवान,
प्रहरी पेहलवान वत़न पर ह़क़ हमारा।
जय जवान जय किसान जय विज्ञान,
जय संविधान स्वाभिमान पर ह़क़ हमारा।
ऊंच नीच भेद-भाव गैर-बराबरी,
सत्ता संगठन सिंहासन पर ह़क़ हमारा।
छीना-झपटी चल रही सीना ज़ोरी,
मतदान ईमान अरमान पर ह़क़ हमारा।
ह़क़दार ख़ुदार दारो-मदार हम कागा,
चहल-कदमी चीज़ पर ह़क़ हमारा।
बाज़मीर
बाज़मीर बने रहे ज़मीर बेचा नहीं,
बाशऊर बने रहे ज़मीर बेचा नहीं।
ग़ैरत गिरवी नहीं लालची लपेट में,
बावक़ार बने रहे ज़मीर बेचा नहीं।
शेरों से दोस्ती गीदड़ों से गुरेज़,
बावफ़ा बने रहे ज़मीर बेचा नहीं।
ज़लील करने की कोशिश हुई भरपूर,
बाइज़्ज़त बने रहे ज़मीर बेचा नहीं।
राह़ रोकी बिछाये गये कांटे कंकर,
बाअदब बने रहे ज़मीर बेचा नहीं।
झूठी तोहमतें मढ़ी सिर पर मेरे,
बाआबरू बने रहे ज़मीर बेचा नहीं।
काजल की कोठड़ी में बेदाग़ कागा,
बामुराद बने रहे ज़मीर बेचा नहीं।
आतंक
हींग लगी नहीं फिटकड़ी रंग चोखा,
नियत में खोट देते धर्म धोखा।
मगरमच्छ के आंसू बहाते छलक कर,
करते शिकार अपना मिल जाये मौक़ा।
बगुला भक्ति शक्ति आंखें मूंद बेठे,
गटक लेते मछलियां नहीं कोई रोका ।
मोर नाचे मस्ती में पंख रंगीन,
पकड़ खाये सांप खेल बड़ा अनोखा।
ग़रीब की झुग्गी-बस्तियों में सन्नाटा।
ऊंचा मह़ल मीनार अमीर का झरोखा।
ज़ालिम करता ज़ोर ज़ुल्म सित्म कागा,
ग़रीब की हाय करती लेखा जोखा।
भेद-भाव
जन्म जात से कोई महान नहीं होता,
जात पात से कोई महान नहीं होता।
श्रम करने से खुलते कर्म के कपाट,
पीढ़ी दर पीढ़ी कोई महान नहीं होता।
होते शूरवीर सपूत कपूत हर वर्ग में ,
रंग रूप से कोई महान नहीं होता।
होती नहीं हाथ की पांच उंगलियां समान,
स़ूर्त मूर्त से कोई महान नहीं होता।
कीड़ी को कण हाथी को मण ख़ोराक,
लघु भारी भरकम कोई महान नहीं होता।
चौच को चुग्गा अजगर को भरपेट भोजन,
उड़ने रेंगने पर कोई महान नहीं होता।
आभा मंडल में चमकते तारे नव ग्रह,
बिना ग्रह गोचर कोई महान नहीं होता।
चांद सूरज को लग जाता ग्रहण कागा,
बिना बुलंद सितारा कोई महान नहीं होता।
बनावटी
रिश्ता नाता दुनिया में होता सब फ़र्ज़ी,
अपना पराया दुनिया में होता सब फ़र्ज़ी।
लालच में लुढ़कते जैसे बिना पैंदे बर्तन,
लहु बहता रगों में लाल ख़ुद ग़र्ज़ी।
सच्च सहन नहीं होता झूठ में मस्त,
आंखों में अ़श्क़ करते अपनी मन मर्ज़ी।
बेह़य्या बन जाते अपने मत़लब वास्त़े मग़रूर,
अनसुनी कर देते ग़रीब की फ़रियाद अर्ज़ी।
वालदीन से बेरुख़ी तल्ख़ मिज़ाज बेवफ़ा बंदे,
करते तकरार बात-बात पर कायर क़र्ज़ी।
ख़ानदान का ख़्याल नहीं कुटंब का कागा,
बेनस्ल अस़ल बनते कभी चटर्जी मुखर्जी बनर्जी।
गपशप
नेता चाहते गद्दी जनता मांगे रोज़ी रोटी,
अमीर चाहते पदवी ग़रीब मांगे रोज़ी रोटी।
किसान चीख रहा वाजिब दाम नहीं मिलता,
फ़स़ल पैदा करे बहाये पसीना एड़ी चोटी।
कामगार को काम मज़दूरी नहीं मिलती माक़ूल,
बच्चे मरते भूख सुननी पड़ती खरी खोटी।
बेरोज़गार भटक खाते दर दर की ठोकरें,
मिलती नहीं नोकरी कोई बड़ी चाहे छोटी।
नंगा तन बदन पैरों में पैजार नहीं,
टूटी फटी चूनडी़ लहंगा महंगा नहीं लंगोटी।
सुनता नहीं कोई पुकार ग़रीब की कागा,
करते झूठे वादे डींग हांकते मोटी-मोटी।
भक्ति
ईश भक्ति कर मन शांति मिलेगी,
देश भक्ति कर सुख शांति मिलेगी।
कर आये क़ौल भूल मत भैया,
जन सेवा कर मन शांति मिलेंगी।
माता पिता बहिन भाई रिश्ते नाते,
परिजन जतन कर मन शांति मिलेगी।
अड़ोस-पड़ोस ग़रीब ग़ुरब्बा यतीम अपाहज,
मिल मदद कर मन शांति मिलेगी।
अपने पराये निकट दूर मित्र शत्रु,
समाज सेवक बन मन शांति मिलेगी।
अपने मत़लब वास्त़े धोखा नहीं कागा,
सदेव संरक्षक बन मन शांति मिलेगी।
मोबाइल
आज कल सब लोग मोबाइल में व्यस्त हैं,
युवा बुज़ुर्ग योग्य अयोग्य मोबाइल में व्यस्त हैं।
कैसा दौर आया दुनिया हो गई मुठ्ठी में,
दूरी हो गई दूर मोबाइल में मस्त हैं ।
नये नये एप आये इंटरनेट तकनीकी त़ोर त़रीक़ा,
राजनीति कूटनीति दांव पैच मोबाइल में दुरस्त है।
आपस में संवाद करने का ज़रा समय नहीं,
सूरज उगता ज़रूर है मोबाइल में अस्त है।
जाग सारी रात करवटें बदलते नींद नहीं आती,
चाल चहरा चुस्त-दुरुस्त मोबाइल में सुस्त है।
दोनों गुण अवगुण जैसा हाव-भाव होता कागा,
कोई उग्र कोई विनम्र मोबाइल में तटस्थ हैं।
मददगार
मददगार साबित होना धोखा नही देना,
यादगार साबित होना धोखा नहीं देना।
दुनिया दगा़ बाज़ क़दम दर क़दम,
जानदार साबित होना धोखा नहीं देना।
उल्लू उजाड़ देता सर सब्ज़ बाग़,
शानदार साबित होना धोखा नहीं देना।
हंस चुगता मोती बगुला गटके मछलियां,
दमदार साबित होना धोखा नहीं देना।
मिलावट नहीं करना अपने कारोबार में,
ईमानदार साबित होना धोखा नहीं देना।
झूठा झांसा देकर कपट नहीं कागा,
वफ़ादार साबित होना धोखा नहीं देना।
किसान
किसान वत़न की जान क़द्र कर,
किसान मुल्क की शान क़द्र कर।
किसान करता ख़ून पसीने की कमाई,
किसान मुल्क की पहचान क़द्र कर।
करता अनाज पैदा मह़नत मश्क़त कर,
किसान मुल्क की मुस्कान क़द्र कर।
सर्दी गर्मी आंधी त़ूफ़ान बारिश में,
किसान मुल्क की उड़ान क़द्र कर।
मिट्टी से लथपथ बदन पर चीत्थड़े,
किसान मुल्क की मचान क़द्र कर।
खेत खलिहान घर में खु़श कागा,
किसान मुल्क की कमान क़द्र कर।
दिया
दिया तले अंधेरा दिया अनजान,
दिया देता रोशनी दिया अनजान।
दिया मिट्टी सोने चांदी का,
कैसा क़िस्म पहचान दिया अनजान।
दिये के साथी तेल बाती,
दिया जलाये जान दिया अनजान।
दिया की दुश्मनी अंधेरे से,
हवा फ़ालतू परेशान दिया अनजान।
दिया जल कर देता उजाला,
मुकम्मल अधूरे अरमान दिया अनजान।
दिया बुझा देते सुबह होते,
फूंक का फ़रमान दिया अनजान।
दिया का जलता जिस्म दिल,
कागा बन क़ुर्बान दिया अनजान।
मंदिर
आस्था के मंदिर में घंटा बजे,
शिक्षा के मंदिर में घंटी बजे।
पाठ पूजा करता पूजारी आरती अर्चना,
मूर्ति सज थज कर श्रृंगार अर्चना।
प्रवेश करते बुढ्ढे बुज़ुर्ग नर नारी,
मन्नत मांगते मन मानी नर नारी।
कुमकुम चंदन टीका लगाते अपने भाल,
दान पेटी में दक्षिणा आरती थाल।
शिक्षा मंदिर जाते नन्हे मुन्हे बच्चे,
ज्ञान अर्जित करते मन के सच्चे।
दोनों हाथ जोड़ करते प्रार्थना पावन,
प्राप्त होता फल शीघ्र मन भावन।
कागा भारी भरकम झोला कंधों पर,
भविष्य भार मुलक का कंधों पर।
जन्म-भूमि
बहिनों की इज़्ज़त वास्ते़ जन्म भूमि छोड़ दी,
बेटियों की अस्मत वास्ते कर्म भूमि छोड़ दी।
बेग़ैरत बन अपना स्वाभिमान नहीं बेचा बेशर्म होकर,
औरतों की आबरू वास्ते पृष्ठ भूमि छोड़ दी।
ग़रीबों में ग़ैरत का भंडार लाज ह़य्या का,
पड़ोस की प्रीत वास्ते मरू भूमि छोड़ दी।
पीढ़ियों से परिजन रहे साथ मिल जुल कर,
गांव की ग्वाड़ी वास्ते खेती भूमि छोड़ दी।
भाई-चारा छिन्न-भिन्न नहीं किया लालच में,
संस्कृति की रक्षा वास्त़े गौचर भूमि छोड़ दी।
मुहाजर बनना मंज़ूर हमें बेग़ैरत बनना क़बूल नहीं,
सम्मान की जीवनी वास्ते मातृ भूमि छोड़ दी।
ऊंच नीच भेद भाव छूआ-छूत नहीं कागा,
समाज की पीड़ा वास्ते ख़ानदानी भूमि छोड़ दी।
जैसा-तैसा
शासन प्रशासन में अनुशासन आवश्क,
आसन सिंहासन में अनुशासन आवश्क।
जैसा राजा वेसी प्रजा परम्परा,
जैसा अन्न वेसा मन परम्परा।
जैसा बीज वैसा फल स्वाद,
जैसा घाव वैसा निकले मवाद।
जैसा भाव वैसी भावना कामना,
जैसी नियत वैसी मुराद तमना।
जैसी जलवायु वैसी आयु अनुमान,
जैसा वातावरण वैसा आचरण अनुमान।
कागा जैसा खेत वैसा खलियान,
जैसा किसान वैसा उपजे धान।
बदनाम
बद से बदनाम बुरा करता बुराई,
रख बग़ल में छुरा करता बुराई।
बाहर में मिठास अंदर में खटास,
नियत नीति में खोट करता बुराई।
ईर्ष्या की आग में झुलस कर,
बेवजह जल कर हरदम करता बुराई।
चित्त चापलूस मन मायूस मक्खी चूस,
कड़वा बोल कंजूस मनह़ूस़ करता बुराई।
ईर्ष्यालू आदत दिल से दयालू नहीं,
गिला शिकवा में बेग़ैरत करता बुराई।
पद क़द का क़द्र नहीं कागा,
उछल कूद में अगूवा करता बुराई।
पाश्चात्य-संस्कृति
गर्ल फ़्रेंड ब्याय फ़्रेंड कैसा रिश्ता नाता,
लिव रिलेशन-शिप का कैसा रिश्ता नाता।
पाश्चात्य संस्क्रति ने प्राचीन परम्परा बिगाड़ दी,
मिठास मिटी ख़टास आई परम्परा बिगाड़ दी।
माता-पिता का संस्कार सभ्यता लाज नहीं,
परिवार परिपाटी का प्रेम भाव लाज नहीं।
सहपाठी संग साथी से बनाते अंतरंग सम्बंध,
करते मन-मर्जी से लव मेरेज प्रबंध।
नाक कटवा देते कुटंब का ख़ान-दानी,
घटिया सोच मटिया-मेट करती नोच नादानी।
लड़कियां लुढ़क जाती प्रेम जाल में फंस,
पहनती तंग वस्त्र दल-दल में धंस।
इश्क़ बुरी बला नहीं देखे जात पात,
भूख बुरी बला नहीं देखे जूठन भात।
जाहिल अनपढ़ अल्हड़ भाग करते प्रेम विवाह,
कागा करो कंटरोल वरना समाज होगा तबाह़।
शराब-बंदी
शराब पर लगा पाबंदी शिक्षा पर नहीं,
शराब ख़राब लगा पाबंदी शिक्षा पर नहीं।
ग़रीबों की बस्तियो में खुलते दारू दुकान,
स्कूल बंद हो रहे खुलते दारू दुकान।
सरकारी स्कलों में पढ़ते ग़रीबों के बच्चे,
शिक्षा से वंचित होते ग़रीबों के बच्चे।
ग़रीबी में गीला आटा महंगाई की मार,
शराब मिले सस्ती ग़रीब बस्ती में बेशुमार।
ग़रीबों की गलियों में हर मोड़ पर,
मिलती हथकढ़ी देशी दारू हर मोड़ पर।
मुफ़्त शिक्षा दीक्षा मिले ग़रीब बच्चों को,
खान-पान निशुल्क मिले ग़रीब बच्चों को।
कागा बिना शराब बंदी कल्याण बड़ा मुश्किल,
ग़रीबों को गोद ले सरकार वरना मुश्किल।
दास्तां
ग़रीब की गाथा कोई नहीं सुनता,
वंचित की व्यथा कोइ नहीं सुनता।
कपास ठोंस रखा है कानों में,
शोषित की कथा कोई नहीं सुनता।
आह ग़रीबी क़हर ख़ुदाई ज़ुल्म सित्म,
पीड़ित की प्रथा कोई नहीं सुनता।
बड़ी मछलियां निगल लेती छोटी को,
दब्बू की दास्तां कोई नहीं सुनता।
हंस मरते गाता मोर नाचते रोता,
अंदर की आपदा कोई नहीं सुनता।
सगा नहीं कोई जग में कागा,
निर्बल की नम्रता कोई नहीं सुनता।
ग़रीबी
ग़रीब की हाय बुरी तबाह कर देगी,
ग़रीब की बददुआ बुरी तबाह कर देगी।
आशियाना नहीं उजाड़ बर्बाद कर बस्ती को,
ग़रीब की आह बुरी तबाह कर देगी।
झौंपड़ी जला दी आग से बनाई राख,
ग़रीब की नज़र बुरी तबाह कर देगी।
तिनका तोड़ मरोड़ चुन बनाया अपना घरोंदा,
ग़रीब की ग़रीबी बुरी तबाह कर देगी।
छिन्न-भिन्न किया छपरा घास फूस का,
ग़रीब की गिड़गिड़ाहट बुरी तबाह कर देगी।
सिसकती बिलखती चीख़ें सुनता नहीं कोई कागा,
ग़रीब की गुहार बुरी तबाह कर देगी।
परम्परा
भूमि जन्म भूमि कर्म भूमि,
रीति नीति रस्मो-रिवाज पावन भूमि।
प्राचीन परिधान पोतड़ा लंगोटी धोती अंगरखी,
खड़ाऊ लकड़ी निर्मित पग चमड़ी पगरखी।
कुर्ता पायजामा शेरवानी मुग़लों की पोशाक,
सूट बूट टाई अंग्रेज़ों की पोशाक।
सोगरा राबड़ी दूध दही देशी खानपान,
सांगरी चापटिया केरिया काचर देशी खानपान।
बर्गर पिज़्ज़ा चिकन बरियानी कोरमा विदेशी,
लपसी शीरा भात बिसलाण भोजन स्वदेशी।
माता पिता को मम्मी पापा पुकारते,
अन्य रिश्तेदारों को अंकल आंटी पुकारते।
बहिन भाई का रिश्ता नाता टूटा,
ब्याय गर्ल फ़्रेंड का झमेला झूठा।
स्वेदेशी अपनाओ भारत बचाओ नारा खोखला,
असली नक़ली का भेद भाव खोखला।
जाति-बंधन का खेला ख़ूब खेलते,
धर्म मज़हब का धंधा झंझट झेलते।
कागा मोहब्बत नफ़रत का बोल-बाला,
रहता हमेशा बग़ावत का बोल-बाला।
लोहा
सौ सुनार की एक लोहार की,
चोट हथोड़ा की एक लोहार की।
लाल होता लोहा तपती भट्टी में,
गर्म होता लोहा भभकती भट्टी में।
नीचे घण बीच लोहा ऊपर हथोड़ा,
उठती चिगारियां चमक पड़ती चोट हथोड़ा।
सैंकड़ों चोटें लगती धीमी सोन पर,
आंच अग्नि लगती धीमी सोन पर।
अपनों की चोट बड़ी दर्द भरी,
सहन से बाहर बेह़द दर्द भरी।
कागा सोन बेश-क़ीमती बनते ज़ेवर,
लोह से खंजर बदल देते तेवर।
बदनाम
बुलंद बनने की बिस़ात़ नहीं करते बदनाम,
ऊंचा उड़ने की ओक़ात नहीं करते बदनाम।
बराबरी करने की हिम्मत नहीं करते बुराई,
ख़ुदार बनने की ख़ासि़यत नहीं करते बदनाम।
कम्मियां खोजते हर काम में निकम्मे नाकाम,
बुर्दबार बनने की ह़ेसि़यत नहीं करते बदनाम।
करते टांग खिंचाई हरदम क़दम दर क़दम,
दमदार बनने की वसियत नहीं करते बदनाम।
तलवे चाटने की फ़ित़रत अस़ल नस्ल से,
शानदार बनने की शहोर्त नहीं करते बदनाम।
गैर की गौद में गुर्राते बेग़ैरत बन,
जानदार बनने की जुरियत नहीं करते बदनाम
ख़ुद में ख़ूबी नहीं पराये भरोसे पर,
ईमानदार बनने की आदत नहीं करते बदनाम।
नियत नीति में खोट देते चोट कागा,
वफ़ादार बनने की फ़ुर्स़त नहीं करते बदनाम।
लाल बनाम दलाल
हर समाज में लाल होते है,
हर समाज में दलाल होते है।
लाल करते नाम रोशन क़ौम का,
दलाल करते बंटा-धार क़ौम का।
आंच नहीं आने देते अपनों पर,
खुद चोट खाते बलिदान अपनों पर।
गूदड़ी के लाल आंखों के तारे,
लाल लाडले होते दिल के दुलारे।
दलाल दोगले मिल जुल दुश्मन से,
करते चुग़ली गिला शिकवा दुश्मन से।
दलाल करते ह़लाल गर्दन अपनों की,
करते गति दुर्गति संजोये सपनों की।
कागा कर पहचान अमाजिक तत्वों की,
आस्तीन के सांप सामाजिक तत्वों की।
सनातन
सत्य थर्म सनातन आदि-काल से,
ओह्म-सोह्म निरंजन आदि-काल से।
काम अर्थ धर्म मोक्ष चार चरण,
निर्गुण सगुण निरंजन आदि-काल से।
रूप रस गंध शब्द स्पर्श माया,
आस्तिक नास्तिक निरंजन आदि-काल से।
अग्न गगन जल थल पवन तत्व,
ऊषण शीतल निरंजन आदि-काल से।
पांच कर्म इंद्रियां पांच ज्ञान इंद्रियां,
पाप पुण्य निरंजन आदि-काल से।
मन बुद्धि चित्त अहंकार शुद्ध आचरण,
सत्य-असत्य निरंजन आदि-काल से।
काम क्रोद्ध लोह मोह अभिमान कागा,
अनुभूति विभूति निरंजन आदि-काल से।
मानव
सनातन में परम्परा गत वर्ण व्यवस्था,
ब्रह्मण क्षत्रीय वैश्य शूद्र वर्ण व्यवस्था।
हर वर्ण में जाति मकड़ जाल,
ऊंच नीच भेद भाव जाति जंजाल।
मानव प्रकृति आकृति प्रवृति सर्व समान,
हर पल बदल जाता वर्ण अनजान।
मेल मल मूत्र धोते अपने हाथ,
अगड़ा पिछड़ा अछूत दायां बायां हाथ।
बाला-शाही धोबी नाई वाला काम,
घ्रणा नहीं करता स्वंय सुबह शाम।
संतान को कराती माता अपना स्तनपान,
मेला स़ाफ़ उन हाथों खान-पान।
मुख ब्रह्मण भुजा क्षत्री उदर वैश्य,
चरण शूद्र वर्ण छुपा गुप्त रहस्य।
चरण धोना पड़ता अपने हाथों से,
नहीं कोई निराला एसी बातों से।
चार वर्ण परस्पर आपस में पूरक,
गूंथे गहरे ताना बाना मूढ़ मूर्ख।
मानव हाड मांस रक्त का पुतला,
मानव प्राणी एक मिट्टी का पुतला।
कागा आकार प्रकार अंतर भिन्न-भिन्न,
मानव ने किया सारा छिन्न-भिन्न।
सियास्त
सियास्त में कैसा त़ूफ़ान आ गया,
रियास्त में कैसा उफ़ान आ गया।
ठहरे पानी में पत्थर फेंका किसने,
सोए ज़मीर में केसा अरमान आ गया।
उठा-पटक चल रही मची ग़दर,
बेईमान में कैसा ईमान आ गया।
ख़ुद ग़र्ज़ ख़ामोश ख़त़रा नहीं ख़ोफ़,
मह़फ़िल में केसा मेज़बान आ गया।
मालिक महरबान गधा पेहलवान ख़ुश ख़ोरम,
अंजुमन में केसा इंसान आ गया।
रोब रुतब्बा रसूख़ शानो शोक़्त कागा,
मजलिस में केसा फ़रमान आ गया।
सत्य-असत्य
असत्य से होती आत्म गिलानी सत्य बोल,
असत्य पतन की सत्य निशानी सत्य बोल।
सत्य असत्य का अंतर्द्वंद परम्परा गत परिपाटी,
असत्य से होती आत्म हानी सत्य बोल।
गुप्त-चर करते गपशप जान-बूझ कर,
असत्य से होती आत्म अज्ञानी सत्य बोल।
सत्य की पतवार डोलती डूबती नहीं मंझधार,
असत्य से होती आत्म अभिमानी सत्य बोल।
मृग नाभि बसे कस्तूरी सूंघे बन घास,
असत्य से होती आत्म अनजानी सत्य बोल।
सत्य की होती अग्नि परीक्षा भभकती भट्टी,
असत्य से होती आत्म नादानी सत्य बोल।
असत्य से रावण का अंत हुआ कागा,
असत्य से होती आत्म परेशानी सत्य बोल।
विचार-धारा
विचार धारा अमृत धार हर समस्या का ह़ल,
सादा जीवन उच्च विचार हर समस्या का ह़ल।
हर खोपड़ी की मत न्यारी शुद्ध भावना प्यारी,
आचार विचार व्यवहार झोल हर समस्या का ह़ल।
मानव जीवन में सोच विचार का महत्व महान,
मधुर बोल मुख खोल हर समस्या का ह़ल।
तन मन वचन पाप पुण्य का पूर्ण पिटारा,
एक तराज़ू नहीं तोल हर समस्या का ह़ल।
संस्कार सभ्यता राम बाण औषधि हर व्याधि की,
घ्रणा विष नहीं घोल हर समस्या का ह़ल
चाल चेहरा चित्त चित्र चरित्र पवित्र रख कागा,
दुनिया दारी गोल मटोल हर समस्या का ह़ल।
विचार
विचार शक्ति विचार भक्ति विचार वंदना,
विचार युक्ति विचार पंक्ति विचार वंदना।
बिना विचार सफल नहीं होते कार्य,
विचार आकृति विचार संस्कृति विचार वंदना।
शुद्ध आहार विहार उच्च उत्तम व्यवहार,
विचार प्रकृति विचार सम्पत्ति विचार वंदना।
मानव आया जग में अकेला अलबेला,
विचार विपत्ति विचार प्रवृति विचार वंदना।
शून्य से शिखर तक व्यक्ति विशेष,
विचार विनती विचार स्तुति विचार वंदना।
बिना शिक्षा पूंछ विहीन पशु मानव,
विचार मुक्ति विचार शांति विचार वंदना।
सोच विचार सिक्के के दो पहलू,
विचार अवनति विचार उन्नति विचार वंदना।
विचार से बढ़ता ऊंचा मनोबल कागा,
विचार हस्ती विचार मस्ती विचार वंदना।
नूरा कुश्ती
राजनीति में उफान आया हुआ है,
कूटनीति में उबाल आया हुआ है।
हवा बदल चुकी उथल पुथल मची,
भक्ति में भूचाल आया हुआ है।
मानव दानव बना रिश्ता नाता टूटा,
शक्ति में उछाल आया हुआ है।
अपने पराये हो गये मन मलीन,
व्यक्ति में वाचाल आया हुआ है।
नियत नीति नियति में अंतर आया,
शांति में बवाल आया हुआ है।
भाई-चारा छिन्न-भिन्न बिखर गया,
मस्ती में मलाल आया हुआ है।
पिंजरे में क़ेद त़ोत़े उड़ गये,
बस्ती में दलाल आया हुआ है।
बिना वजह करते नूरा कुश्ती कागा,
कश्ती में कंगाल आया हुआ है।
आज़ादी
अंग्रेज़ सरकार भागी जनता जागी मिली आज़ादी,
बांध बिस्तर भागी जनता जागी मिली आज़ादी।
बिच हूण चंगेज़ मुग़ल बने बेताज बादशाह,
नींद में सोई जनता जागी मिली आज़ादी।
गौरी गोरे ग़ज़नवी अजनबी बने शाही सुल्त़ान,
लूटा लुटेरों ने जनता जागी मिली आज़ादी।
ज़ुल्म सित्म ढाते ख़ामोश बन सहते रहे,
जाति बंदर बांट जनता जागी मिली आज़ादी।
धर्म मज़हब का झगड़ा अगड़ा पिछड़ा अछूत,
मंदिर तोड़े फोड़े जनता जागी मिली आज़ादी।
छूआ-छूत भेद भाव ऊंच नीच नफ़रत,
बेईमान बोल बाला जनता जागी मिली आज़ादी।
मातादीन ने आंखें खोली राज़ कारतूस का,
सूअर गाय चर्बी जनता जागी मिली आज़ादी।
चंद्रशेखर भगतसिंह राजगुरू बने आज़ादी के अगुआ,
सुभाष चंद्र बोश जनता जागी मिली आज़ादी।
मंगल पांडे ने मारी गोली कप्तान को,
सुलगी आग चिंगारी जानता जागी मिली आज़ादी।
अम्बेडकर ने अलख जगाई बराबरी की कागा,
गांधी बना सहारा जनता जागी मिली आज़ादी।
रक्षा-बंधन
बहिन भाई का पावन पर्व रक्षा बंधन,
भाई बहिन का सावन पर्व रक्षा बंधन।
एक कोख में उत्पन्न हुए बहिन भैया,
एक आंगन पर खेले साथ बहिन भैया।
मां बाप के दुलारे आंखों के तारे,
दोनों दीपक बन जले घर में उजियारे।
परम्परा प्राचीन बहिन भाई का अटूट रिश्ता,
भैया करता बहिना की सुरक्षा बन फ़िरश्ता।
वर्षा ऋतु श्रावण मास रिमझिम बरसे फूहार,
बिजली की चमक दमक बरसे मेघ मल्हार।
आम्बे की डाली बांधा झूला झुलाये भैया,
आंखों में ऊजास संग सहेलियां मुस्काये मैया।
पापा की परी मां की ममता महान,
भाई की मुंह बोली बहिन चुलबुली महान।
पूनम को सज थज थाम हाथ थाली,
कुम कुम अक्षित राखी श्रीफल धर थाली।
भाई की कलाई में बांधी राखी डोर,
नाच उठा पंख फेला कर अंतर्मन मोर।
कागा रक्षा बंधन जेसा ओर नहीं पर्व,
जिस पर करे जीजल जन्मी गौर्व गर्व।
राखड़ी पूनम
बधाई आया शुभ दिन रक्षा बंधन,
वंदन आया शुभ दिन रक्षा बंधन।
बहिन भाई का रिश्ता नाता निर्मल।
चंदन चुनड़ी शुभ दिन रक्षा बंधन।
राखी बंधी भाई कलाई पर सुंदर,
कुंदन जड़ी शुभ दिन रक्षा बंधन।
मोतियों पिरोई ममता भरी माणक मणी,
कंचन मढ़ी शुभ दिन रक्षा बंधन।
भाई देता भेंट भावना भरा उपहार,
कंगन कड़ी शुभ दिन रक्षा बंधन।
पूनम दिन राखड़ी बांधी पावन सावन,
धन घड़ी शुभ दिन रक्षा बंधन।
बहिना देती दिल से दुआ कागा,
गुंजन बड़ी शुभ दिन रक्षा बंधन।
मोह़ब्बत -नफ़रत
मोहब्बत की बज़ार में उलफ़त की ख़ुशबू आती है,
नफ़रत की बज़ार में बग़ावत की बदबू आती है।
ऊंची दुकान मीठे पकवान चेहरे पर चहक मुस्कान,
ग्राहक ग़रीब बद-गुमान ग़ज़ब ख़ुशबू आती है।
हलवाई ह़ेरान बनाये बूंदी के लड्डू जलेबी लाजवाब,
गुलाब जामुन बर्फ़ी रसगुल्ला सुंदर ख़ुशबू आती है।
मोहब्बती दुकान पर नफ़रत का नामो-निशान नहीं,
खिले रंग बरंगी फूल चमन ख़ुशबू आती है।
कली पर तितली गुलों पर भंवरों की गूंज,
कांटों बीच गुलाब महका इत़र ख़ुशबू आती है।
नफ़रत की दुकान पर बिकता गौश्त सरे आम,
कसाई करता क़तल बकरा मुर्ग़ा बदबू आती है।
मछली मिलती मछुआरे के पास हर क़िस्म की,
नाक पकड़ गुज़रना पड़ता पास बदबू आती है।
मोह़ब्बत में वाह-वाह नफ़रत में थूथू कागा,
कर फ़ेस़ला क़ाज़ी अ़दल इंसाफ़ बदबू आती है।
जनहित
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में,
निजहित के कारण निजी हाथों में।
शिक्षा दीक्षा जनता का मौलिक अधीकार,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
चिकित्सा स्वास्थ्य जीवन में प्रथम पीड़ा,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
बिजली पानी बिना जीना जटिल दुर्भर,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
पथ परिवहन आम जन का साधन,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
रोटी कपड़ा मकान मानव की ज़रूरत,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
कर लगान अमीर ग़रीब दोनों पर,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
झुग्गी झौंपड़ी पर चलते बुल-डोज़र,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
खेत खलियान में करता किसान मेह़नत,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
जनमत बहुमत का करो क़द्र कागा,
जनहित मत सौंपो निजी हाथों में।
ओक़ात
आदमी की क्या ओक़ात वक़्त बड़ा बादशाह,
आदमी की क्या बिसात़ वक़्त बड़ा बादशाह।
इंसान दुश्मन इंसान का ओर नहीं कोई,
करता पैदा जाति की दरार ओर नहीं कोई।
धर्म मज़हब का धंधा करता बिना दोलत,
चंदा बटोरता मन चाहा मिलती शान शहोरत।
ढौंग पाखंड करता प्रचंड घमंड लूट खसोट,
जह्नुम जन्नत का ख़ोफ़ करता गहरी चोट।
कोई काली कंबली वाला क़लंदर अघोरी बाबा,
कोई भगवा-धारी निरंकारी जटाधारी ब्रह्मचारी बाबा।
राजा रानी वज़ीर शाह गद्दा पीर फ़क़ीर,
गूदड़ी का लाल छुपा रुस्तम अमीर ह़क़ीर।
निजोमी बन करता वादा अमीर बनने का,
बदले में मांगता नज़राना बाज़मीर बनने का।
हाथों की लकीरें देख बता देता मुक़दर,
ख़ुद रहता फ़ुट पाथ पर बड़ा बेक़द्र।
सियास्त का सोदागर बन करता गुंडा गर्दी,
वोटो की तजारत में दलाली आवारा गर्दी।
रहबर बन करता अदा रहज़न का किरदार,
बेच देता वत़न औने-पूने भाव ग़द्दार।
संत महात्मा ओलिया की दुनिया में भरमार,
करते नहीं दिखावट मिलावट सजावट बनावट भरमार।
इबादत बंदगी में दुनिया-दारी से दूर,
रहते मद मस्त रंग-दारी से दूर।
कागा कर पहचान परख नक़ाब -पौशों की,
मुखोटों में छुपे छुटभैया सफेद पौशों की।
बुज़ुर्ग
उम्र गुज़र चुकी चंद रोज़ बक़ाया है,
आयु बीत चुकी कुछ योम बक़ाया है।
सांसें चलती घट भीतर दिन रात निरंतर,
रक्त प्रवाह चलती धारा नसों में निरंतर।
नैनों में तेज कम दृष्टि हुई हीन,
कानों में झन-झन स्वर सुनते हीन।
चरणों से चलना कठिन क़दम दर क़दम,
चुभन होती डग मग जाते हरदम क़दम।
उंगली पकड़ सिखाया चलना बिना बात बिगड़ते,
लाठी बनी सहारा हर पग लूले लंगड़ते।
कागा क़द्दावर थे मोह़ताज बेसहारा बन गये,
सांसों का भरोसा नहीं नाकारा बन गये।
अपनायत
अपने तो अपने होते है,
अपने तो सपने होते है।
रोम रोम में बसते हंसते,
विदाई जुदाई पर रोते है।
अपने तो अपने होते,,,,,,,
बिना अपनों जीवन सूना सिसकते,
प्रेम के बीज बोते है।
अपने तो अपने होते,,,,,
आंखों में आंसू बन छलकते,
नींद सपने बन सोते है।
अपने तो अपने होते,,,,,,
सांसों में सांसें बन सुबकते,
अपना सब कुछ खोते है।
अपने तो अपने होते,,,,,,,
छूने से होता आभास चमकते,
मोतियो की माला पिरोते है।
अपने तो अपने होते,,,,,,,
लहु ममता का रिश्ता परखते,
नज़रों से नाता संजोते है।
अपने तो अपने होते,,,,,,,,
कागा कोई भेद नहीं रखते,
लगा धूल धब्बा धोते है।
अपने तो अपने होते,,,,,,,
बग़ावत
बग़ावत का बीज बोया अंजाम क्या होगा,
अ़दावत का अंकुर फूटा अंजाम क्या होगा।
ठहरे पानी में पत्थर नहीं फेंक फ़ालतू,
नफ़रत का बीज बोया अंजाम क्या होगा।
अमन पसंद अंजुमन में ख़लल बर्दाशत नहीं,
ख़ुराफ़ात का बीज बोया अंजाम क्या होगा।
दीन मज़हब की जंग तेस़ब तलख़ तकरार,
शरारत का बीज बोया अंजाम क्या होगा।
कायनात में मख़लूक़ सबका ख़ुदा एक ख़ुद,
ख़िलाफ़्त का बीज बोया अंजाम क्या होगा।
हवा पानी अर्श का किया बंटवारा कागा,
क़्यामत का बीज बोया अंजाम क्या होगा।

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा
पूर्व विधायक
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