सावन में मिलन | Kavita Sawn Mein Milan

सावन में मिलन

( Sawn Mein Milan )

आ गई हुई सावन में
कुछ दिनों के लिए मायके।
जिया लग नही रहा मेरा
अब उनके बिना यहाँ।
मिलने की राह में हम
बहुत व्याकुल हो रहे।
करें तो क्या करें अब
की मिलन हमारा हो जाये।।

पिया की राह में आँखें
उन्हें निहार रही है।
तड़प दिलकी और मनकी
संभले नही संभाल रही है।
उदासी चेहरे पर अपने
मैं दिखा नही सकती।
क्योंकि आई हुई हूँ मैं
मात-पिता के घर पर।।

मिलन पिया से मेरा
हुआ है कुछ दिन पहले।
और अब आ गया देखो
सावन का ये महिना।
छोड़ मुझे अब उनको
जाना पड़ेगा यहाँ से।
और बिछड़ने का वियोग
मुझेको सहना पड़ेगा।।
क्योंकि आ जो गया है
सावन का ये महिना।।

Sanjay Jain Bina

जय जिनेंद्र
संजय जैन “बीना” मुंबई

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