उठे जब कलम कोई | Kavita uthe jab kalam koi

उठे जब कलम कोई

( Uthe jab kalam koi )

 

उठे जब कलम कोई सिंहासन डोल जाता है
सोया सारा धीरज जनता का बोल जाता है

 

सड़के  पूल  को निगले वो दिग्गज बड़े भारी
चंद चांदी के सिक्कों में कुर्सियां खरीदते सारी

 

राज काली करतूतों का भांडा फूट जाता है
उठे जब कलम कोई शासन रूठ जाता है

 

जलती आग बनती है चिंगारी क्रांति लौ जलती
आलोक घट घट में भर भावना देशप्रेम भरती

 

प्रेम की गंगा बहती है सद्भावो का सिंधु आता
उठे जब कलम कोई राष्ट्र जन गण मन गाता

 

रचती कीर्तिमानों को प्रतिमान नये नये गढ़ती
संघर्ष सच्चाई की खातिर हमेशा आगे बढ़ती

 

मशाल करें रोशनी जब अंधियारा भाग जाता है
उठे  जब  कलम  कोई  जमाना  जाग जाता है

 

अनीति अनाचार बढ़ते भ्रष्टाचार बड़ा भारी
गबन धोखा लूट की चली व्यापक बीमारी

 

बुराई मिटाने की खातिर लेखनी बोल जाती है
उठे  जब  कलम  कोई  कुर्सियां  डोल जाती है

 

   ?

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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