किसानों का दर्द 

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किसानों का दर्द 

( Kisano Ka dard )

 

 

जो फ़सल बोता है,

वह इसे काटना भी जानता है;

ये किसान है अपना हक़

लेना भी बख़ूबी जानता है ।

 

ना जाने, वक़्त भी अकसर

कैसे-कैसे रंग दिखाता है;

सबका पेट भरने वाला आजकल

सड़कों पर भूखा सो जाता है ।

 

उस पार खड़े वर्दीधारी

भी हमारे अपने ही लोग हैं;

बस, यही सोचकर किसान

दंगे-फसाद से घबराता है ।

 

अपनी एक लाठी से जिसने

गीदड़-भेड़ियों को खदेड़ा है;

वो नासमझ इन्हें लाठी-बंदूक,

आसूँ गैस से डरता है ।

 

ये भगत सिंह, गाँधी,

छोटूराम की संताने हैं- साहब !

झुकने से पहले मरना क़बूल है

तू किसे डराता है ?

 

बहुत हो गई तुम्हारी जुमलेबाजी

ऐ सरमायदारों के दोस्त !

 छोड़ दो तख़्तो-ताज गर

तुम्हें किसानों का दर्द  समझ नहीं आता है।

?

कवि : संदीप कटारिया

(करनाल ,हरियाणा)

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