भाग्य (किस्मत) का साथ
“पंकज सर, आपका यूजीसी नेट का एग्जाम कब है?”
“17 जुलाई को, रविवार के दिन।”
“एग्जाम सेंटर तो आपका मेरठ ही पड़ा होगा।”
“हाँ बड़े भाई। वहीं है।”
“फिर ठीक है। पंकज सर, इस बार आप जब मेरठ एग्जाम देने जाओगे तो आपको मेरे घर पर ही रुकना होगा। रुकने-खाने-पीने से लेकर किसी भी चीज की चिंता करने की आपको कोई जरूरत नहीं है। पिछली बार की तरह इस बार भी गच्चा देकर निकल मत जाना। कभी होटल में जाकर रुक जाओ। अगर ऐसा किया तो मैं नाराज हो जाऊंगा। इस बार तो मैंनें अपने परिवार से भी बोल दिया है कि पंकज सर हमारे घर जरूर आएंगे और रुकेंगे। परिवार के सभी सदस्यों को आपके आगमन का उत्सुकता से इंतजार है।”
पंकज और राजकुमार एक ही विद्यालय में पढ़ाते हैं। पंकज अपने गृह जनपद अमरोहा में अध्यापक है जबकि राजकुमार मेरठ के रहने वाले हैं। स्कूल आने-जाने की समस्याओं को ध्यान में रखकर.. राजकुमार अमरोहा में ही पंकज के घर के पास रूम लेकर रह रहे हैं। हर छोटे-बड़े काम में पंकज उनकी उनकी मदद करते हैं।
अब जब राजकुमार को यह पता चला कि पंकज सर का एग्जाम सेंटर मेरठ में है तो वे यह जानकर बेहद खुश हुए कि उन्हें भी पंकज सर की सेवा करने का अवसर प्राप्त होगा। आखिर मेरे जनपद में पहुँचकर पंकज सर कष्ट क्यों भोगे।
एग्जाम से एक दिन पहले 16 जुलाई को पंकज सर मेरठ के लिए रवाना हुए। राजकुमार सर उनकी लोकेशन की समय-समय पर अपडेट लेते रहे। जैसे ही पंकज मेरठ पहुँचकर बस से उतरे तो उन्होंने अपने सामने एक बुजुर्ग सज्जन को पाया।
“क्या आप ही पंकज सर हैं?” उन्होंने पूछा।
“हाँ जी, मैं ही पंकज हूँ।”
“मैं राजकुमार का पिता हूँ। राजकुमार को अचानक आवश्यक कार्य से ससुराल जाना पड़ गया है इसलिए उन्होंने मुझे आपको लेने के लिए भेजा है।”
“अंकल जी, आपने मुझे पहचान कैसे?”
“राजकुमार ने आपका फोटो मोबाइल पर भेज दिया था। वैसे भी जब-तब राजकुमार घर आते हैं तो वे पूरे परिवार को अपने स्कूल और स्टाफ की फोटो दिखाते हैं। फ़ोटो से ही हम आपको जानते हैं, मिलना कभी नहीं हुआ.. यह और बात है।”
पंकज सर ने पाँव छूकर अंकल जी का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकुमार के पिताजी पंकज सर को बाइक पर बैठाकर अपने घर ले आए।
राजकुमार का घर सादगी से परिपूर्ण था। घर में चारों तरफ साफ सफाई थी। गंदगी, मक्खी का कोई नामोनिशान नहीं था। घर के सभी सदस्यों ने बहुत प्रेमभाव से उनको बैठाया, परिवार का हाल-चाल पूछा और अतिथि सत्कार किया। एग्जाम को ध्यान में रखते हुए उनके लिए अलग कमरे की व्यवस्था की गई थी। खाने में भी तरह-तरह के पकवान बनाए गए थे। सभी व्यंजन एक से बढ़कर एक थे।
“आप सब मेरे लिए इतना क्यों परेशान हुए? मैं तो घर का ही सदस्य हूँ। मैं नॉर्मल खाना खा लेता। मुझे तो उम्मीद ही नहीं थी कि आपने इतना इंतजाम कर रखा है। अगर सच में, आज मैं कहीं और होटल में रुक जाता तो मुझसे बहुत बड़ी भूल हो जाती। राजकुमार तो सच में बहुत नाराज होता मुझ पर। मुझे सच में यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा है, बिल्कुल घर जैसी फीलिंग आ रही है। एक मिनट भी ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी गैर के घर पर हूँ।” पंकज सर बोले।
“यह हमारा सौभाग्य है कि आप हमारे घर पधारे। राजकुमार आपकी बड़ी तारीफ करता है। हर काम में आप उसकी बड़ी मदद करते हैं। आज अगर राजकुमार को अचानक काम नहीं पड़ता तो वह यहीं होता। अब जबकि वह यहाँ नहीं है तो मेरी ड्यूटी बनती है कि तुम्हें कोई दिक्कत ना हो। मैं तुम्हारे पास रहूँ। इस घर में मेरे तीनों बेटों के परिवार(बहू,बच्चें) रहते हैं।
राजकुमार के दोनों भाई बाहर दिल्ली में रहकर काम करते हैं। राजकुमार की मम्मी को खत्म हुए 5 वर्ष बीत गए हैं। मैं यहां नहीं आता। मैं घेर में जानवरों के पास रहता हूँ। मेरा खाना-पीना सब उधर ही पहुँच जाता है।” राजकुमार के पिताजी ने बताया।
“अंकल जी, आपका घेर कहाँ है और यहाँ से कितनी दूर है?” पंकज सर ने सवाल किया।
“बस पास में ही है। आप खाना खा लीजिए, फिर चलते हैं। आपका खाना भी पच जायेगा।” राजकुमार के पिताजी बोले।
खाना खाकर पंकज सर राजकुमार के पिताजी के साथ उनकी घेर में पहुँचे। वहाँ उन्होंने चारों तरफ बहुत सारे पेड़ पौधे लगा रखे थे और एक बड़ी संख्या में जानवर- भैंस इत्यादि पाल रखे थे। इतने सारे जानवरों को एकसाथ देखकर पंकज ने सवाल किया-
“इतने सारे जानवरों की देखभाल कौन करता है? क्या आप ही अकेले इन सब जानवरों की देखभाल करते हैं?”
“हाँ बेटा, मेरा सारा समय इन्हीं की देखभाल में ही निकलता है। मैं यहीं जानवरों के पास सोता हूँ।”
“इन जानवरों से आपको तो बहुत सारा दूध प्राप्त होता होगा। इतना सारा दूध आप डेयरी पर दे आते होंगे क्योंकि घर में तो इतना दूध पिया नहीं जा सकता।”
“नहीं ऐसा नहीं है। इन 12 जानवरों में से सिर्फ पाँच जानवर ही दूध देते हैं। वे ही काम के हैं। बाकी जानवर ऐसे ही हैं।”
“काम के सिर्फ़ सिर्फ पाँच जानवर?” हैरानी से पंकज ने पूछा।
“हाँ”
“फिर आप बाकी के जानवरों को बेच क्यों नहीं देते? मतलब ऐसे जानवर जो दूध नहीं देते या किसी काम के नहीं है, उनको आपने क्यों पाल रखा है? उनको बेच देने से आपका काम भी कम हो जाएगा, आपको कुछ रुपए भी मिल जाएंगे।” पंकज सर बोले।
“बेटा, मेरी सोच अलग तरह की है। मैं इनको कसाई को नहीं बेच सकता, बाहर नहीं छोड़ सकता। यहाँ तक कि अपने किसी रिश्तेदार को भी नहीं दे सकता। वे लोग भी इन जानवरों को कसाइयों को बेच देंगे। कसाई इनको मार के.. काट के.. बेच देंगे या खा जाएंगे।”
“अंकल, मैंने देखा है कि लोग जानवरों के किसी काम के ना रह जाने पर उनको कसाइयों को बेच देते हैं। इससे उन्हें नुकसान नहीं होता। क्या ये जानवर मरते दम तक यहीं रहेंगे?”
“बेटा, बात यह है कि यह सब जानवर बहुत छोटेपन से यहीं पले-बढ़े हैं। कुछ का जन्म तो यहीं हुआ है। पूरी जिंदगी इन्होंने हमारी सेवा की है। हमारे परिवार को पालने में, घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद की है और आज जब यह काम करने की स्थिति में नहीं है, दूध देने की स्थिति में नहीं है तो मैं इनको कुछ रुपए के लालच में कसाई को बेच दूँ? यह कहाँ का इंसाफ है?
यह बात मेरी आत्मा को हजम नहीं होती। जिस तरह परिवार में बड़े-बूढ़ों का साया ही काफी होता है, ठीक उसी तरह इन जानवरों का मेरी आंखों के सामने होना मुझे सुकून देता है। वैसे भी कोई किसी को नहीं खिलाता, सब अपने भाग्य का खाते हैं। देने वाला, खिलाने वाला, जिंदा रखने वाला सिर्फ ईश्वर है।
मैं भाग्य को बहुत मानता हूँ। क्या पता मैं और मेरा परिवार इनके भाग्य का ही खा रहे हैं? मुझे याद है कि जब मेरी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी, तब किसी तरह रूपए पैसे उधार लेकर, इकट्ठे करके मैंने दो भैंसें खरीदी थी। उन दो भैंसों ने ही मेरे पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति बदल कर रख दी।
फिर उनके बच्चे हुए और फिर उनके बच्चों के बच्चे। इस तरह आज इनकी संख्या 12 के लगभग है। मैंने पहले दिन से ही यह प्रण ले लिया था कि अपने जीते जी इनको कभी बेचूंगा नहीं। अपने से अलग नहीं करूँगा, कसाइयों को नहीं सौपूंगा।
जिस व्यक्ति या जानवर ने अपनी पूरी जिंदगी हम पर समर्पित/ न्योछावर कर दी हो, उसको सम्मानजनक जीवन जीने और सम्मानजनक मौत पाने का हक है। मैंने अपने बच्चों को भी यही शिक्षा दी है। उनसे बोल दिया है कि भले ही आप नए जानवर ना खरीदो लेकिन इन जानवरों की अच्छे से देखभाल करनी है।
इनके खाने-पीने में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। हम आज जो भी हैं या मेरे बच्चों ने जो थोड़ा बहुत कामयाबी पाई है, सब इन्हीं जानवरों की वजह से है। हमारा सब कुछ उनके भाग्य से है, उनके हमारी जिंदगी में होने से है।”
“अंकल जी, यह तो आपकी मेहनत का फल है। भाग्य को सब कुछ मानना ठीक नहीं है।” पंकज बोले।
“बेटा, मेहनत वालों को भी मैंने असफल होते हुए देखा है। सिर्फ मेहनत के सहारे सब कुछ हासिल नहीं होता। मेहनत के साथ-साथ भाग्य का साथ होना भी बेहद जरूरी है। तुमने एक कहानी सुनी होगी जिसमें यात्रियों से भरी बस बरसात के मौसम में सुनसान सड़क पर चलती जा रही थी, घना अंधेरा जंगल था।
ऊपर आसमान में जोर-जोर से आकाशीय बिजली कड़क रही थी। उस बिजली की आवाज बड़ी डरावनी थी। वह बिजली डरावनी आवाज के साथ बार-बार बस तक आती और वापस ऊपर लौट जाती। बस में बैठे सभी यात्री बहुत डरे सहमे हुए थे। सब सोचने लगे कि जरूर बस में कोई शापित या पनौती व्यक्ति होगा जिसकी मौत आई होगी। यह बिजली सिर्फ उसी के लिए बस तक आ रही है।
अतः बस के सब लोगों ने आकाशीय बिजली के बार-बार बस तक आने के डर के कारण… उस एक व्यक्ति की पहचान करने तथा सब लोगों की जान बचाने के लिए बस रोकने का निर्णय लिया। बस रोकी गई। सबने मिलकर इस बात पर सहमति जताई कि बस से 100 मीटर की दूरी पर जो बरगद का पेड़ है, सब उसको बारी-बारी से छूकर वापस बस में आकर बैठेंगे।
जिसकी भी मौत आकाशीय बिजली के हाथों होनी है, बिजली उस पर गिर जाएगी और बाकी सब लोगों की जान बच जाएगी। इस तरह सिर्फ़ एक जान जायेगी। ‘एक व्यक्ति को छोड़कर’ एक-एक करके सब लोग डरते-डरते, ईश्वर का नाम लेते हुए..बरगद का पेड़ छूकर वापस बस में आकर बैठ गए, लेकिन एक व्यक्ति बस से बाहर ना निकला।
सब उसको पकड़ कर बस से बाहर निकलने लगे। डरकर, सबसे हाथ छुड़ाकर वह व्यक्ति बार बार भागकर बस में घुस जाता। सब कहने लगे कि ये व्यक्ति ही पनौती है, यही वह व्यक्ति है जिसकी वजह से आकाशीय बिजली बार-बार बस तक आ रही है। बस के सभी लोगों ने जबरदस्ती उसको बस से बाहर निकाल दिया और पेड़ छूकर आने को कहा। वह इंसान डरते-डरते बरगद के पेड़ के पास जैसे ही पहुंचता है, वैसे ही जोर की आवाज के साथ बिजली कड़कती है और बस पर गिर जाती है।
पूरी बस धू धू करके जलने लगती है। उसमें बैठे सभी लोग मारे जाते हैं। जिस व्यक्ति को वह अपने लिए शापित समझ रहे थे, उसी व्यक्ति की वजह से उन सब की जान बची हुई थी। उस व्यक्ति की वजह से ही बिजली चाह कर भी उनका बाल बांका नहीं कर पा रही थी। उस व्यक्ति के अलग होते ही सब काल के गाल में समा गए।” आगे बोलते हुए राजकुमार के पिताजी बोले।
“बेटा, यही होती है भाग्य की ताकत। इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि मैं सिर्फ अपने भाग्य का खाता हूँ या मेरी वजह से ही परिवार चल रहा है या मेरी वजह से ही मेरा परिवार जिंदा है। हो सकता है कि आपके साथ जो बीवी-बच्चे, पशु-पक्षी रह रहे हों, आप उन्हीं की वजह से ही अच्छा खा पी रहे हो.. जिंदगी में कामयाबी पा रहे हों। आप मेरे घर आए, मुझे सेवा का मौका दिया। यह भी मेरे लिए भाग्य की बात है।
किस्मत वालों (भाग्यवान) लोगों के घर में ही मेहमान आते हैं। मेरे लिए मेहमान भगवान समान है। यह मत समझना कि मैंनें आपको कुछ खिलाया है। यह आपने अपने भाग्य का खाया है। यह आप ऊपर से लिखवा कर लाए हैं। हो सकता है यह पिछले जन्मों का भी फल हो।
देने वाला, खिलाने वाला, बचाने वाला, मारने वाला सब कुछ ईश्वर है। उसकी मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता। इंसान वही कामयाब है, जिसे ईश्वर की कृपा के साथ-साथ भाग्य का साथ मिला है.. चाहे उसने अधिक परिश्रम किया हो या नहीं।
अर्थात मेरे कहने का मतलब यह है कि सिर्फ मेहनत से सब कुछ हासिल नहीं होता। ईश्वर मेहरबान हो, भाग्य साथ हो तो आप सब कुछ हासिल कर सकते हैं।”
उनकी बात सुनकर पंकज सर निरुत्तर हो गए। वे सोचने पर विवश हो गए। उन्हें लगने लगा कि अंकल जी, सही बोल रहे हैं। सच में भाग्य बलवान होता है।
इस बारे में सोचते ही उनकी आंखों के सामने न जाने ऐसे कितने उदाहरण आ गए जिन्होंने भाग्य(किस्मत) के बल पर सब कुछ हासिल किया और मेहनती लोग सिर्फ देखते रह गए, हाथ मलते रह गए। उनको निराशा हाथ लगी।
अगले दिन नेट एग्जाम परीक्षा देने जाते समय पंकज सर के दिमाग में कल वाली राजकुमार के पिता की बातें ही घूम रही थीं। नेट एग्जाम क्लियर करने के लिए उन्होंने मेहनत तो काफी की थी, लेकिन अब उनको कहीं ना कहीं मेहनत के साथ-साथ भाग्य का सहारा भी नजर आने लगा था। इसके लिए वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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