गुनहगार
कोतवाली के सामने से गुजरते वक्त… अचानक मेरी नज़र कोतवाली के बाहर गुमसुम, मायूस बैठी चिर परिचित महिला पर पड़ी। ऐसा लगा जैसे कि वह महिला मेरे मित्र राजन की पत्नी सुनीता हो।
हालांकि मैं कोतवाली से थोड़ा आगे निकल चुका था, लेकिन मेरे दिल ने कहा… जरूर कोई बात है। तभी वे कोतवाली आयी हैं। हो सकता है कि राजन व सुनीता में कोई अनबन हो गई हो। मुझे चलकर देखना चाहिए। यही सोचकर मैं वापस लौट कर आया तो देखा कि वह महिला राजन की पत्नी सुनीता ही है।
“भाभी जी, क्या हुआ? कोतवाली के सामने आप यूं क्यों बैठी हो? राजन किधर है?” मैंने पूछा।
मेरा इतना पूछना ही था कि सुनीता की आंखों से आंसू बहने लगे।
“कृपया आप मत रोइए। बताइए तो सही, क्या बात है? राजन किधर है?”
“पिछले 6 माह से वे गाजियाबाद में नौकरी करते हैं। अगले शनिवार को घर आएंगे।”
“फिर आप कोतवाली के बाहर क्या कर रही हैं? कोई समस्या?”
“मैं यहां अपने पिताजी के आने का इंतजार कर रही हूं। मैंनें उन्हें फोन कर दिया है। वह घर से निकल पड़े हैं। एक-दो घंटे में आ जाएंगे। फिर मैं उनके साथ कोतवाली में जाकर अपनी सास विमला और ननद अलका की शिकायत दर्ज करवाऊंगी। उन्होंने मेरे साथ मारपीट की है और मुझे पीट-पीट का घर से बाहर निकाल दिया है। बड़ी मुश्किल से जान बचाकर यहां पहुंची हूं। मैं उन्हें छोडूंगी नहीं।”
“आपने इस बारे में राजन से कोई बात की? उन्हें बताया कि उनकी मां और बहन ने आपके साथ क्या किया?”
“नहीं, मैंने उनसे कोई बात नहीं की है। वे तो खुद अपनी मां बहन के कहने में चलते हैं। उनसे कुछ भी कहो तो उल्टे मुझे ही समझाते हैं और मुझे मारने पीटने को दौड़ते हैं। मेरी सास व ननद उल्टी सीधी बातें करके मेरे पति को भड़काने का काम करती हैं और वे उनके कहने में आ भी जाते हैं। पिछली बार अपनी मां बहन के कहने में आकर उन्होंने हद ही पार कर दी थी और मुझे मारा भी था।
मैं दुखी हो गई हूं। अपने मन की बात मैं किसी से भी नहीं कह सकती। जब से शादी होकर उस घर मे आई हूं… तब से ननद और सास, बात-बात पर मुझे ताने देते हैं, तंज कसते हैं, खाने पीने से लेकर मेरे हर काम में कमियां निकालते हैं, मुझे परेशान करते हैं। अगर मैं पलटकर जबाब देती हूँ तो सबके मुंह बन जाते हैं और वे मुझे काट खाने को दौड़ते हैं, मुझे उल्टा सीधा बोलते हैं। अब मैं उस घर में कभी नहीं जाऊंगी।” सुनीता अपनी समस्या मुझे विस्तार से बताते हुए बोली।
“मुझे लगता है कि राजन अपनी मां-बहन और आपके बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश कर रहा है लेकिन बना नहीं पा रहा है। वह अपनी मां और बहन को तो हर बार नहीं समझा सकता और न ही उनको डाँट सकता है। अब आप ही उसकी दोस्त, जिंदगी, हमसफ़र, सब कुछ हो इसलिए वह आपको ही समझाने की कोशिश करता है।
वह बेचारा करे भी तो क्या करें? आपको उसको समझना चाहिए। आप अपनी सास व ननद की बातों को इग्नोर भी तो कर सकते हो। जब पता है कि वे बदतमीज है, हाथापाई करने लग जाती है, उल्टा सीधा बोलती हैं… तो खामोश रहने में ही भलाई है। क्योंकि कहा भी गया है कि एक चुप सौ को हराये। क्या जरूरत है उन बदतमीजों के मुंह लगने की?”
उसको समझाते हुए, दोस्त की तरफदारी करते हुए सुनीता से मैंने आगे पूछा-
“अच्छा, मुझे बताओ कि आज ऐसा क्या हुआ जो बात कोतवाली तक जा पहुंची और आपको अपने पिताजी को फोन करके बुलाने की नौबत आन पड़ी?”
“मेरी ननंद अलका बहुत बदतमीज है। हमेशा मुझसे मुँह बनाकर बात करती है, मुझसे तू तड़ाक से बात करती है। मेरा बिल्कुल सम्मान नहीं करती। वह सुबह से शाम तक फोन पर ही लगी रहती है। आज मैंने फोन पर उसे किसी लड़के के साथ होटल में मिलने वाली बात करते हुए सुना। यह सब मुझे बहुत अजीब लगा।
मैंनें इसका विरोध किया तो वह मेरे साथ बदतमीजी करने लगी। उसका साथ देने मेरी सास भी आ गई। उन दोनों ने मुझको खूब गालियां देते हुए चरित्रहीन कहा। सास ने कहा कि मैं झूठा आरोप लगाकर अलका को बदनाम करने का काम कर रही हूँ। उनको अपनी बेटी पर पूर्ण यकीन है कि वह ऐसा कर ही नहीं सकती।
जब मैंने पलट कर जवाब दिया, फोन वाली उसकी बात बताई तो इसी बात पर झगड़ा शुरू हो गया। जब उन्होंने मुझे चरित्रहीन बोलकर मुझपर उल्टे-सीधे आरोप लगाए तो मैं यह सब बर्दाश्त न कर सकी। मैंने भी दो-चार बातें सुना दी।रोज-रोज के उनके ताने सुन-सुनकर दिमाग खराब हो गया था तो आज मैंनें भी मन की सारी भड़ास निकाल दी। यह देखकर उन्होंने मेरे साथ हाथापाई की और मुझे मारने के लिए डंडा लेकर भागे। मैं भाग कर सीधे कोतवाली आ गयी और यहाँ आकर, अपने पिताजी को फोन कर दिया। मैं उस घर में नहीं रह सकती।”
“अच्छा तो ये बात है। ये बात इतनी बड़ी नहीं कि कोतवाली में शिकायत की जाए। भाभी जी, कोतवाली में शिकायत करने से कोई फायदा नहीं है। इससे दोनों परिवारों को ही दिक्कत होगी। एक काम करो। वापस मेरे साथ अपने घर चलो।”
“भैया, मैं घर नहीं जाऊंगी। वे मेरे साथ फिर से बदतमीजी करेंगे, मुझे मारेंगे पीटेंगे। पिताजी भी आने वाले होंगे।”
“भाभी जी, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि वे ऐसा नहीं करेंगे। उस घर में मेरा बचपन से आना जाना रहा है। ये और बात है कि पिछले कुछ महीनों से मेरा आपके यहां आना जाना न के बराबर रहा है। अगर उन्होंने मेरी मौजूदगी में आपके साथ बदतमीजी करने की कोशिश की तो मैं खुद आपके साथ वापस कोतवाली आकर रिपोर्ट दर्ज कराऊंगा। मुझ पर यकीन रखो और मेरे साथ चलो। आपके पिताजी को भी हम वहीं बुला लेंगे। मैं उन्हें फोन कर दूंगा। बस मेरी एक गुजारिश है कि वे दोनों(सास व ननद) आपको कितना भी गन्दा बोलें या गाली दें, बस आपको पलटकर जवाब नहीं देना है। बस खामोश रहना है। पारिवारिक माहौल नार्मल करने का काम मेरा है।”
काफी समझाने के बाद बड़ी मुश्किल से सुनीता घर जाने को तैयार हुई। मैंने राजन को फोन करके सारी बात बताई। सुनीता के पिताजी का आना सुनकर, राजन ने अगले 2 घंटे में घर पहुंचने के लिए कहा।
सुनीता को लेकर मैं राजन के घर पहुंचा। दरवाजा खुला हुआ था। सास और अलका अंदर कमरे में बैठी थी। जैसे ही मैं सुनीता को लेकर अंदर पहुंचा, वे दोनों उठकर खड़ी हो गई। सुनीता के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए सुनीता को मारने के लिए डंडा उठा लाईं।
“अगर किसी ने सुनीता पर हाथ उठाया या उसको मारने की, चोट पहुंचाने की कोशिश की तो मुझसे बुरा कोई ना होगा। इनको कोतवाली से वापिस मैं लेकर आया हूँ। भाभी जी की सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी है। इसलिए बेहतर है कि यह सब करने से पहले मेरी बात सुनी जाए। कहीं ऐसा ना हो कि बाद में आप लोगों की दिक्कत और बढ़ जाए।” समझाते हुए मैंने कहा और इशारे से सुनीता को अपने कमरे में जाने का इशारा किया।
मौके का फायदा उठाकर तेजी से सुनीता अपने कमरे में पहुंची और दरवाजा बंद कर लिया। यह देखकर अलका भड़क उठी। वह बदतमीजी पर उतर आई। गाली गलौज करते हुए अलका ने सुनीता का दरवाजा लात मारकर तोड़ने की कोशिश की। मैं बहुत जोर से अलका पर चीखा। इसके बाद अलका और विमला का हाथ पकड़ कर, बातचीत के इरादे से उन्हें दूसरे कमरे में ले गया और उनको डपटकर बोला-
“आप दोनों को अपने घर की बहु से इस तरह का बर्ताव करते हुए शर्म आनी चाहिए। कल को अलका की भी शादी होगी। अगर उसकी सास और ननद उसके साथ ऐसा करें तो उसको कैसा महसूस होगा? ईश्वर ना करें अगर सुनीता, पूजा की तरह (पड़ोस में हुई घटना का उदाहरण देते हुए कहा) फांसी लगाकर मर गई या उसने आपकी शिकायत कोतवाली में करते हुए हिंसा और दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कर दिया तो सोचो क्या होगा?
आप सब की पूरी जिंदगी जेल में गुजर जाएगी और जमीन ज्यादा सब कुछ बिक जाएगी। समझदारी से काम लो। यह तो अच्छा हुआ कि सुनीता पर मेरी नजर पड़ गई… वरना अब तक आपके खिलाफ कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज हो चुकी होती और आपको पकड़कर पुलिस ले भी जा चुकी होती।
सुनीता के पिताजी आने वाले हैं। इधर मैंनें भी राजन को भी आने के लिए बोल दिया है। वह भी कुछ देर में आ जाएगा। अतः बेहतर होगा कि बुद्धिमानी से काम लेते हुए फैसला कर लिया जाए। दोनों परिवारों का मामला घर में बैठकर ही सुलझा लिया जाए।” मैंनें विभिन्न केसों का उदाहरण देते हुए (जिसमें बहू ने झूठे-सच्चे आरोप लगाकर या खुद को मारकर ससुराल वालों की ऐसी तैसी मार दी) अलका और विमला को इतना डरा दिया कि उन्हें अपना अंजाम साफ-साफ नजर आने लगा।
कुछ समय बाद सुनीता के पिता अमरपाल जी अपने साथ पांच लोगों को लेकर, बेहद गुस्से में घर में दाखिल हुए।मैंने उनको ससम्मान कमरे में बैठाया और बैठकर बात करने का आग्रह किया। कुछ समय बाद राजन भी वहां मौजूद था। दोनों पक्षों की बातें सुनकर यह निर्णय लिया गया कि कहना न मानने की स्थिति में परिस्थितियां और ज्यादा बिगड़ जायेगी। गलती की पुनरावृत्ति ना हो। इस बात का सब ध्यान रखें।
अलका, विमला और सुनीता को आपस में सामंजस्य बनाकर चलना होगा। तीनों को सख्त हिदायत दी गयी। टीका-टिप्पणी करने व हाथापाई से बचना होगा। राजन को अपनी पत्नी का ध्यान रखना होगा। वह भी अपनी बहन-मां के बहकावे में आकर सुनीता को गलत नही कहेगा और न ही हिंसा करेगा। इस पर दोनों पक्ष राजी हो गए। वे समझ गए थे कि मुकदमेबाजी से कुछ हासिल नहीं होगा।
उस दिन के बाद से सुनीता की ओर से कोई शिकायत कभी सुनने को ना मिली। लेकिन अक्सर विमला और अलका, सुनीता के साथ बदतमीजी से पेश आती थी, लेकिन सुनीता सबकुछ जानबूझकर नजरअंदाज करती रही, एक कान से सुनकर उनकी बकवास दूसरी से निकालती रही। इस तरह 6 माह बीत गए।
फिर एक दिन पता चला कि अलका पड़ोसी गांव में रहने वाले लड़के के साथ घर मे रखा कैश व जेवर लेकर भाग गई है। तब जाकर विमला को पता चला कि सुनीता ने अलका के बारे में जो कुछ भी कहा था, वह सच था। लेकिन अब क्या हो सकता था? अलका ने विमला व उसके परिवार की समाज में भरपूर बदनामी कर दी थी।
इस घटना के बाद से आज तक विमला, सुनीता से भी उसके साथ किये अपने पूर्व कुकृत्यों के कारण नज़रें ना मिला पाई। उसे अपनी बेटी अलका पर बहुत विश्वास था। उसे नहीं पता था कि वह ऐसा कुछ करेगी? उसकी बातों में आकर वह अपनी बहू को दुश्मन समझकर, भला बुरा कहने व उस पर झूठे आरोप लगाने में कभी पीछे न रही और उसी अलका ने उनको आजीवन के लिए सुनीता की नजरों में गुनहगार बना दिया था।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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