क्या कहूँ | Kya Kahoon

क्या कहूँ

क्या कहूँ दिल ने मुझे उल्फ़त में पागल कर दिया
थोड़ा में पहले से था उसने मुकम्मल कर दिया

अपनी आँखों का सनम तूने तो काजल कर दिया
आँख से छूकर बदन को तूने संदल कर दिया

शह्र में चर्चे बड़े मैला ये आँचल कर दिया
क्या कहें दिल रूह को भी मेरी घायल कर दिया

खोट नीयत में थी वो देता रहा धोखा मुझे
लम्हा-लम्हा ख़ुद को आँखों से ही ओझल कर दिया

ज़ीस्त में ख़ुशियों की मेरे यूँ रवानी आ गई
मसअले को भी ख़ुदा ने मेरे ख़ुद हल कर दिया

मैं तो दरिया थी मुझे मिलना था सागर से मगर
रोक कर मेरी रवानी तूने बेकल कर दिया

ढूँढती आँखें मेरी तुझको हमेशा ही सनम
इस मुहब्बत में तो यूँ क़ुर्बान हर पल कर दिया

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

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