महंगी शादी

लघुकथा – महंगी शादी

मास्टर शिवप्रसाद की ज़िंदगी भर की कमाई आज बेटी की शादी में दांव पर लगी थी।
घर के आँगन में सजी रंग-बिरंगी लाइटें, मंडप में बैठे पंडित, और हाथ में चेकबुक लिए मास्टर साहब —
सब कुछ कुछ खोखला-सा लग रहा था।

लड़के वालों की माँगें दिन-ब-दिन बढ़ती गईं।
“गहने हल्के हैं… फ्रिज छोटा है… कार पुरानी है…”
और मास्टर साहब हर बार सिर्फ यही कहते,
“कोशिश कर रहा हूँ… बेटी की शादी है… कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”

उस रात बेटी ने धीरे से उनके पास आकर कहा —
“पापा, आप थक गए हैं न?
कभी-कभी सोचती हूँ, क्या मेरी शादी आपका सपना थी… या आपकी सबसे बड़ी चिंता?”

मास्टर साहब ने बेटी की आँखों में देखा।
फिर अपनी आँखें पोंछते हुए बोले,
“बेटी, तू तो मेरी रौशनी है,
पर समाज ने शादी को इतना महँगा बना दिया है कि आज एक बाप अपनी रौशनी को विदा नहीं,
खुद को अंधेरे में धकेल कर भेज रहा है…”

दूसरे दिन सबने देखा —
विदा हुई दुल्हन के पीछे खड़ा एक बूढ़ा पिता,
जिसके माथे की शिकन में बेटी की मुस्कान छुपी थी…
और जेब में एक मुड़ा-तुड़ा कर्ज़ का काग़ज़,
जिस पर लिखा था —
“इज़्ज़त के नाम पर बिकता रहा प्यार… और एक बाप की कमाई।”

निष्कर्ष —

जब तक शादियाँ प्रेम और सरलता की बजाय
दिखावे और दहेज की मंडियों में सजती रहेंगी,
तब तक हर पिता
अपनी बेटी को विदा नहीं करेगा—
बल्कि अपने सपनों, अपने सम्मान
और अपने जीवन की सबसे सुंदर पूँजी को
धीरे-धीरे गिरवी रखता जाएगा।

और हर बेटी—
जो माँ-बाप की आँखों का तारा थी,
उसकी मुस्कान उस दिन सबसे फीकी होगी,
जिस दिन वह सबसे अधिक सजी होगी…

विवाह का वह क्षण,
जो एक पावन परिणय होना चाहिए था,
वह पिता की आँखों में
एक बोझिल ऋणपत्र बनकर झिलमिलाएगा…

जब तक समाज
शादी को एक उत्सव नहीं,
एक प्रतिस्पर्धा मानता रहेगा—
तब तक बेटियाँ विदा नहीं होंगी,
बल्कि हर बार एक पिता का हृदय
कहीं भीतर से
टूटता और चुपचाप मरता रहेगा…

अमरेश सिंह भदौरिया
प्रवक्ता हिंदी
त्रिवेणी काशी इ० कॉ० बिहार, उन्नाव

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • नालायक | Laghu Katha Nalayak

    “अंकल, हम आपकी बेटी जैसी नहीं लगती जो आप इस घर में इतना तनाव बनाए हुए हैं? पापा मेरे, आपकी बेटी की शादी के लिए प्रतिबद्ध थे कि भाई की बेटी हमारी बेटी होती है। हम किसी भी हाल में अलग नही होंगे। जब आपकी बेटी की शादी हो गई तो आप अलग होने के…

  • मुट्ठी भर गुलाल | Laghu Katha Mutthi Bhar Gulal

    “आओ सोमेश्वर आओ, आज होली का दिन है। जब तक जिंदगी है तब तक तो मालिक और मजदूर चलता ही रहेगा। लेकिन बैठो, मालपुए और दहीबड़े खाकर अपने घर जाना।” परमेश्वर ठाकुर ने सोमेश्वर को प्यार से बुलाते हुए कहा। “हांँ मालिक, क्यों नहीं,जरूर खाकर ही जाएंगे।” वह कुछ दूर बैठते हुए कहा। “दूर बैठने…

  • धर्म का धंधा | Dharm ka Dhandha

    सदियों से यदि कोई धंधा सबसे समृद्ध शाली रहा है तो वह धर्म का रहा है। यह ऐसा धंधा है जो सदैव लाभकारी होता है। अन्य धंधे में तो हानि की संभावना भी रहती है परंतु इस धंधे में कभी कोई हानि नहीं होती। यह पीढ़ी दर पीढ़ी लाभकारी धंधा है। एक बार हरिद्वार में…

  • दो और दो पांच | लघुकथा सह आत्मकथा

    कहते है कि मजाक में भी कहावते सच हो जाती है। सोचो कैसे चलो चलते है लगभग 5 वर्ष पहले जब मेरे ससुराल में मेरी पत्नी के बड़े पापा के यहां बड़े लड़के की शादी थी। हमारे यहां शादी के रीति रिवाजों में मंडप को कच्चे धागे से सुतना या कहो तो कच्चे धागे से…

  • दुल्हन किसकी?

    शाम को जब पवन मजदूरी से घर वापस आया तो… उसको पता चला कि पवन का दूर का मौसेरा भाई मोहित उसके पीछे अपनी शादी का कार्ड पड़ोस में देकर गया है। शादी के कार्ड पर जब उसने लड़की का नाम नीलम, पिता का नाम रामस्वरूप, गांव रामनगर, जिला काशीपुर, राज्य उत्तराखंड लिखा देखा तो……

  • राजा की तीन सीख Hindi kahani

    बहुत साल पहले एक प्रतापी राजा रहते थे। उनके तीन बेटे थे। राजा अपने बेटों को योग्य शासक के बनाने के लिए उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए अच्छी व्यवस्था करते हैं। राजा अपने बेटों को हर विद्या में पारंगत बनाना चाहते थे, जिससे राजा के बाद उनके पुत्र उनके राज्य को संभाल योग्य हो सके। तीनो…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *