Laghu Katha Vivah

विवाह | Laghu Katha Vivah

विवाह एक धार्मिक पवित्र समाज द्वारा मान्यता प्राप्त बंधन है। इसमें कोई दो मत नहीं ।क्योंकि इससे होती हमारी जातीयता का संरक्षण, पीढ़ी दर पीढ़ी मान्यता मिलना इसलिए तो यह बंधन न्ययोचित है ।

अगर व्यावहारिक बंधन नहीं होगा तो सृष्टि की नाश हो जाएगी गठजोड़ समाज मिलकर भरे पूरे परिवार समाज के साथ ताकि आज यहां,कल वहां नहीं। यदि यहां-वहां तो बच्चों का विकास सर्वांगीण अच्छे से संभव नहीं हो पाएगी बच्चों का आने वाला भविष्य पालन-पोषण अंधकारमय हो जाता है।

अत: शादी की मान्यता समाज को देना हो जाती जरूरी । मान्यता होने के बावजूद भी बहुतों का जिंदगी अंधकार में है। जरा सोचिए नहीं मान्यता पर क्या हाल होता?

यह एक ऐसे पवित्र, धार्मिक, सामाजिक गठजोड़ है। जो एक जन्म के लिए नहीं वरन कई जन्मों के लिए बांधा जाता है,होनी भी चाहिए। क्योंकि यहां दो दिल एक जान बनती है ।

यह एक गहराई से समझाने पर अपूर्व, अद्भुत, अनोखी, अनुपम दोस्ती है ,जो साथ-साथ रहकर सम्मिलित रूप से निर्णय लेकर सालों-साल दोस्त बन सारे गृहस्ती का कार्य संपादित करते हैं ।

देखा जाए तो विवाह कोई साधारण अविष्कार समाज की नहीं है। यह कोई मामूली दोस्ती नहीं प्रेम से भरी दुनिया, जहां आने वाले पीढ़ी को भी प्रेम से भरना है ।

उसे भी नूतन घर के लिए निर्माण करना है। उसके पालन -पोषण के लिए भी जिम्मेवार बनना है एक ऐसी मित्रता दोनों के पास हर गहरी राज छुपा रहता है। यह की एक की गलती का सजा दोनों को भुगतान करना पड़ता है।

मान लिया किसी ने गलत किया, धन हानि हुआ तो भूखे दोनों को मारना पड़ता है। क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक, दोनों एक सिक्के के दो पहलू जैसा है, दोनों में घनिष्ठ अंतरंग संबंध होते हैं। कारण दोनों के बीच अन्योन्याश्रित संबंध जो है ।

दोनों की मेल मिलाप से ही जीवन की गाड़ी सही दिशा में दौड़ सकती है। रथ के दो पहिए के समान होते हैं । जैसे एक रथ की पहिया हट जाने से रथ खींचने में हो जाती मुश्किल, दोनों एक के बिना दोनों का जीवन पूर्ण नहीं।

फिर भी आजकल कई कारण से संबंधों में उतना तब्बजू नहीं मिल पा रही है क्योंकि उस समय रिश्ते दिल के होते थे , आजकल के रिश्ते दिमाग से होने लगी है । हर जगह जोड़-तोड़ लाभ हानि का पिशाच खड़ा हो जाती।

दोस्ती के बीच रुपए दस्तक दे जाती । जिस नींव पर खड़ा होंगे वही नींव हिला डालते हैं, रिश्ते में चारों तरफ पैसा-पैसा का शोर मचाता है। दु:ख की बात दिल का बंधन प्रेम चल जाता है दर्द में।

संबंध में दरारें पड़ने लगती है । कभी-कभी तो संबंध विच्छेद तक आ जाती नौबत। लेकिन इतना बड़ा रस्म को बुद्धिमानी, सूझबूझ से निभाना ही उत्तम होता है।

यहां तो एक समझदार तो दूसरा बुद्धू समझ कर दबाने की कोशिश ।इस में तो रिश्ता नहीं चल सकती है। आधुनिकता में गठजोड़ को एक समझौता मानती है। अगर दो ही जिंदगी का मिलन है तो एक के साथ बैठकर समझौता कर क्यों नहीं? क्यों शादी में इतना बर्बादी? क्या जरूरी बाराती संभालने का?

लड़की के पिताजी को फकीर बनने का। वह तो कुटुंब परिवार मानते हैं तब ना बाराती के सौ-सौ आदमी को भोजन करती है । आज से आपका परिवार रिश्ते-नाते भी मेरा हुआ। एक हाथ जोड़ने से बहुत हाथ जुड जाता है। एक हाथ छूटने से बहुत हाथ छूट जाता है।

भानुप्रिया देवी
बाबा बैजनाथ धाम देवघर

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