मुझे आजाद कर दो

Laghukatha | मुझे आजाद कर दो

वेंटिलेटर पर पड़ी वह बार-बार एक ही बात बोले जा रही है
“मैं मर जाना चाहती हूं,प्लीज मुझे मर जाने दो।”
जिंदगी और मौत के बीच झूलती उस लड़की को जिंदगी से इस कदर नफरत हो गयी है कि अपने हाथों से ऑक्सीजन मास्क,तमाम नलियां नोचने की कोशिश कर रही है। नर्सें उसके दोनों हाथ पकड़ उसे काबू में लाने की कोशिश में बार-बार असफल हो जा रही हैं।
लाइफ सपोर्ट सिस्टम पे यह जो लड़की आज मौत की दुआयें मांग रही है 3 दिन पहले तक ऐसी नही थी। वह तो हमेशा हंसने-मुस्कराने वाली लड़की थी। कालेज का पहला साल और उम्र बमुश्किल 19 वर्ष।खूबसूरती ऐसी कि सहेलियां तक जल उठतीं थीं।
आईने के सामने खड़ी होकर वह आईना निहारती तो खुद ही शर्म से नजरें झुका लेती। उसके शर्माने से आईना तक आहें भर उठता था।उसे नही मालूम था कि इसी खूबसूरती की सजा उसे ताउम्र काटनी है।
कालेज का पहला साल नए दोस्तों,सपनों, उम्मीदों का साल होता है।रोशनी हर रोज सहेलियों संग बस से कालेज आती तो लगता मानो उसे मुंह मांगी मुराद मिल गयी है। बातें करते हुए वह कब कालेज पहुंच जातीं, पता ही नही चलता था।समय मानो पंख लगाकर उड़ रहा था।
कालेज में आये अभी 5 महीने भी नही हुए थे कि उस फूल सी लड़की पर किसी की नजरें गड़ गयीं। कालेज में उस दिन उसे अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ा।क्लास में वह आयी ही थी कि सबकी चुभती नजरों को खुद में पैवस्त होते देखा।
वह जब तक कुछ समझ पाती उसकी सहेली ने उसे ब्लैकबोर्ड की ओर इशारा किया। रोशनी ने बोर्ड की तरफ देखा तो सन्न रह गई।उसकी नजरें शर्म और गुस्से से झुक गयीं। वह एक भी शब्द बोले बिना धम्म से सीट पर जम गई।ब्लैकबोर्ड पर किसी ने बड़े-बड़े अक्षरों में “I LOVE YOU ROSHNI”लिखा था।
किसकी हिमाकत है, रोशनी यह न जान सकी।उसने तुरंत प्रिंसीपल से शिकायत की। काश कि तब ही कालेज प्रशासन इस पर एक्शन ले लेता।
उस दिन के बाद रोशनी के लिए ऐसी चीजें आम हो गईं।बिना नाम के खत,फूल,गिफ्ट उसे मिलने लगे।कौन है जो ऐसा जाहिलपना कर रहा था।वह सामने क्यों नही आ रहा था।
वह एक बार भी सामने दिख जाए तो वह उसका जबड़ा तोड़ दे। नौबत यहां तक आ पहुंची कि रोशनी का कालेज जाना पिता ने बन्द करवा दिया।अब वह सारा दिन घर पर ही रहती।किसी शोहदे,बिगड़े हुए शख्स ने एक हंसती-खेलती लड़की की दुनिया एक कमरे तक सीमित कर दी थी।
आखिर वह दिन भी आया जब उसने उस शख्स को देखा जिसकी हरकतों ने उसे तोड़ कर रख दिया था। वह सहेलियों संग यूनिवर्सिटी फॉर्म भरने कालेज आयी थी जब एकाएक वह शख्स उसके सामने नमूदार हुआ।
सांवली रंगत और उम्र में करीब 10 वर्ष बड़ा वह उस बस का हेल्पर राकेश था जिससे रोशनी कुछ महीने पहले तक कालेज आती थी।राकेश ने रोशनी का हाथ पकड़ अपने दिल की बात कही तो जवाब में रोशनी ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया था।
उस रोज बस इतना ही हुआ था। लेकिन क्या सच मे इतना ही हुआ था? कालेज से घर आई रोशनी सारी बातें पापा को बताकर फूट-फूट कर रोई थी। पिता ने उस शख्स की शिकायत पुलिस और कॉलेज प्रशासन से की तो कालेज प्रशासन ने राकेश को नौकरी से निकाल दिया था।
रोशनी का कालेज जाना पहले ही छूट चुका था अब घर से निकलना भी जाता रहा। एक अनजाना डर उसके जहन में बैठ चुका था।न मालूम किस राह वह शोहदा मिल जाये और फिर से कुछ गलत हरकत कर दे।
पुलिस में शिकायत किये करीब 1 महीना होने को था।रोशनी को पता चला था कि पुलिस उसे पकड़ ले गयी थी लेकिन यह पता नही था कि उसकी जिंदगी को नरक बनाने पे तुला वह शख्स अब आवारा सड़कों पर घूम रहा है।
इस बीच एग्जाम आये तो रोशनी परीक्षाएं देने कालेज जाने लगी।
                       और एक दिन
वह गर्मियों की भरी दोपहरी थी। पेपर खत्म हो चुका था।रोशनी अपनी 2 अन्य सहेलियों संग ऑटो के इंतजार में सड़क के किनारे खड़ी थी।सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन ही आ-जा रहे थे कि सामने से एक बाइक आती दिखी।
कपड़े से मुंह ढके बाइक सवार ठीक रोशनी के सामने आकर रुके।इससे पहले कि रोशनी कुछ समझ पाती, पीछे बैठे शख्स ने उसके चेहरे पर तेजाब उड़ेल दिया।रोशनी बिलखते हुए नीचे गिर पड़ी। बदकिस्मती ही थी वरना क्या जरूरत आन पड़ी थी कि ठीक उसी वक्त रोशनी दुपट्टे से ढके चेहरे को फिर से खोलकर बांधती।
                            ★★
उस घटना को बीते 2 वर्ष होने को हैं।रोशनी जिंदा है।वह अपनी बदकिस्मती मानती है कि अब भी जिंदा है।अब जिंदगी के प्रति उसका कोई लगाव नहीं।
उसके सारे सपने,उम्मीदें उसी दिन दम तोड़ चुके थे जिस दिन हॉस्पिटल से आने के बाद छुपकर उसने आईना देखा था। नही! वह अब खुद को रोशनी नही मानती। रोशनी उसी दिन मर गयी थी जिस दिन उस पर एसिड अटैक हुआ था।
अब रोशनी नही रोती है। उसके आंसू सूख चुके हैं या शायद अब रोने को बचे ही नहीं। अब रोना भी सुकून नही दे पाता।बस चुपचाप कमरे में पड़ी एकटक दीवार देखती रहती है।
उसी दीवार को जिसमे पहले हजारों सपने दिखते थे,अब कुछ नही दिखता सिवाय नाउम्मीदी, लाचारी और बोझ सी जिंदगी के। आंखे सूनी हुईं तो सामने की दीवार भी सूनी हो गयी। अंधेरे से डरने वाली रोशनी को अब उजाले से नफरत हो गयी है।
पिता के कहने पर पिछले महीने से उसने छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले बच्चे पास नही आते थे।डर जाते थे।अब आने लगे हैं। शायद उन्होंने भी रोशनी की तरह हालात से समझौता कर लिया है।
रोशनी बच्चों संग घुल मिल जाती है तो कुछ पलों के लिए अतीत भूल जाती है।हाँ! कभी हंस लेती है लेकिन ज्यादा देर तक हंस नही पाती। आंसू निकल आते हैं।वह  बेवक्त आये इन आंसुओं से नफरत करने लगी है।
वक्त अपनी रफ्तार से गुजर रहा है लेकिन रोशनी को अब इस वक्त से कोई सरोकार नहीं। हां! वह अब भी मां के साथ सोती है।उसे डर लगता है।अक्सर वह नींद में ही चौंक उठती है।
उसे लगता है एक काला सा आदमी उसके सिरहाने कोक की बोतल में तेजाब लिए खड़ा है। वह चौंक उठती है और फिर से आंखे मूंदने की कोशिश नही करती।
उसे डर है कि जैसे ही वह सोएगी सिरहाने खड़ा वह शख्स फिर से उस पर तेजाब उड़ेल देगा।वह आंखों ही आंखों में सारी रात गुजार देती है।
हां!वह अब भी भगवान से दुआ मांगती है, जीने की नही बल्कि मर जाने की….
“आँसुओ की गिरह से मुझे आबाद कर दो,
         थक गई हूँ, अब आजाद कर दो।
     जीने की राह में काँटे हैं बहुत,
            या रब्बा!मुझे गुमनाम कर दो।
       थक गई हूँ, अब मुझे आजाद कर दो।”

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