मैंने सीख लिया

मैंने सीख लिया

मैंने सीख लिया

मन के भावों को होंठों पर लाना मैंने सीख लिया
लफ़्फ़ाज़ी में लोगों को उलझाना मैंने सीख लिया

पहले थोड़ा डर लगता था फ़िर बेशर्मी ओढ़ी तो
खुलकर हर महफ़िल में आना-जाना मैंने सीख

सच्चाई में जीना मुश्किल अच्छे-अच्छे डूब गए
भर-भर थाली घोटालों से खाना मैंने सीख लिया

शेख़ असल हूँ पीना छोड़ो छूना तक मंज़ूर नहीं
बंद घरों में छुप हिस्से का जाम उठाना सीख लिया

रिश्तों की पाबंदी तोड़ी नाते सारे चूर किये
ख़ूब सफ़ाई से सबको बहकाना मैंने सीख लिया

देशपाल सिंह राघव ‘वाचाल’
गुरुग्राम महानगर
हरियाणा

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • खीचो बात बड़ी होती है | Baat Badi

    खीचो बात बड़ी होती है ( Kheecho baat badi hoti hai ) बहरे मीर वज़्न=== २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २   खींचो बात बड़ी होती है, छोडो तो ज़द टलती हैं I देख रवानी जीवन में बस दो बातो से चलती है II गिरती दीवारों का क़ायल शायद ही कोई होगा I…

  • शराब | Sharab

    शराब ( Sharab )    शराबियों की महफ़िल सजी हर जगह यारों, एक दूसरे को फायदा बताते हर जगह यारों। भूल कर भी कोई नुक्सान नहीं बताते है, कहते हैं कई बिमारियों को मिटाती है यारों। दवा का भी सम्मिलित काम करती है यह , सीमा में रह कर पीये और पिओ मापकर यारों। ज्यादा…

  • छुपा कर रक्खें

    छुपा कर रक्खें हो न जाए कहीं रुसवाई छुपा कर रक्खेंइन अमीरों से शनासाई छुपा कर रक्खें फ़ायदा कुछ नहीं चतुराई छुपा कर रक्खेंमूर्ख के सामने दानाई छुपा कर रक्खें कौन करता है यक़ीं आपकी इन बातों परइसलिए अपनी ये सच्चाई छुपा कर रक्खें लालची कोई भ्रमर इसको चुरा ले न कहींफूल कलियाँ सभी अँगड़ाई…

  • निगाहें मिलाकर | Ghazal Nigahen Mila Kar

    निगाहें मिलाकर ( Nigahen Mila Kar )   देखों ना सनम तुम यूँ नज़रे घुमाकर करों ना सितम यूँ निगाहें मिलाकर ! करोगी कत्ल तुम कई आशिको का, ये जलवें हसीं यार उनको दिखाकर ! घटाओं सी जुल्फ़े बनाती है कैदी, करोगी हमें क्या कैदी तुम बनाकर ! ज़रा सा ये दिल है इसे बख़्श…

  • एक दिलदार अपना | Ek Dildar Apna

    एक दिलदार अपना ( Ek Dildar Apna ) रखा है सहेजे हुए प्यार अपनाक़िताबों में गुल एक दिलदार अपना मुहब्बत कसौटी पे बिल्कुल ख़री हैतभी तो जताया है अधिकार अपना सनम देवता मैंने माना तुम्हीं कोकरो तुम भी इक रोज़ इज़हार अपना फ़लाने की बेटी सगी से भी बढ़करजो अस्मत लुटी दिल है बेज़ार अपना…

  • मीना भट्ट सिद्धार्थ की ग़ज़लें | Meena Bhatt Siddharth Poetry

    मुझको यारब न लाल-ओ- गुहर दीजिए मुझको यारब न लाल-ओ- गुहर दीजिएजो वतन पे हो कुर्बां वो सर दीजिए नफ़रतों का जहाँ पर बसेरा न होइक मुहब्बत का ऐसा नगर दीजिए जो गुज़रती हो दर से तुम्हारे सनमउस डगर का पता कुछ ख़बर दीजिए घर में वालिद से ही रौशनी है सदाउनकी छाया हमें उम्र…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *