मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत
( बाल कहानी )
मुकुल भैया, आयुष से 6 वर्ष बड़े थे। आयुष दसवीं कक्षा में पढ़ता था और वे M. A. कर रहे थे। वे बहुत घमंडी थे। उनको अपनी पढ़ाई पर बहुत घमंड था। वह अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते थे।
सभी को नीचा दिखाने की कोशिश करते थे। वह बच्चों से उल्टे सीधे सवाल करके, उनके द्वारा ना बताये जाने पर खूब मजाक उड़ाते थे और खूब परेशान करते थे। आयुष के साथ भी उन्होंने वही किया।
एक दिन आयुष उनके छोटे भाई व अपने सहपाठी विवेक से मिलने उनके घर गया। उन्होंने आयुष को देखा। उसे अपने पास बुलाया और पूछने लगे,
“कैसी चल रही है तुम्हारी पढ़ाई? किस क्लास में आ गए हो?”
“भैया दसवीं क्लास में”
“अच्छा साइंस ली है या आर्ट”
“भैया आर्ट ली है”
उन्होंने कहा, “गणित तो होगी ही तुम्हारे पास??”
“जी भैया”
फिर उन्होंने आयुष का टेस्ट लेने के लिए गणित के 5 सवाल करने के लिए दिए। उनमें से वह सिर्फ 2 सवाल ही हल कर पाया बाकी सवाल उसे कठिन लगे। उन्होंने उन सवालों को लेकर आयुष का बहुत मजाक बनाया और हतोत्साहित किया।
वे यहां पर भी नही रुके और आयुष से बोलने लगे,
“तू तो हो गया पास…. तेरे से तो इतने आसान सवाल हल ही न हो रहे… तेरे बसकी ना है पास होना…”
उस समय वाकई में दसवीं पास करना टेढ़ी खीर था। उनके कठोर वचनों ने आयुष के अंदर प्रेरक का काम किया और उसने अपनी कमियों पर व पढ़ाई पर काम किया। उसने कठिन परिश्रम किया। इसका परिणाम यह रहा कि वह अपने स्कूल में, अपनी कक्षा में सर्वोच्च अंको से पास हुआ। जब मुकुल भैया को पता चला कि आयुष ने स्कूल टॉप किया है तो उन्होंने उसकी मार्कशीट मंगवा कर कई बार देखी। उन्हें यकीन ही ना हुआ कि आयुष के इतने नम्बर कैसे आ गए। उन्होंने इसको तुक्का माना।
इसी तरह बाद में भी उन्होंने आयुष को जगह-जगह हतोत्साहित किया, परेशान किया लेकिन आयुष ने अपनी मेहनत, लगन और कठिन परिश्रम से एक बड़ा अधिकारी बनकर मुकुल भैया को, उनकी सोच को गलत साबित किया। आज मुकुल भैया भी आयुष का बहुत सम्मान करते हैं और उनकी मदद भी लेते हैं।
बच्चों, यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी निंदा को, बुराई को किस तरह से लेते हैं तथा अपने जीवन में उतारते हैं। हमें हमेशा अच्छे लोगों के संपर्क में रहना चाहिए। कदम-कदम पर आपको अपने लक्ष्य से भटकाने वाले लोग मिलेंगे। लेकिन आपको खुद पर, ईश्वर पर और अपनी मेहनत पर यकीन होना जरूरी है। इनकी मदद से आप असंभव लक्ष्य को भी संभव बनाकर सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
किसी ने ठीक ही कहा है:-
मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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