मन की पुकार

मन की पुकार | Man ki Pukar

मन की पुकार

हर धड़कन तेरे नाम से धड़कती है,
तेरी यादों की लौ दिल में चमकती है।
आज भी तेरी हंसी का दीवाना हूँ मैं,
तुझसे बेशुमार प्यार निभाना चाहता हूँ मैं।

तेरे कदमों की आहट अब भी सुनाई देती है,
मेरे ख्वाबों में हर रात तू ही दिखाई देती है।
तेरे बिना हर लम्हा अधूरा सा है मेरा,
आज भी मेरी आँखों में लौटने का इंतजार है तेरा।

तेरी तस्वीर से बातों का सिलसिला करता हूँ,
तेरे बिन हर खुशी से खुद को तरसा करता हूँ।
क्या तुझे भी मेरे ख्यालों की खबर आती है?
क्या तुझे भी मेरी मोहब्बत याद आती है?

ओ दिकु, मेरे दिल का हाल सुन ले,
इन बेबस लम्हों का मलाल सुन ले।
मैं तेरा था, तेरा हूँ, तेरा ही रहूँगा,
हर सांस के कतरे में नाम तेरा ही कहूँगा।

लौट आओ, मेरी दुआओं का असर हो,
इस बिछड़े दिल का फिर से सफर हो।
आज भी तेरी खुशबू से महकता हूँ मैं,
सुनो दिकु, तुझसे बेशुमार प्यार करता हूँ मैं।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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