man

मन | Man

मन

( Man ) 

 

मन की अशुद्धता मे प्रीत नही होती
मन की चंचलता मे जीत नही होती
मन की व्याकुलता मे गीत नही होती
मन की अस्थिरता मे संगीत नही होती

मन एक मध्य की स्थिति है
ज्ञान भाव से परे की प्रवृत्ति है
रंग,रूप,स्पर्श आदि से प्रभावित है
मन सब के लिए ही अनुत्तरित है

मन कल्पना का निवासी है
मन हर सुख का अभिलाषी है
मन भोगी और विलासी है
मन से ही मथुरा और काशी है

अंकुश मात्र ही मन का स्वामी है
दृढ़ता पर ही इसकी ना और हामी है
मन मतंग यह तो हर पथ गामी है
संयम,बुद्धि ,विवेक पर ही सलामी है

संभलकर ही सुनना बातें मन की
हरबार मिलती नही उपलब्धि तन की
आपके ही हांथ है डोर भी जीवन की
डूबा हर इंसान जो किया है मन की

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

 

सिर्फ | Sirf

Similar Posts

  • कान्हा इस युग में भी आना

    कान्हा इस युग में भी आना इस युग में भी आना कान्हा…, इस युग में भी आना … नहीं चाहिए मयुर पंख, न धुन बंसी मधुर बजाना … कान्हा ..इस युग में भी आना…। जगह जगह बिसात बिछाये, बैठे शकुनि घात लगाये, हाथ सुदर्शन चक्र लिए तुम चमत्कार दिखलाना…, कान्हा… साथ सुदर्शन लाना…, कान्हा ..इस…

  • बेवफाई | Bewafai

    बेवफाई ( Bewafai )    वक्त के धागे कभी, कमजोर नहीं होते तेरी यादों ने ही निभाई है, अपनी वफादारी बातों में छलावा था ,दिल में थी मक्कारी होठों की मुस्कान तेरी, महज थी एक अदाकारी दिए तेरे जख्मों के दर्द को, पीता हूँ सुबह शाम फरेब था तेरी चाहत में, मन में भरी थी…

  • जनता जनार्दन | Kavita Janta Janardan

    जनता जनार्दन ( Janta Janardan ) भोली भाली जनता भटक रही इधर उधर सीधी सादी जनता अटक रही इधर उधर बहुरुपिए बहका रहे बार-बार भेष बदल जाति जाल मे खटक रही इधर उधर नये इरादे नये वादे झूठे झांसों में झमूरे मदारी में मटक रही इधर उधर नोटंकी होती ग़रीबी हटाने की हर बार पांच…

  • एक चने ने

    एक चने ने मेरे आँगन नित्य सवेरे बुलबुल आती एकसच्च बोलो-सच बोलो की मधुर लगाती टेक मधुर लगाकर टेक मुझे हैरान करेकैसी खोटी बातें ये नादान करे झूठा और बेईमान भला सच कैसे बोलेज़हर बेचने वाला अमृत कैसे तौले मूरख पंछी मुझको कैसी सीख दे रहानहीं चाहिए बिन मांगे क्यों भीख दे रहा तेरी मीठी…

  • कौन बुझाये | Kavita Kaun Bujhaye

    कौन बुझाये! ( Kaun bujhaye )    दुश्मन जो आग लगाए पानी उसे बुझाये, पानी ही आग लगाए उसे कौन बुझाये।   माना यौवन के आगे न चलता जोर किसी का, मीठी-मीठी नजरों से जब होता कत्ल किसी का।   कोई थाम के बाँह को छोड़े कोई दूजा पार लगाए, जब दूजा ही बाँह को…

  • धरती | Muktak dharti

    धरती ( Dharti )   धरा मुस्कुराई गगन मुस्कुराया। खिल गए चेहरे चमन हरसाया। बहती बहारों में खुशबू यू आई। धरती पर चांद उतरकर आया।   धरती अंबर चांद सितारे। हिल मिलकर रहते सारे। वीर तिलक करके माटी का। पूजे माता चरण तुम्हारे।   कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन नवलगढ़ जिला झुंझुनू ( राजस्थान ) यह…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *