Meri Prarthana

मेरी प्रार्थना | Meri Prarthana

प्रार्थना

( Prarthana ) 

 

पर्वत  घाटी  ऋतु  वसंत  में

नभ थल जल में दिग्दिगंत में

भक्ति  भाव  और अंतर्मन में

सदा  निरंतर  आदि  अंत  में

 

          युगों युगों तक तुम्हीं अजेय हो,

          कण-कण में ही  तुम्हीं बसे हो।

 

सृष्टि  दृष्टि  हर  दिव्य  गुणों में

स्वर  अक्षर  हर  शब्द धुनों में

हम  सबमें  हर पतित दुखी में

दीन  –  हीन  हर  विद्वजनों में

 

          जन जन में भी तुम्हीं बसे हो

          कण कण में ही तुम्हीं बसे हो।

 

कीर्ति  तुम्हारी  फैली  जग में

हर  सांसों  में  तू  रग – रग में

धूप  छांव  में  अग्नि  वायु  में

जड़  चेतन  में  नर  विहंग  में

 

          दृष्टि  जहां  भी  वहीं  खड़े हो,

          कण- कण में ही तुम्हीं बसे हो।

 

 

रचनाकार रामबृक्ष बहादुरपुरी

( अम्बेडकरनगर )

यह भी पढ़ें :-

बचपन की यादें | Bachpan ki Yaadein

Similar Posts

  • विरासत | Virasat

    विरासत ( Virasat )    युद्ध और जंग से गुजरते इस दौर में – सड़कों पर चलते एंटी माइनिंग टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों की आवाज़ों के बीच- स्कूलों पर गिरती मिसाइलों से धराशायी होती इमारतों में मासूमों की चीख पुकार के बीच- आसमान में उड़ते अचूक फाइटर जहाजों की कर्णभेदी ध्वनि के बीच – ढहे…

  • समय का कालखंड | Kavita Samay ka Kalkhand

    समय का कालखंड ( Samay ka kalkhand )   समय की महत्ता जो समझे वही  है  बलवान, समय के संग चलनेवाला होता  है  धनवान। सु अवसर  पाकर जो कर्म से मुकर जाता है, वह अभागा है धरती पर जीवन भर पछताता है। समय ही करावत लड़ाई-झगड़ा बनावत राजा रंक फकीर, समय ही बनाता-बिगाड़ता रिश्ता और…

  • Kavita Bayaj Dar | ब्याज दर घटाने का फैसला वापस!

    ब्याज दर घटाने का फैसला वापस! ( Bayaj Dar Ghatane Ka Faisla Wapas )   निर्णय बदल लिया है, वित्त मंत्री ने ट्विटर कर जानकारी दिया है; सरकार ने ब्याज दर घटाने का फैसला वापस ले लिया है। पुरानी दरें रहेंगी बरक़रार, बधाई हो सरकार! वरना गरीबों की समस्याएं बढ़ती बेशुमार। बचत ही नहीं होती,…

  • नजरों का धोखा | Doha nazron ka dhokha

    नजरों का धोखा ( Nazron ka dhokha )   नजरें  धोखा  खा  गई, कैसी  चली  बयार। अपनापन भी खो गया, गायब सब संस्कार।   नजरों का धोखा हुआ, चकाचौंध सब देख। भूल गए प्रीत पुरानी, खोया ज्ञान विवेक।   नजरों का धोखा हमें, पग पग मिला अपार। धूल  झोंके  नयनों  में, वादों  की  भरमार।  …

  • माँ का भय

    माँ का भय मैंने बेटा जनाप्रसव पीड़ा भूल गयी वह धीरे-धीरे हँसने-रोने लगामैंने स्त्री होना बिसरा दिया उसने तुतली भाषा में माँ कहामैं हवा बनकर बहने लगी वह जवान हुआमैं उसके पैरों तले की मिट्टी वारती फिरूँ उसके सिर सेहरा बंधामुझे याद आयामैं भी एक रोज ब्याहकर आयी थीइसके पिता संग कुछ दिनों बाद मैंने…

  • ख्वाहिशों का बोझ | Poem khwahishon ka bojh

    ख्वाहिशों का बोझ! ( Khwahishon ka bojh )   पराई आग पे रोटी सेंकने नहीं आता, रेजा-रेजा मुझे बिखरने नहीं आता। कत्ल कर देती हैं वे अपनी नजरों से, इल्जाम उनपे मुझे लगाने नहीं आता। गुनाह की रेत में मत दबा मेरा वजूद, झूठ की आग में जलने नहीं आता। मत छीनों जरूरत की चीजें…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *