मुहब्बत में वफ़ा-परवर खड़े हैं

मुहब्बत में वफ़ा-परवर खड़े हैं

मुहब्बत में वफ़ा-परवर खड़े हैं

मुहब्बत में वफ़ा-परवर खड़े हैं
लगा के ताज को ठोकर खड़े हैं

न थामा हाथ भी बढ़कर किसी ने
यूँ तन्हा हम शिकस्ता-तर खड़े हैं

करूँ कैसे तुम्हारा मैं नज़ारा
ज़माने में सौ दीदा-वर खड़े हैं

शजर आता न कोई भी नज़र अब
बशर सब धूप में थक -कर खड़े हैं

मिरे ज़हनो गुमाँ में आज तक भी
तिरी यादों के वो लश्कर खड़े हैं

तमाशा देखने मुफ़लिस का यारो
ज़मी क्या सात ये अम्बर खड़े हैं

सदा आई थी “मीना” जिसके घर से
अभी तक हम उसी दर पर खड़े हैं

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • खेल ये है तमाम रोटी का | Roti

    खेल ये है तमाम रोटी का ! ( Khel ye hai tamam roti ka )    सबसे ऊँचा मुक़ाम रोटी का हर कोई है गुलाम रोटी का अर्ज़ है सबके वास्ते कर दे ऐ ख़ुदा इंतज़ाम रोटी का मुफ़लिसों के लबों पे रहता है ज़िक्र बस सुब्ह ओ शाम रोटी का और कोई न कर…

  • हमको कभी

    हमको कभी हमको कभी ख़ुशियों का भी मंज़र नहीं मिलतादिल को मिले सुकूँ वो मुकद्दर नहीं मिलता शिद्दत से जो चाहे वही दिलबर नहीं मिलताजो ज़ख़्म मेरे सी दे रफ़ूगर नहीं मिलता रहने को ग़रीबों को कभी घर नहीं मिलतादे दे उन्हें जो छाँव वो छप्पर नहीं मिलता जो राह दिखाते थे सदा ज़ीस्त में…

  • मुक़द्दर से सामना है मेरा | Muqaddar se Samna hai Mera

    मुक़द्दर से सामना है मेरा ( Muqaddar se Samna hai Mera ) बड़े अजीब से मंज़र से सामना है मेरा बग़ैर कश्ती समुंदर से सामना है मेरा जहाँ जलाई गईं हसरतें मेरे दिल की उसी चराग़ उसी दर से सामना है मेरा अजीब दिल की ये हालत है क्या बताऊं तुम्हें किसी हसीन के पत्थर…

  • नज़र नहीं आता | Nazar Nahi Aata

    नज़र नहीं आता ( Nazar nahi aata )   वो मुझे कहीं भी अब तो नज़र नहीं आता ? यूं सकून दिल को मेरे मगर नहीं आता वो सनम न जानें मेरा किस हाल में होगा कोई भी उसी की लेकर ख़बर नहीं आता ए ख़ुदा बता क्या ग़लती हुई मुझी से है क्यों मगर…

  • वो नहीं ज़िद ठानता | Zid Shayari

    वो नहीं ज़िद ठानता ( Wo nahi zid thanta )    वो नहीं ज़िद ठानता तो मुख़्तलिफ हालात होते इस चमन में ग़ुल भी खिलता महकते लम्हात होते। अब बहुत ही मुख़्तसर सी गुफ़्तगू होती हमारी दिन हुए कुछ इस तरह रस्म़न ज़रा सी बात होते। जीतने की थी हमें आदत मगर अब हाल है…

  • बेहाल हर घड़ी | Behal har Ghadi

    बेहाल हर घड़ी ( Behal har ghadi )   बेहाल हर घड़ी बड़ी बेचैन जान है ये इश्क जानिए कि कड़ा इम्तिहान है। हैं मस अले तमाम ख़फा तिस पे वो हुए सर पर उठा के रखा हुआ आसमान है। सब मानते वो शख़्स नहीं ठीक है मगर हर दिल अज़ीज़ यूं है के मीठी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *