मुह़ब्बत | Muhabbat

मुह़ब्बत

( Muhabbat )

न हीरों की खानें,न पन्नों के पर्बत।
मुह़ब्बत से बढ़ कर नहीं कोई दौलत।

बिना इसके कुछ भी नहीं ज़िन्दगी में।
न हो यह तो क्या लुत्फ़ है बन्दगी में।
यही चैन देती है हर इक नज़र को।
इसी से चमकती है इन्सां की क़िस्मत।
मुह़ब्बत से बढ़कर नहीं कोई दौलत।

इसी के सना ख़्वॉं हैं अहले क़लम सब।
इसी से हैं आबाद दैर-ओ-ह़रम सब।
सुकूं इससे मिलता है ज़ह्न-ओ-जिगर को।
यही है हर इक अहले दिल की ज़रूरत।
मुह़ब्बत से बढ़ कर नहीं कोई दौलत।

यही हीर रांझे के दिल की दुआ़ है।
यही शीरीं फ़रहाद की इल्तिजा है।
इसी से हैं सोनी-महिवाल ज़िन्दा।
इसी से मिली लैला मजनू को शौहरत।
मुह़ब्बत से बढ़ कर नहीं कोई दौलत।

नहीं इसके जैसी कोई शय जहां में।
इसी की झलक है ज़मीं आसमां में।
फ़राज़ इसकी बारे क्या-क्या लिखें हम।
इसी से ही है यह जहॉं रश्के जन्नत।
मुह़ब्बत से बढ़ कर नहीं कोई दौलत।

न हीरों की खानें,न पन्नों के पर्बत।
मुह़ब्बत से बढ़ कर नहीं कोई दौलत।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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