Mumbai ki Barsaat

मुंबई की बरसात | Mumbai ki Barsaat

किस्सा उस समय का है जब मुंबई बम्बई हुआ करती थी। मेरी दीदी की शादी 1984 में मुंबई के एक परिवार में हुई थी। उस समय दिल्ली से अगर मुंबई जाना होता था तो हफ्तों, महीनों पहले प्रोग्राम तय करना होता था।

फोन आदि भी नहीं होते थे। मेरी उन दिनों संचार मंत्रालय में नयी नयी नौकरी लगी थी और मेरे पास अंतरराज्यीय टेलीफोन लाइन की सुविधा थी तो मेरी करीब दो एक दिन में दीदी से बातचीत हो जाती थी पर दीदी से मिलकर उनका हालचाल जानने को उत्सुक रहते थे हम सब।

तो दीदी की शादी के करीब सालभर बाद हमने दीदी से मिलने जाने का प्रोग्राम बनाया और राजधानी एक्सप्रेस से मुंबई पहुंचे। तब वहां बरसात का मौसम चल रहा था। मुंबई में बरसात के बहुत किस्से सुनते थे हम दीदी से। मुंबई में बरसात के मौसम को सुहाना मौसम तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता।

पूरा वातावरण चिपचिपी नमी से भरा हुआ था। हम दीदी के साथ घर में ही बंद रहे वहां, बरसात की वजह से कहीं घूमने भी नहीं जा सकते थे। दीदी के लिए मम्मी बहुत सारी मिठाई और नमकीन आदि लेकर गईं थी वो सब भी सील कर खराब हो गया था।

हमारा सारा उत्साह खत्म हो गया था, बस ये तसल्ली थी कि शादी के बाद दीदी की खैर खबर ली और उनके साथ रहे कुछ दिन। हमने वापिस आने की टिकट तो पहले ही करवाई हुई थी तो तय दिन‌ पर हमने वापिस दिल्ली आने की तैयारी कर ली। दीदी नवी मुंबई में रहती थी जो स्टेशन से काफी दूर था।

हमारी ट्रेन शाम के चार बजे की थी पर जीजा जी ने आगाह किया कि बारिश के चलते यहां रास्ते बंद होने का खतरा रहता है इसलिए हमें जल्दी से जल्दी स्टेशन के लिए निकल जाना चाहिए।

चार बजे की ट्रेन पकड़ने के लिए हमें स्टेशन तक एक घंटे का रास्ता तय करना था पर हम सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुबह दस बजे ही घर से निकल गये। बारिश की तो ऐसी झड़ी लगी थी कि रुकना तो क्या कम होने का भी नाम नहीं ले रही थी ।

हमें कोई टैक्सी आटो नहीं मिल पाया तो हमने बस में स्टेशन तक पहुंचना तय किया। ट्रेन पकड़ने के लिए हमारे पास काफी समय था।

बस में बैठकर हम स्टेशन की ओर रवाना हुए पर ये क्या बारिश के चलते सड़क पानी में डूबीं थी और बस ड्राइवर बस का रूट बदल बदल कर गंतव्य तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था पर सभी रास्तों पर यही हाल था।

दो ढाई घंटे मुंबई की परिक्रमा कराकर बस ने हमें पानी से लबालब रास्ते पर किसी अंजान जगह छोड़ दिया। मैं मम्मी पापा और छोटे भाई के साथ सामान उठाए सड़कों पर भटक रही थी कि कैसे स्टेशन पहुंचा जाए।

किसी ने हमें खचाखच भरे ट्रक में चढ़कर स्टेशन पंहुचने की सलाह दी और उस कोशिश में मम्मी ट्रक में ना चढ़ पाने के कारण गिरते गिरते बचीं। मैंने अपने दोनों कंधों पर बड़े बड़े बैग टांग रखें थे और मम्मी को संभालते संभालते बारिश में सड़कों पर भटक रही थी।

पापा और मेरा भाई रास्ता खोजते खोजते आगे आगे चल रहे थे। सारे पैसे और ट्रेन के टिकट भी मेरे ही पास थे। तभी मेरी नज़र सड़क पर घूमते पानी के भंवर पर पड़ी, पापा आगे चल रहे थे और शायद वो जल्दी में उसे देख नहीं पा रहे थे।

मुझे समझते देर नहीं लगी कि वहां कोई सीवर खुला पड़ा है और घुटनों से ऊपर तक सड़क पर भरे पानी की वजह से दिखाई नहीं पड़ रहा। मैं मम्मी का हाथ छोड़कर लगभग चिल्लाती हुई पापा को बचाने भागी।

पापा को मैंने वहां से दूर धकेल दिया पर इसी दौरान मैं किसी चीज़ से टकराईं और सीधे सीवर के अंदर गिर गई। सौभाग्यवश मेरे दोनों हाथ सड़क पर टिके हुए थे और मैं दर्द से चिल्ला रही थी तो कुछ लोगों ने मुझे आकर बाहर निकाला पर मैं चल‌ नहीं पा रही थी क्योंकि मेरी टांग की हड्डी टूट गई थी सीवर के ढक्कन से टकराकर जो वहीं सीवर के बाहर पड़ा था।

मेरे पापा ने बड़ी मिन्नत करके एक आटो वाले को अस्पताल पहुंचाने को कहा। वो दूगने तिगने पैसे लेकर चलने को तैयार तो हुआ पर सिर्फ दो ही सवारी को ले चलने को तैयार हुआ।तो पापा मुझे लेकर अस्पताल पहुंचे और मम्मी और भाई पैदल चलते हुए रास्ता खोजते खोजते अस्पताल पहुंचे।

वहां भीषण बरसात की वजह से अस्पताल में पावर कट हो गया था और कोई डाक्टर मुझे देखने तक नहीं पहुंचा। पावर कट के चलते परीक्षण भी नहीं हो पा रहा था।

उधर ट्रेन का टाइम हो चला था। पापा अस्पताल स्टाफ की मदद से मेरी टांग को बांध कर मुझे कंधे पर उठाकर चल पड़े स्टेशन की तरफ। स्टेशन पहुंच कर देखा पूरा स्टेशन और ट्रेन सब पानी में डूबे थे और कोई ट्रेन नहीं चल रही थी।

जैसे तैसे स्टेशन के ऊपर की तरफ पहुंच कर पापा ने हमें सामान के साथ बिठाया और पता करने गए कि कैसे दिल्ली पहुंचा जाए। पता चला कि इस स्टेशन से कोई ट्रेन अगले दिन तक नहीं चलने वाली थी पर वहां से पांच किलोमीटर दूर किसी और स्टेशन से ट्रेन चलेगी।

टांग बांध देने से दर्द कुछ कम हुआ तो मैं पापा और भाई का सहारा लेकर चलने लगी और‌ हम स्टेशन से बाहर आए। बारिश कुछ कम हो गई थी और संयोगवश एक टैक्सी वाला हमें ले जाने के लिए तैयार हो गया और हम स्टेशन पहुंचे पर वहां जाकर पता चला ट्रेन अगली सुबह चलेगी।

हम‌ भूख प्यास और थकान से बेहाल थे और कहीं भी जाने की हिम्मत नहीं थी तो यही तय किया कि स्टेशन पर ही रात काटी जाए और अगली सुबह घर के लिए निकला जाए। वहीं जमीन पर चादर बिछा कर हमने रात काटी और सुबह घर की और‌ रवाना हुए।

ये किस्सा आज भी जब याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि मैंने मौत को इतने करीब से देखा था कि मुझे लगा था कि मैं बह गई होती अगर मेरे कंधों पर बैग ना टंगे होते और‌‌ मेरे हाथ सड़क पर ना टिक जाते।

क्योंकि घर पहुंचने के बाद जब दीदी को सब पता चला तो दीदी ने बताया कि ऐसी दुर्घटनाएं वहां बरसात में अक्सर होती रहती हैं और लोग समुन्द्र में बह जाते हैं सीवर से डूबते हुए। हमने तो कसम खायी कि कभी बरसात के मौसम में मुंबई नहीं जाएंगे।

घर पहुंचने के बाद भी हम सब डरे हुए थे और मेरे भाई जो तब काफी छोटा था को तो डर था कि अगर मैं डूब गई होती तो वो सब घर कैसे पहुंचते क्योंकि टिकटें और पैसे तो मेरे पास थे।

ये बात मेरा भाई अक्सर याद करता है और बोलता है कि जब भी कभी यात्रा पर जाओ तो सब पैसे एक जगह मत रखो कि अगर कोई दुर्घटना हो तो सुरक्षित गंतव्य पर पहुंच सकें।

अपनापन

शिखा खुराना

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