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नवीन मद्धेशिया की कविताएं | Navin Maddheshiya Poetry

तेरी कलम तलवार बनेगी

तेरी कलम तलवार बनेगी
मेरी कलम दवा बनेगी
बह रहे हैं जो आंसू इस गलफत में
मेरी कलम दुआ बनेगी

करेगी असर मेरी दूआ

करेगी असर मेरी दूआ
इतना है यकीं मुझे
मानो ना मानो यारों
खुद पर है यकीन मुझे
मैं गफलतों की बातें ना करता
अंदाज मेरा है यही
बातें होंगी फैसले भी होंगे
तु कर इंतजार अभी

तुमसे प्यार और भी बेहिसाब करना है

तुमसे प्यार और भी बेहिसाब करना है
तुम्हारी ख़ूबसूरती पर एक किताब लिखना है

प्रिय ,
तुमसे मिलना है
और अपनी जिंदगी महकाकर
तुम्हे गुलाब की तरह रखना है

राम राम सिर्फ राम राम नहीं होता

राम राम सिर्फ राम राम नहीं होता
राम राम एक संस्कार है
एक मर्यादा है एक विचार है

जब कोई कहता है राम राम भैया
तो है जानना चाहता है कि आप कैसे हैं

जब कोई कहता है राम राम भैया
तब वह चाहता है कि दो मिनट भागम भाग से निकलकर बैठिए मेरे पास

जब कोई राम राम कहता है
तू चाहता है कि जीवन में दो पल आप राम को याद करें
इसलिए जब भी कोई कहे राम राम
तो आप भी कहना राम राम

तो फिर चलता हूं आप सभी को राम-राम भैया

अरे वक्त

अरे वक्त
मुझसे क्यों खेल रहे हो
मुझे रुला रहे हो या खुद झेल रहे हो
अरे वक्त मुझसे क्यों खेल रहे हो

मेरे द्वारा किए गए कार्य मुझे याद है
जीवन में जो कुछ भी झेला वो सब मुझे याद है
वक्त बेवक्त मुझसे आंखें क्यों फेर रहे हो
अरे वक्त मुझसे क्यों खेल रहे हो

कहने को थे गिनती में बस कुछ मेरे
उनको भी तुमने ना छोड़ा
थे जो पास अभी तक मेरे
उनको भी तुमने ना छोड़ा
वक्त दर वक्त मुझे क्यों रुला रहे हो
अरे वक्त मुझसे क्यों खेल रहे हो
ऐ वक्त मुझसे क्यों खेल रहे हो

शहद जैसी तेरी बातों में

शहद जैसी तेरी बातों में खो जाऊं तो ना कहना
समंदर जैसे तेरे ख्यालों में डुब जाऊं तो ना कहना
ना कहना तेरी याद में गर बह जाऊ तो ना कहना

खिले हुए इन फूलों को
अपने प्यार से महका जाऊं तो ना कहना
हां ना कहना तेरी खुबसूरती में चार चांद लगा जाऊं तो ना कहना

तेरे हाथों की मेंहदी से सवर जाऊं तो ना कहना
ना कहना गर कड़कती धूप में सावन की याद दिला जाऊं तो ना कहना
हां प्यार भरी बातों में तुझे स्वर्ग दिखला आऊं तो ना कहना
हां शहद जैसी जज्बातों में खुद ही खो जाऊं तो ना कहना

कभी फुर्सत में बैठो मेरे

कभी फुर्सत में बैठो मेरे
सुनाऊं तुम्हें अजब कहानी

ना कोई राजा ना कोई रानी
तेरे और मेरे जीवन की कहानी

कभी फुर्सत में बैठो
सुनाऊं तुम्हें अजब कहानी

जिंदगी हसती है हम पर
जिंदगी रोती है मुझ पर

दो पल की जिंदगी की
बस यही कहानी

कभी फुर्सत में बैठो
सुनाऊं तुम्हें अजब कहानी

ना राजा रानी
ना कोई प्रेम कहानी
तेरे और मेरे जीवन की कहानी

उफ़ ये गर्मी

कहते हैं दोषी हूं मैं भी
इस विहंगम दृश्य का साक्षी हूं मैं भी
कांटा है वृक्ष जो
सबको मिलकर लगाना है
इस प्राकृतिक आपदा को
मिलकर दूर भगाना है

था यह पूछना उनसे कि
वृक्ष क्या मैंने कटवाए
चलो लगा लूं एक वृक्ष मै भी
क्या इसे प्रकृति बच जाए

काटे हैं वृक्ष जिसने
वह मौन धारण क्यों है
प्रकृति बचाने में
वह शामिल नहीं क्यों है

उसे नृपति की इच्छा शक्ति से
प्राकृतिक आपदा क्या कहलाए
काटा है वृक्ष जिसने
वह क्यों नहीं वृक्ष लगाएं

उन्नति के चक्कर में
हमें यह विशाल तोहफा दिया
पूछेंगे अगला वंशज
हमने यह क्यों किया

हमें तो अब जैसे तैसे
यह जीवन जीना है
अपने आने वाले वंशजों को
यह अभिशाप देना है

थे हजारों सालों से खड़े जो वृक्ष
निर्दता से हनन किया
लगा अभिशाप उनका ही
यह समस्या जो उत्पन्न हुआ

नहीं बच पाएंगे इस समस्या से
राजनीतिक इच्छा शक्ति नहीं जब तक आती है
मुद्दा प्रकृति के बचाने का
सामने नहीं आती है

अब तो यूं ही जीना है
घुट घुट जहर पीना है
देख दशा प्रकृति का
व्यथित मन अब जीना है

वफ़ा

जिससे किया वफा
ओ बेवफा निकली
खाती थी कसम जो
एक पल की हवा निकली

जिससे किया वफा
ओ बेवफा निकली
लहरें थी जब साथ मेरे
कश्तियां साथ-साथ रहीं
हवा हुई विपरीत जब
वह भी पलट गई

जिससे किया वफा
वह बेवफा निकली
ए समंदर यूं ही नमकीन नहीं होगा
रोया होगा आसमान भी नवीन गम से

सोचता हूं जिंदगी के खेल भी बड़े निराले होते हैं
मिलती नहीं राधा कभी अपने श्याम से

हे मां

यूं तो कहनें को तो कुछ भी नहीं
पर बहुत कुछ उथल-पुथल हों रहा मेरे भीतर मां
मुझे है यकीं
तु रहतीं तो थाम लेती मुझे
अपने सीने से लगा
दामन में छिपा लेती मुझे
पर अब सब कुछ अकेले झेलना पड़ता है मां
रोता हूं तो अपने हाथ से ही आंसू पोछना पड़ता है
कहने को तो सब कुछ है मेरे पास
पर होने को कुछ भी नहीं मां
मुझे है यकीं
आओगी जरूर मां
मेरी हालात सुनोगी तो
तुम भी मचल जाओगी मां
मुझे अब भी तेरा इंतज़ार रहता है
तुम मिलोगी हमसे मेरा दिल कहता है
आयेगा वह भी एक दिन
जब तुम होगी मेरे पास
तेरे गोंद में सर रख कर
सो जाऊंगा तेरे पास

आज काफी दिनों बाद

आज काफी दिनों बाद सुबह सुबह उठा
देखा फिर सुबह को मुस्कुराते
वहीं स्वर्णिम लाली सुबह की
वहीं पक्षियों को इतराते

जीवन के इस भागम भाग में
छुट चुका है बहुत कुछ
चिड़ियों के आवाज़ की नकल
और कच्चे आमों को पाने की लालसा

यह इक्तिफाकन रहा दो घण्टे मेरे मानस में
फिर वही स्वार्थीपन
फिर वही जिम्मेदार मन

मैं क़लम हूं

स्वेत रुप है मेरी काया
भेद छल से दूर हूं मैं
निश्छल है मेरी काया
इतिहास लिखा नन्हे कदमों से
भविष्य भी हूं मैं तुम्हारा
हां मैं क़लम हूं

बच्चों का दोस्त हूं मैं
दिलाता हूं उन्हें सफलता प्यारा
जो बिगड़ें बोल बोले कोई
तो कालदण्ड हूं मैं तुम्हारा
हां मैं क़लम हूं
हां मैं कलमकार हूं

त्यौहार है खुशियों का

त्यौहार है खुशियों का
जब सारे रंग मिलते हैं
उल्लास हर्ष उमंग से सब गले मिल जाते हैं
गुजिया पूरी पकौड़ी खीर
हर घर को महकाते हैं

है त्यौहार है खुशियों का
जब सारे रंग मिल जाते हैं
है यह एक दिन जो
सब एक जैसे हो जाते हैं
रंग रूप भेदभाव
जैसे धरती से खो जाते हैं

है त्यौहार है खुशियों का
जब सारे रंग मिल जाते हैं
देख देख एक दूजे को
सहज ही मुस्कुराते हैं
है त्यौहार खुशियों का
हर कलम नवीन रंग मुस्काते हैं

उगते हुए सूरज को सबने देखा

उगते हुए सूरज को सबने देखा
सलाम किया उसकी काबिलियत पर
किसी ने गर्व से
किया ने जलन भरी नजरों के साथ
पर किसी ने भी उसकी पीड़ा को नहीं देखा
जो जल रहा है कई युगों से
और तड़प रहा है बेमानी अभिशाप से
इसी तड़प और पीड़ा से छलके आंसुओं से
ध्वलित होकर
बन गया है वह सूरज
जो दे रहा है उजाला सबके जीवन में
खुद ही जलकर

यही सोच इतराए

देख कलियन को भौंरा मंद मंद मुस्काए
आलिंगन करने को रहे आतुर
यही सोच इतराए

भंवरे की चंचल मन से
कलियां भी बहक जाए
आलिंगन सुख से सींचित होकर
खुद ही खुद इतराए

दोनों के सुख प्रेम से मोहित
बगिया भी महक मस्ताए
देख प्रकृति पल्लवित पुष्पित
“नवीन ” हतप्रभ रह जाए

बीता साल

स्वर्णिम आभा छाई है नए सपने लाई है

उत्साह का किरण जल रहा है नवीन सपने लेकर

नया साल आया है नई खुशियां लेकर

जो रीति गई वह बीत गई

अब क्या पछताना उनको लेकर

नया साल आया है नई खुशियां लेकर

दुख की काली अधियारी थी जो

वह अब बीत चुकी है

सुख की नव पुष्पित पलवित

हर्षित हो अब खिल चुकी है

फिर क्यों बहाना आंसू काले अतीत को लेकर

नया साल आया है नई खुशियां लेकर

हां दुआ नवीन की यह साल आए

आपके जीवन में नई सुबह लेकर

नया साल आया है नई खुशियां लेकर

हां नया साल आया है आपके लिए नई खुशियां लेकर

बुनियाद

बुनियाद हिल चुकी है उनकी
बचा है केवल खोखलापन
पहले चलता था रौब पुरे गांव में
अब बने हैं मेहमान खुद के घर में

था गुमान अपनों के अपनेपन पर
अब बहा रहे है आंसु
खुद के तन मन पर

अब नहीं है कोई
सुधि लेने को
बह रहें हैं आंसु
अपने ही चिराग से

हां बुनियाद उनकी अब हील चुकी
अपने ही चिराग से

दो जून की रोटी कमाने में

दो जून की रोटी कमाने में ज़िन्दगी बीत गई
लम्हा निकल गया उमर बीत गई
दो जून की रोटी कमाने में जिंदगी बीत गए

देखना था बच्चों को उन्हें बड़े होते हुए
घर की लक्ष्मी को घर सहेजते हुए
बीत गया बहुत दिन मुस्कुराए हुए।
ज़िन्दगी बीत गयी दो जून की रोटी कमाने मे

बहुत दिन हुआ दोस्तों के साथ बैठे हुए
कुछ अपनी और कुछ उनकी बातें सुनाने में
दोस्तों के साथ कुछ ठहाका लगाने में।
सपना हुआ वह इस पैसे के कमाने।में
ज़िन्दगी खत्म हो गयी।इस दो जून रोटी कमाने में

त्यौहार है खुशियों का

त्यौहार है खुशियों का
जब सारे रंग मिलते हैं
उल्लास हर्ष उमंग से सब

गले मिल जाते हैं
गुजिया पूरी पकौड़ी खीर
हर घर को महकाते हैं

है त्यौहार है खुशियों का
जब सारे रंग मिल जाते हैं
है यह एक दिन जो
सब एक जैसे हो जाते हैं
रंग रूप भेदभाव
जैसे धरती से खो जाते हैं

है त्यौहार है खुशियों का
जब सारे रंग मिल जाते हैं
देख देख एक दूजे को
सहज ही मुस्कुराते हैं
है त्यौहार खुशियों का
हर कलम नवीन रंग मुस्काते हैं

स्वर्णिम आभा छाई है

स्वर्णिम आभा छाई है नए सपने लाई है
उत्साह का किरण जल रहा है नवीन सपने लेकर
नया साल आया है नई खुशियां लेकर

जो रीति गई वह बीत गई
अब क्या पछताना उनको लेकर
नया साल आया है नई खुशियां लेकर

दुख की काली अधियारी थी जो
वह अब बीत चुकी है
सुख की नव पुष्पित पलवित
हर्षित हो अब खिल चुकी है
फिर क्यों बहाना आंसू काले अतीत को लेकर
नया साल आया है नई खुशियां लेकर

हां दुआ नवीन की यह साल आए
आपके जीवन में नई सुबह लेकर
नया साल आया है नई खुशियां लेकर
हां नया साल आया है आपके लिए नई खुशियां लेकर

आज काफी दिनों बाद

आज काफी दिनों बाद सुबह सुबह उठा
देखा फिर सुबह को मुस्कुराते
वहीं स्वर्णिम लाली सुबह की
वहीं पक्षियों को इतराते

जीवन के इस भागम भाग में
छुट चुका है बहुत कुछ
चिड़ियों के आवाज़ की नकल
और कच्चे आमों को पाने की लालसा

यह इक्तिफाकन रहा दो घण्टे मेरे मानस में
फिर वही स्वार्थीपन
फिर वही जिम्मेदार मन

मैं क़लम हूं

स्वेत रुप है मेरी काया
भेद छल से दूर हूं मैं
निश्छल है मेरी काया
इतिहास लिखा नन्हे कदमों से
भविष्य भी हूं मैं तुम्हारा
हां मैं क़लम हूं

बच्चों का दोस्त हूं मैं
दिलाता हूं उन्हें सफलता प्यारा
जो बिगड़ें बोल बोले कोई
तो कालदण्ड हूं मैं तुम्हारा
हां मैं क़लम हूं
हां मैं कलमकार हूं

राम राम

राम राम सिर्फ राम राम नहीं होता
राम राम एक संस्कार है
एक मर्यादा है एक विचार है

जब कोई कहता है राम राम भैया
तो है जानना चाहता है कि आप कैसे हैं

जब कोई कहता है राम राम भैया
तब वह चाहता है कि दो मिनट भागम भाग से निकलकर बैठिए मेरे पास

जब कोई राम राम कहता है
तू चाहता है कि जीवन में दो पल आप राम को याद करें
इसलिए जब भी कोई कहे राम राम
तो आप भी कहना राम राम

दो जून की रोटी

दो जून की रोटी कमाने में ज़िन्दगी बीत गई
लम्हा निकल गया उमर बीत गई
दो जून की रोटी कमाने में जिंदगी बीत गए

देखना था बच्चों को उन्हें बड़े होते हुए
घर की लक्ष्मी को घर सहेजते हुए
बीत गया बहुत दिन मुस्कुराए हुए।
ज़िन्दगी बीत गयी दो जून की रोटी कमाने मे

बहुत दिन हुआ दोस्तों के साथ बैठे हुए
कुछ अपनी और कुछ उनकी बातें सुनाने में
दोस्तों के साथ कुछ ठहाका लगाने में।
सपना हुआ वह इस पैसे के कमाने।में
ज़िन्दगी खत्म हो गयी।इस दो जून रोटी कमाने में

नमन है ईश्वर तुमको

नमन है ईश्वर तुमको
नमन है परमेश्वर तुमको
बादल में तुम ही बरसे
प्रकृति में सरस ही हरसे
चिड़ियों की चीची में तुम हो
झरने की झर झर में तुम हो
मुझ में भी तुम हो
तुझ में भी तुम हो
सर्वत्र प्रकृति में तुम ही तुम हो
नमन है ईश्वर
नमन है परमेश्वर

मां

तुम मां हो
मेरे जीवन की आधार हो
हां मां तुम मेरी मां हो

जिसने भटकें लड़कें को
रास्ता दिखाया
खुद खाई मार पर
मुझे आंचल में छिपाया
कोई ना समझा
कि आखिर तुम क्या हो
हां मां तुम मेरी मां हो

अपने हाथ से दाना खिलाती रही
खुद कम मुझे दो कौर ज्यादा खिलाती रही
मेरी शरारतों से ना निकाली तुम आह हों
हां मां तुम मेरी मां हो
हां सिर्फ तुम मां हो

कुछ अनकही बाते

किया था इश्क रुह से
पुजा था ईश्वर सा
रखना चाहा था फुल सा
पर मंजिलें छुट गई
मुसाफिर रुठ गया

दर्द दर्द की ना सुनी
विचार विचार को ना भाया
बिलखते रहा खुदा यु ही
पर खुद ही सुध ना आया
फिर मंजिलें छुट गई
मुसाफिर रुठ गया

जब थे फूल और कली एक ही
फिर नवीन ख्वाब क्यों ना आया
ख्वाहिश पंक्षी का उड़ना था तो
ज़मीं का एहसास क्यों जगाया
जब थे दोनों रुह एक ही
फिर मंजिलें क्यों छुट गई
मुसाफिर क्यों रुठ गया

नवीन मद्धेशिया

गोरखपुर, ( उत्तर प्रदेश )

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