Ooni kapda par kavita

ऊन का चोला | Ooni kapda par kavita

ऊन का चोला

( Oon ka chola) 

 

 

यह बदन है सभी का भैया मिट्टी का ढेला,

ना जानें कब हो जाऍं किसका फिसलना।

शर्म ना कर प्राणी पहन ले ऊन का चोला,

बिठूर रहा है बदन जरा संभलकर चलना।।

 

पहनकर घूमना फिर चलना चाहें अकेला,

हॅंसना-हॅंसाना पहनकर फिर तू उछलना।

न करना इसमें शर्म न घमण्ड तुझे करना,

स्वेटर जर्सी कोट चाहें जैकिट तू पहनना।।

 

इस ठंडी हवा से आज सभी को है बचना,

फ़ालतू आना जाना कोई कही ना करना।

करना है रोज़ाना सबको सवेरे-सवेरे योग,

अच्छे ऐसे विचारों को सुनना व समझना।।

 

फ़ैशन की बिमारी न पालनी है किसी को,

समझा रहें है यारों सम्भलना है सभी को।

बचना-बचाना है ठंड से खुद व बच्चों को,

पैग़ाम हम दे रहे है पहनें ऊनी कपड़े को।।

 

ऐसे जाड़े में धूप सबको लगती है सुहानी,

किन्तु बिन धूप के याद आती है ये नानी।

बच्चें बुड्ढे जवान अथवा हो वह पहलवान,

आनंद देता है जाड़े में धूप एवं गर्म पानी।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

 

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