पछतावा

पछतावा

पछतावा

***

नहीं हो सका तुझसे
कुछ भी अच्छा!
रहा बच्चा का बच्चा,
दिल का सादा और सच्चा।
ईर्ष्या द्वेष वैमनस्य न जाना,
ज़माने की दस्तूर न माना;
देते हैं लोग अब ताना।
मूर्ख ! तू इतना भी न जाना?
छल कपट का है जमाना।
कुछ कराने को ‘कुछ’ करना पड़ता है,
वरना फाइल ठंडे बस्ते में रहता है।
कोई भेंट कोई रिश्वत?
जी हुजूरी या सिफारिश!
बिना इसके नहीं होती गुंजाइश,
तूने तो नहीं की इतनी भी गुजारिश।
कुछ होता कहां से?
कानून पढ़ा है,
सच बोला है;
अरे सच में तू भोला है!
रिश्वत देना जुर्म है
तू जानता है,
लेकिन तूने नहीं दिया
यही जुर्म किया
मैं जानता हूं!
सजा भुगत रहे हो सच बोलने की
सतपथ पर चलने की।

काश ! तू भी
असत्य अनैतिक आचरण अपनाता?
तो दर दर की ठोकरें आज यूं न खाता।

?

नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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अस्तित्व की लड़ाई | Astitva kavita

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