• हसरत | Kavita Hasrat

    हसरत ( Hasrat ) मेरे दिल की किसी धड़कन में तेरी याद रहती है। कहीं जिंदा हैं वो लम्हे जिन्हें पल पल ये कहती है। चले आओ जरा बैठें हम उसी घाट पे चलके ! जहां की लहरों में अब भी तेरी तसवीर रहती है ।। के मुझको तो गिला कोई नहीं तेरी रुसवाई का…

  • भाव भक्ति के मारे | Bhav Bhakti ke Mare

    भाव भक्ति के मारे  ( Bhav Bhakti ke Mare ) त्रिदेव तुम्हारी महिमा का, रस पीकर मतवारे, घूम रहें हैं गाते महिमा, गली-गली द्वारे-द्वारे, ढोलक झांझ म॔जीरा लेकर, नाचें भजन कीर्तन गाकर, भाव भक्ति के मारे, गली-गली द्वारे-द्वारे, जल नारियल बेलपत्र धतूरा, जिसके बिन अनुष्ठान अधूरा, चलें सभी सामग्री साजे, गली-गली द्वारे-द्वारे, चंद्र नाग डमरू…

  • मुझपे ऐतबार कर | Ghazal Mujhpe Aitbaar Kar

    मुझपे ऐतबार कर ( Mujhpe Aitbaar Kar ) शिकायतें हज़ार कर तू यार बार बार कर मगर हैं इल्तिज़ा यही की मुझपे ऐतबार कर। खफ़ा हो यूं की प्यार से तुझे मना लिया करूं मगर न बदगुमानियों से दिल को तार तार कर। ये बेनियाज़ी और बेरुखी बढ़ाते तिश्नगी कोई तो कौल दरमियान में कोई…

  • यह आग अभी | Geet Yah Aag

    यह आग अभी ( Yah Aag Abhi ) यह आग अभी तक जलती है ,मेरे आलिंगन में। स्वर मिला सका न कभी कोई ,श्वासों के क्रंदन में ।। जब छुई किसी ने अनायास ,भावुक मन की रेखा । दृग-मधुपों ने खुलता स्वप्नों, का शीशमहल देखा। खिल उठे पुष्प कब पता नहीं ,सारे ही मधुवन में।।…

  • आपन तेज सम्हारो आपै

    आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक ते कापै अर्थात जो अपनी शक्ति को संभाल लेता है उसकी शक्ति के प्रताप से तीनों लोकों में लोग कांपने लगते हैं। वर्तमान समय में बढ़ते वैचारिक प्रदूषण के कारण छोटे-छोटे बच्चों में भी बुढ़ापे के लक्षण दिखने लगे हैं। आंखें धंसी हुई, चेहरों में झुर्रियां ,बालों में…

  • देव है गुरुदेव | Geet Dev Hai Guru Dev

    देव है गुरुदेव ( Dev Hai Guru Dev ) हे देव गुरुदेव… हे देव गुरुदेव।। जो भी जपे तुमको सुबह और शाम। सुख शांति वो पाये जीवन में अपने। बस मन में अपने श्रध्दा तुम रखो। मानव धर्म का तुम बस निर्वाह करों। जीवन तेरा ये तब निश्चित ही बदलेगा।। हे देव गुरुदेव….। शिष्य पर…

  • समय के लम्हे | Kavita Samay ke Lamhe

    समय के लम्हे ( Samay ke Lamhe ) काश! समय के वो लम्हे फिर से वापस आ जाएं । मुरझाए जो फूल पलाश के फिर से हर्षित हो जाएं।। फिर से हो चुहलबाज़ी उन तिरछी नजरों की। बिन बोले ही कहते जो बातें उन अधरों की। ये चुप्पी साधे होंठ फिर से मंद मंद मुस्काएं…

  • मानवता का कर्तव्य निभाता हूँ!

    मानवता का कर्तव्य निभाता हूँ! सारा जगत अपना ही परिवार है। फिर क्यों जगत को बँटा पाता हूँ। मुझको हर एक प्राणी से प्यार है। प्रभु की हर संतान को हृदय से लगाता हूँ। मैं सदा भूखे को खाना खिलाता हूँ। प्यासों को सदैव, पानी पिलाता हूँ। सेवा ही जीवन, इसी में आनंद है। बस!…

  • स्मृतियाँ | Kavita Smritiyan

    स्मृतियाँ ( Smritiyan ) स्मृतियों के घने बादल फिर से घिरकर आयें हैं सांध्य आकाश में सांध्य बेला में तारे छिप रहें हैं कभी तों कभी झिलमिला रहें हैं स्मृतियों के घने बादल फिर से घिर रहें हैं घनघोर होगीं फिर वर्षा आसार नजर आ रहें हैं पग चिन्ह हैं तुम्हारे जानें के जो लौटकर…

  • बिन बुलाए | Bin Bulaye

    बिन बुलाए ( Bin Bulaye ) बिन बुलाए आज तुम फिर कहां से आ गए हो। बंद पड़े सूने मकां की कुंडी खटखटा गए हो। मोगरे सी महका गई है तेरी यादों की खुशबू । छटपटा उठी जो दफन थी दिल में कोई जुस्तजू। पता नहीं अब क्या होगा आंख बाईं फड़का गये हो।। क्यों…