ग़ज़ल | Ghazal par Ghazal
ग़ज़ल ( Ghazal ) सिंहासन से हिली ग़ज़ल । कल जुलूस में मिली ग़ज़ल ।। पेरोकार गरीबों की । जगह-जगह से सिली ग़ज़ल ।। गुमी याद के जंगल में । टुकड़ा-टुकड़ा मिली ग़ज़ल ।। घिसते – घिसते ही होगी । चमकदार झिलमिली ग़ज़ल ।। उहापोह से जब निकली । दिखी…
ग़ज़ल ( Ghazal ) सिंहासन से हिली ग़ज़ल । कल जुलूस में मिली ग़ज़ल ।। पेरोकार गरीबों की । जगह-जगह से सिली ग़ज़ल ।। गुमी याद के जंगल में । टुकड़ा-टुकड़ा मिली ग़ज़ल ।। घिसते – घिसते ही होगी । चमकदार झिलमिली ग़ज़ल ।। उहापोह से जब निकली । दिखी…
दो जून की रोटी ( Do joon ki roti ) दो जून की रोटी को खून पसीना बहा कर पाना चाहता सुकून दिन भर की थकान से घर से निकलता मानव दो जून की रोटी को बेहाल हो गया मनुज हालातों के सामने दो जून की रोटी की दिनोंदिन चिंता खा रही…
यारों ढ़लतें इस मौसम ए बेरुख़ी के बाद भी ( Yaron dhalte is mausam -e -berukhi ke baad bhi ) यारों ढ़लतें इस मौसम ए बेरुख़ी के बाद भी फूल महके है इस देखो शबनमी के बाद भी दुश्मनी दिल से निभायी दोस्ती को तोड़कर वो मिला आकर मुझे है दुश्मनी के…
घोड़ों की नीलामी ( Ghodon ki nilami ) हर दिशा के घोड़ो को इकट्ठा किया गया था । उनको हिदायत दी गई थी कि नीलामी स्थल पर वे लीद न करें। घोड़ो के गरदन पर उनके भागने की गति लिखी हुई थी । ताज्जुब तो यह था कि घोडोे को मालूम था कि उनकी…
दीवार खड़ी हो गयी ( Deewar khadi ho gayi ) उतरेगा वो फलक से सबकी नज़र रही। उम्मीद वस्ल-ए-खास की अक्सर जब़र रही। कहने को तुम सही थे हम भी कहां गलत, दीवार खड़ी हो गयी गलती मगर रही।। शीशे ने टूटने की जिद ठान ली आखिर, उस पर वफा हमारी तो बेअसर रही।।…
दहलीज ( Dahleez ) दहलीज वो सीमा रेखा मर्यादाएं जिंदा रहती है आन बान और शान की सदा कहानी कहती है घर की दहलीज से बेटी जब ससुराल को जाती है आंगन की मीठी यादें रह रहकर याद सताती है दहलीज समेटे रखती है आदर्शों को संस्कारों को रिश्तो की नाजुक डोर…
जमीं अपनी है ( Zamee apni hai ) पार कर कांटो को कली फूल बनी है । तपिश मिट्टी की ही तो हीरे की कनी है ।। राह में कांटे बिछे और दूर है मंजिल । राह और मंजिल में बेहद तना तनी है ।। झुग्गियां कीचड़ की तुमको खटकती क्यों हैं…
गुलशन ( Gulshan ) गुल खिले गुलशन खिले खिलती चले बहार महकती फिजायें सारी चमन हुआ गुलज़ार दिल की हसीं वादियो में फूलों का डेरा है खुशबूओं से भरा चमन है प्यार घनेरा है बागों में बैठी कोयल तितलियां पंखों वाली गुलशन सारा महकता फलों से लदी डाली पेड़ों पे…
परेशाँ ही इसलिए ये दिमाग़ है मेरा ( Pareshan hi isliye ye dimag hai mera ) परेशाँ ही इसलिए ये दिमाग़ है मेरा ख़ुशी के पल जिंदगी सें फराग़ है मेरा भुलानें को कैसे पीऊं शराब ए यारों कहीं खोया देखिए वो अयाग़ है मेरा अंधेरे है ग़म भरे ही नसीब…
वर्ष 2017 के शेष कृति पुरस्कारों की घोषणा भोपाल। साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग, भोपाल द्वारा कैलेण्डर वर्ष 2017 के शेष अखिल भारतीय एवं प्रादेशिक पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। प्रादेशिक प्रति पुरस्कार रुपये 51,000/- (रुपये इक्यावन हजार) एवं अखिल भारतीय प्रति पुरस्कार रुपये 1,00,000/- (रुपये एक लाख) दिया…