Papa par kavita

पिता की स्नेहाशीष पाती | Papa par kavita

पिता की स्नेहाशीष पाती

( श्रृद्धांजलि ) 

एक स्नेहाशीष चिट्ठी को तरसता मेरा मन
आज बरबस दिवंगत पिता को याद करता है

दस बरस पहले अनायास जो चले गए थे तुम
आज भी आप की चिट्ठी की राह तकती हूँ

कईं पत्रों को भेजकर कुशल पूछा करते थे अक्सर
बेटी को नेह देने का तरीका अनोखा था उस वक्त

खुश रहो का आशीष मुझे बहुत भाता था
परिवार को खुश रखने का संबल बन जाता था

एक पत्र से दूसरे का अंतराल मीलो बराबर लगता था
मां बहन सखियों और भ्राता से दूरियों का सफर खलता था

पिता पुत्री का हृदयस्पर्शी पाति से नाता जुड़ा रहा
मेरा पत्र भी मायके में कुशल क्षेम बतलाता रहा

कौन दुनियाँ चले गए, छोड़कर यू मझधार ही
मन बेचैन है दिन और रात भी है स्नेह विहीन

आज सब है खुल गए हैं बातों के नए रास्ते
मन तरसता आज भी एक पाति के वास्ते

जानती हूं पिता के आशीर्वाद की चिट्ठी
आने वाले वक्त में कभी नहीं पा पाऊँगी

आपके आशीष को तरसती
इस दुनिया से मैं भी चली जाऊंगी

 

डॉ. अलका अरोड़ा
“लेखिका एवं थिएटर आर्टिस्ट”
प्रोफेसर – बी एफ आई टी देहरादून

यह भी पढ़ें :-

ऐ अँधेरे | Ai andhere kavita

 

Similar Posts

  • कलम की आवाज | Kavita

    कलम की आवाज ( Kalam ki aawaj ) ( मेरी कलम की आवाज सर्वश्रेष्ठ अभिनेता दिलीप साहब जी को समर्पित करती हूं ) “संघर्षों से जूझता रहा मगर हार न मानी, करता रहा कोशिश मगर जुबां पर कभी न आई दर्द की कहानी”। कुल्हाड़ी में लकड़ी का दस्ता न होता तो लकड़ी के काटने का…

  • है बहुत कुछ | Kavita Hain Bahot Kuch

    है बहुत कुछ ( Hain Bahot Kuch )   है बहुत कुछ मन में कहने को लेकिन मन में संभाल कर रखा हूं तेरे पास अपना दिल गिरवी मैने देख भाल कर रखा हूं तुम्हें क्या लगती है अंजान में तुम्हें चुना हूं नहीं नहीं मैंने बहुत कुछ देखा फिर तेरे लिए ख्वाब बुना हूं…

  • बेटे का मकान | Bete ka Makan

    बेटे का मकान ( Bete ka Makan )    कभी रहती थी माँ गाँव में, बाबूजी के बनाए मकान में, अब रहने लगी है माँ, बेटे के बनाए मकान में | शहर की गगनचुंबी इमारतों में, तलाशती रहती है,थोड़ी सी धूप, मेरे दसवें माले के फ्लैट की बालकनी में| फ्लैट में सजाए बोनसाई में, याद…

  • बटवारे का ख़्याल | Batwara par kavita

    बटवारे का ख़्याल ( Batware ka khayal )    ना कोई रियासते है न ही ‌हाथी-घोड़े, बटवारा केवल है ये बर्तन थोड़े-थोड़े। बटवारे हुये जिनके अनेंको है किस्से, अब क्या समझाएं तुम हो पढ़ें लिखें।। बटवारे के लिए हुआ यह महाभारत, दिन में होता युद्ध शाम पूछते हालत। सभी परिवारों का आज यही है हाल,…

  • कशिश | Kavita

    कशिश ( Kashish )   एक कशिश सी होती है तेरे सामने जब मैं आता हूं दिलवालों की मधुर बातें लबों से कह नहीं पाता हूं   मन में कशिश रहने लगी ज्यों कुदरत मुझे बुलाती है वर्तमान में हाल बैठकर दिल के मुझे सुनाती है   प्रकृति प्रेमी बनकर मैं हंसकर पेड़ लगाता हूं…

  • विश्व पृथवी दिवस | Kavita Vishwa Prithvi Divas

    विश्व पृथवी दिवस ( Vishwa Prithvi Divas )   पृथ्वी या पृथिवी या मानो विशाल धरा बसता इसके ऊपर ही सृष्टि हरा भरा भू भूमि वसुधा कहो या वसुंधरा धन संपदा का है मुझ में भंडार भरा पेट की छुदा मिटाने को मैं हूं धरित्री संतान का पोषण करती जैसे मां जीवन दात्री धूप छांव…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *