Pita ke Upar Kavita
Pita ke Upar Kavita

पिता

( Pita ) 

( 2 )

सफेद धुंधलके में रंगे बाल
करते हुए वह कदम ताल
रिश्तो की डोरी को कसके बांधे
घर के बोझ को लिये अपने , काँधे
जेब मे न हो फूटी कोड़ी
फीस मे देरी हुई न थोड़ी
हर समस्या की चादर सदा
उन्होंने मुस्कुरा कर ओढ़ी
बेटे पर गुस्सा तो बेटी पर सारा लाड जताते
बहन है तेरी प्यार से बात किया कर समझाते
बड़े से बड़ा गम भी कैसे
वो हंसकर पी जाते
असफलता पर थप थापा पीठ हौसला बढ़ाते
गुजारिश है सबसे व्यस्त रहो चाहे कितने
जीवन में दोबारा ना मिलेंगे यह पल इतने
दो पल बैठ गुजार लो जरा हंस के
फिर ये मंजर रह जाएगा बस यादें बन के

खिला दो निवाला अपने इन हाथों से
फूल सी दुआएं झरेगी उनकी बातों से

मिल गया जो आशीष तरक्की रुकेगी नहीं
बुजुर्गों का किया सम्मान तो झोली खाली रहेगी नहीं
नहीं चाह रखना उनके धन दौलत की
हर जगह चर्चा होगी तेरी शोहरत की
तुझे उंगली पकड़ चलना सिखाया है
रात दिन तुझ पर अपना गंवाया है
दो पल तू भी थाम ले अपनी बाहों में
चमक जाएगी उनकी आंखें रातों में
फर्ज अपना कर्म समझ जो निभा जायेगा
ईश्वर के चरणों में खुद को हमेशा पाएगा

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

( 1 ) 

पिता तो आख़िर में पिता होता,
जिसको कोई नही समझ पाया।
बच्चों के लिए सब कुछ किया,
और उनके लिए ही वो मर गया।।

पिता ही होता एक ऐसी हस्ती,
जिसको बच्चों की चिंता रहती।
चुका ना सकता उसका हिसाब,
ईश्वर का ही रुप है वह साक्षात।।

कभी पढ़ना स्वयं पिता को तुम,
अपनें लिए कभी कुछ ना लेगा।
लेकिन अपनों को वह सब देगा,
चाहें रात दिन मेहनत कर लेगा।।

आज पिता और सूरज की गर्मी,
सभी बर्दाश्त करना ये सीख लो।
अगर उसमे अन्धेरा छा गया तो,
परिवार का पेट फिर स्वयं भरो।।

अगर अच्छा तुम्हे बनना हो तो,
पिताश्री की नज़र में अच्छे रहो।
लोगो का क्या तरक्की में जलेंगे,
और नाकामयाबी में यही हॅंसेगे।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here