Poem dharamyudh
Poem dharamyudh

धर्मयुद्ध

( Dharamyudh )

 

जीवन के इस धर्मयुद्ध में, तुमको ही कुछ करना होगा।
या तो तुमको लडना होगा,या फिर तुमको मरना होगा।

 

फैला कर अपनी बाँहो को, अवनि अवतल छूना होगा।
कृष्ण ज्ञान के अर्जुन बनकर,गीता राह पे चलना होगा।

 

कर्मरथि बन कर्तव्यों का, तुम्हे निर्वहन करना होगा।
या तो अमृत बाँटना होगा, या खुद ही विष पीना होगा।

 

डर करके चुप हो जाओगे, तब वो तुम्हे डरायेगे।
एक कदम पीछे रखे जो, तब वो आँख दिखायेगे।

 

कल होना है आज ही हो जा, वक्त भी तो दोहरायेगा।
भर ले अब हुंकार शेर, जो भी होगा देखा जायेगा।

 

विधि को टाले टाल ना पाए, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी।
फिर क्यो भटके रहा बन्धन में, तार तोड दे अज्ञानी।

 

✍?

कवि :  शेर सिंह हुंकार

देवरिया ( उत्तर प्रदेश )

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