Poem Muh se Phool Jhadte Hain

मुँह से फूल झरते हैं | Poem Muh se Phool Jhadte Hain

मुँह से फूल झरते हैं!

( Muh se phool jhadte hain ) 

 

क्या कुदरत बनाई उसे आह लोग भरते हैं,
लेकर उधार रोशनी तारे वो चमकते हैं।
हौसले जवाँ दिल के उड़ते आसमानों में,
रात के उन ख़्वाबों में साथ-साथ चलते हैं।

कुदरत जो बख्शी है उसे हुस्न-दौलत से,
बोलती है जब देखो मुँह से फूल झरते हैं।
जब पेड़ सूख जाते परिन्दे नहीं आते हैं,
छलकती जवानी पे देखो लोग मरते हैं।

छोटा -बड़ा न कोई आशिकी की राहों में,
होंठों से जाम लेकर साथ -साथ पीते हैं।
पाकर झलक उसकी कितने गम भुलाते हैं,
वो जाते नहीं मयकदे, पांव लड़खड़ाते हैं।

उसके तसव्वुर में जान मेरी अटकी है,
लगाईं जो आग उसने रोज -रोज जलते हैं।
करती है कत्ल ऐसा पता तक नहीं चलता,
जख्में जिगर देखो जल्दी कहाँ भरते हैं।

अपने आसमां में मैं वो चाँद ले के आऊँगा,
ऐसी हसीना पे लाखों जाँ छिड़कते हैं।
मुझको उसके जलवों ने कैसा घेर रखा है,
कब का छुआ उसको आज तक महकते हैं।

 

रामकेश एम.यादव (रायल्टी प्राप्त कवि व लेखक), मुंबई

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