Nacho-Nacho

नाचो-नाचो-नाचो रे | Poem Nacho-Nacho

नाचो-नाचो-नाचो रे!

( Nacho-Nacho-Nacho Re ) 

 

नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!
नाचो कुंवारे- नाचो कुंवारी,
प्यासा रहे न आँखों का पानी।
नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!

झरने पे नाचो,पानी पे नाचो,
लहरों की उठती जवानी पे नाचो।
प्यासी है दरिया,प्यासा है सावन,
बादल की मेहरबानी पे नाचो।
काँटों पे नाचो – बहारों पे नाचो,
हुस्न औ इश्क के संगम पे नाचो।
नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!
नाचो कुंवारे- नाचो कुंवारी,
प्यासा रहे न आँखों का पानी।
नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!

छलके जवानी,दहके जवानी,
करो न खाक तू उसकी रवानी।
दौलत औ शोहरत ने लूटा सुकूँ,
कैसे भोर तक जागे जवानी?
चाँद पे नाचो,मंगल पे नाचो,
हिरनी की छोटी सींग पे नाचो।
नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!
नाचो कुंवारे- नाचो कुंवारी,
प्यासा रहे न आँखों का पानी।
नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!

हुस्न-ए-बहार में उठो-बैठो,
बुलबुल जैसा बागों में चहको।
उसकी अदा का बोझ उठाकर,
साँसों में घुलके साँसों में महको।
बनाओ कभी न बात का बतंगड़,
लँगोटी उड़ाके नभ में सुखाओ,
नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!
नाचो कुंवारे- नाचो कुंवारी,
प्यासा रहें न आँखों का पानी।
नाचो-नाचो-नाचो रे!
भोर भए तक नाचो रे!

रामकेश एम.यादव (रायल्टी प्राप्त कवि व लेखक), मुंबई

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