प्रभु दो ऐसा वरदान | Prabhu do Aisa Vardan

प्रभु दो ऐसा वरदान

( Prabhu do aisa vardan ) 

 

प्रभु!ज्ञान प्रभा शोभित हिय, दो ऐसा वरदान

मृदुल मधुर ह्रदय तरंग,
स्वर श्रृंगार अनुपम ।
विमल वाणी ओज गायन,
ज्योतिर्मय अन्तरतम ।
मानस सर नवरस लहर,
गुंजित मधुमय गान ।
प्रभु!ज्ञान प्रभा शोभित हिय,दो ऐसा वरदान ।।

दुर्बल छल बल मद माया,
प्रसरित जग जन जन ।
दे निर्मल विमल मति,
तमस हर कण कण ।
नवगति नवलय जग अनूप,
दो नव दृष्टि नवल ज्ञान ।
प्रभु! ज्ञान प्रभा शोभित हिय,दो ऐसा वरदान ।।

हे कृपानिधि करुणामय,
दया नीर कण छलका दो ।
प्यासे नयन अंतरस्थ,
निज स्वरूप झलका दो ।
पुलकित पावन चरण बिंदु,
स्पर्श स्तुति अष्ट याम ।
प्रभु! ज्ञान प्रभा शोभित हिय,दो ऐसा वरदान ।।

समय काल स्वर्ण आभा,
सर्वत्र मोद उल्लास ।
आजीवन अथाह कृपा,
प्रबल आस्था विश्वास ।
प्रेम सुमन महके जीवन ,
सर्व सुख समृद्धि बखान ।
प्रभु! ज्ञान प्रभा शोभित हिय,दो ऐसा वरदान ।।

 

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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